आतिशबाजी का अर्थशास्त्र भी तो है

जब भी हम दीपावली अथवा किसी और खुशी के मौके पर आतिशबाजी करते हैं तो क्या हम सोचते हैं कि आतिशबाजी का भी अपना एक अर्थशास्त्र है

By: सुनील शर्मा

Published: 19 Oct 2017, 11:31 AM IST

- डॉ. अश्विनी महाजन

सरकारी विज्ञापनों में भी चीन का नाम लिए बिना यह कहा जाता रहा है कि पटाखों का आयात गैर कानूनी ही नहीं है बल्कि विदेशी पटाखों से भारी प्रदूषण भी फैलता है इसलिए केवल आयात पर प्रतिबंध के साथ आयातित पटाखों का इस्तेमाल न करने की सलाह भी जनता को दी गई है।

जब भी हम दीपावली अथवा किसी और खुशी के मौके पर आतिशबाजी करते हैं तो क्या हम सोचते हैं कि आतिशबाजी का भी अपना एक अर्थशास्त्र है और इसे बनाने में देश के लाखों लोग जुटे हैं? भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पटाखों की बिक्री पर रोक लगने के बाद आतिशबाजी के क्षेत्र में रोजी-रोटी पाने वाले लोगों के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो गया है। लेकिन, यह पहली बार नहीं है कि इस उद्योग पर संकट आया है, इससे पहले भी चीनी पटाखों के अंधाधुंध आयात के कारण यह क्षेत्र भारी संकट में आ गया था। पिछले तीन वर्षों से भारत सरकार द्वारा विदेशी पटाखों पर प्रतिबंध लगाने के बाद इस क्षेत्र में राहत की सांस ली थी।

ऐसा भी माना जाता है कि चीन सहित विदेशों से आने वाले पटाखे और आतिशबाजी पर्यावरण प्रदूषण का बड़ा कारण थी। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में आतिशबाजी की कुल बिक्री 10,000 करोड़ रुपए वार्षिक की है। यूं तो आतिशबाजी उद्योग देश के कोने-कोने में फैला है लेकिन तमिलनाडु और उसमें भी शिवकाशी तथा पश्चिम बंगाल में इस उद्योग का विस्तार ज्यादा है। माना जाता है कि शिवकाशी और पश्चिम बंगाल में पटाखे बनाने की हजारों फैक्ट्रियां हैं। अकेले शिवकाशी से 6,000 करोड़ रुपए के पटाखों की आपूर्ति होती है और लगभग 6 लाख लोग इस उद्योग पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आश्रित हैं क्योंकि इस उद्योग में मशीनीकरण न्यूनतम है। अधिकतर साजोसमान हाथ से ही तैयार होता है।

शिवकाशी क्षेत्र, जहां पटाखा, माचिस तथा प्रिंटिंग उद्योग का भी भारी विकास हुआ है, किसी राष्ट्रीय राजमार्ग अथवा राज्य राजमार्ग से जुड़ा नहीं है। केवल एक रेलगाड़ी ही शिवकाशी तक जाती है। फिर भी यहां से अमरीका, कनाडा, यूरोप समेत कई देशों को आतिशबाजी निर्यात होती रही है। करीब 2,000 करोड़ रुपए की आतिशबाजी का निर्यात अकेले शिवकाशी से होता है। हालांकि बड़ी मात्रा में पटाखों का उत्पादन तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में होता है, फिर भी पटाखों की अधिकतम मांग उत्तर भारत के राज्यों से होती है। दिल्ली और एनसीआर में दीपावली पर पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध के चलते न केवल स्थानीय व्यापारी वर्ग प्रभावित हुआ है बल्कि शिवकाशी समेत पटाखों और आतिशबाजी के उत्पादन केन्द्रों में भी उदासी छा गई है। हालांकि भारतीय आतिशबाजी उद्योग ने विकास किया है और उसमें प्रतिस्पर्धा शक्ति का भी निर्माण हुआ है किंतु चीन से आने वाले अन्य आयातों की तरह घटिया गुणवत्ता के चीनी पटाखे भी भारतीय पटाखों की तुलना में 20 से 40 प्रतिशत सस्ते आने लगे।

अन्य चीनी सामान की तरह ही इन पटाखों में भी घटिया कच्चे माल का उपयोग किया गया, जिसके कारण ये पटाखे न केवल ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं बल्कि खतरनाक भी होते हैं। पटाखों से प्रदूषण के विषय को लेकर देश भर में विशेष असमंजस है कि चीन से आने वाले पटाखे जिन पर कोई गुणवत्ता नियंत्रण नहीं है, ज्यादा प्रदूषण का कारण बनते हैं।

उल्लेखनीय है, सरकारी विज्ञापनों में भी चीन का नाम लिए बिना यह कहा जाता रहा है कि पटाखों का आयात गैर कानूनी ही नहीं है बल्कि विदेशी पटाखों से भारी प्रदूषण भी फैलता है इसलिए केवल आयात पर प्रतिबंध ही नहीं लगाया गया बल्कि आयातित पटाखों का इस्तेमाल न करने की सलाह भी जनता को दी गई है। लेकिन, चीन से आयातित पुराना माल तो बाजार में अब भी मौजूद है ही। हालांकि शिवकाशी और अन्य स्थानों पर आतिशबाजी उद्योग के आधुनिकीकरण और उसके उत्पादन में विविधता इस उद्योग की मुख्य चुनौती है। बिजली, आधुनिकतम तकनीक और अन्य कई प्रकार की समस्याओं से जूझते इस उद्योग में विकास की तमाम संभावनाएं मौजूद हैं।

भारतीय उद्योग के प्रतिनिधियों का यह कहना है कि चीन के पटाखों में विविधता का कारण उनके द्वारा ऐसे माल का उपयोग है, जो भारत में प्रतिबंधित है। फिर भी इस विषय में अधिक शोध एवं विकास करते हुए नवीनतम आतिशबाजी उत्पादन को बढ़ाने और उनके प्रदूषण को कम करने की ओर कदम उठाने होंगे। यद्यपि कई बार बाल श्रम और पटाखा फैक्ट्रियों में दुर्घटनाओं के चलते भारत का पटाखा उद्योग की आलोचना का भी शिकार रहा है। आने वाले समय में इस चुनौती से भी पटाखा उद्योग को निपटने की जरूरत है। लेकिन, उद्योग से जुड़े लोगों का यह कहना है कि पटाखा उद्योग में बाल श्रम का उपयोग नहीं किया जाता।

वास्तव में शिवकाशी का यह उद्योग कुटीर उद्योग व्यवस्था के आधार पर ज्यादा चलता है। ऐसे में गृहस्थों द्वारा चलाए जा रहे छोटे कुटीर पटाखा उद्योग में पूरा परिवार मिलकर काम करता है, जिसमें बच्चे भी शामिल होते हैं। फिर भी हमें देखना होगा कि फैक्ट्रियों में बालश्रम न हो। दीपावली के अवसर पर करोड़ों देशवासी आतिशबाजी के माध्यम से अपनी खुशी का प्रकटीकरण करते रहे हैं। आज की परिस्थिति में जब देश और दुनिया में प्रदूषण बढ़ रहा है, उसे भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। लेकिन जन भावनाओं के प्रतिकूल किसी भी बात पर प्रतिबंध लगाना भी उत्तर नहीं है। हालांकि न्यूनतम प्रदूषण और प्रदूषणरहित पटाखों और आतिशबाजी के बारे में शोध भी जरूरी है।

सुनील शर्मा
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