उड़ान को मिले देश का आसमान

भारत सदा से ही कल्पनाओं और विचारों का केन्द्र बिन्दु रहा है। सीमित संसाधनों और कम बजट में उपलब्धियां हासिल करने की भारतीयों की क्षमता विश्व में बेजोड़ है।

 

By: shailendra tiwari

Updated: 15 Jul 2020, 03:17 PM IST

डॉ.नीलम महेन्द्र, टिप्पणीकार

किसी भी देश की शक्ति होते हैं उसके नागरिक, और अगर वो युवा हों तो कहने ही क्या? भारत एक ऐसा ही युवा देश है। हाल ही में भारतीय जनसंख्या आयोग के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से तैयार किए गए सैंपल रेजिस्ट्रेशन सिस्टम 2018 की रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में 25 वर्ष से कम आयु वाली आबादी 46.9% है। इसमें 25 वर्ष की आयु से कम पुरूष आबादी 47.4%और महिला आबादी 46.3%। ये आंकड़े किसी भी देश को प्रोत्साहित करने के लिए काफी हैं। भारत जैसे देश के लिए भी यह आंकड़े अनेकों अवसर और आशा की किरणें जगाने वाले हैं लेकिन सिर्फ आंकड़ों से ही उम्मीदें पूरी नहीं होती, उम्मीदों को अवसरों में बदलना पड़ता है।


यह दुर्भाग्य कहें या फिर गलत नीतियों का असर कि हम एक देश के नाते अपने इन अवसरों का उपयोग नहीं कर पाते और उन्हें उम्मीद बनने से पहले ही बहुत आसानी से इन उम्मीदों को दूसरे देशों के हाथों में फिसलने देते हैं। हमारे प्रतिभावान और योग्य युवा जो इस देश की ताकत हैं जिनमें इस देश की उम्मीदों को अवसरों में बदलने की क्षमता है वो अवसरों की तलाश में विदेश चले जाते हैं। जो युवा इस देश का एक बार फिर से विश्वगुरु बनाने का सपना साकार करने में एक अहम भूमिका निभा सकते हैं वो अपने सपनों को साकार करने के लिए इस देश से पलायन करने के लिए विवश हो जाते हैं।


यह कटु सत्य है कि ब्रेन ड्रेन का शिकार होने वाले देशों में भारत पहले स्थान पर आता है। यूएस नेशनल साइंस फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार,2003 से 2013 के बीच यूएस में भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की संख्या में 85% की वृद्धि हुई है। एशिया के अन्य देशों से तुलना की जाए तो यहाँ भी इसी रिपोर्ट के अनुसार एशिया के सभी देशों को मिलाकर विदेश जाने वाले 2.96 मिलियन वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की संख्या में से भारत 9,50,000 के साथ पहले स्थान पर है।


यह पिछले कुछ सालों की ही समस्या है, ऐसा नहीं है। इस देश के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाते हैं। निवास रामानुजन ऐय्यंगर का उदाहरण हमारे सामने है जिनके पास गणित की कोई औपचारिक शिक्षा या डिग्री नहीं होने के बावजूद गणित में उनका योगदान अतुलनीय है। आज भले ही उनके नाम पर अनेकों सम्मान दिए जाते हों लेकिन यह भी सच है कि उनके जीवन काल में इस देश में उनकी रिसर्च को कोई मदद तो दूर की बात है, स्वीकार्यता भी नहीं मिली थी। हार कर उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के एक ब्रिटिश गणितज्ञ जी एच हार्डी को अपनी रिसर्च भेजी तो हार्डी ने ना सिर्फ उनके कार्य को "असाधारण" माना बल्कि उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उनके ब्रिटेन आने का प्रबंध भी किया।यह घटना 1913 की है।आज रामानुजन इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन गणित में उनके द्वारा किए गए काम पर जब लगभग सौ साल बाद 2011 - 2012 में रिसर्च की जाती है तो आज के गणितज्ञ भी उनके काम को गहन, बेहद बारीक और उच्चतम बौद्धिक स्तर का स्वीकार करते हैं।


हरगोविंद खुराना,जिन्होंने पोस्ट ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई भारत में ही की थी, आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए थे उसके बाद पीएचडी करके भारत आए। 1949 की बात है, लेकिन उन्हें यहाँ नौकरी नहीं मिली तो वो वापस विदेश चले गए और यूएस के नागरिक बन गए। हम सब जानते हैं कि 1968 में उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया गया था।


जिस देश में अपने देश के एक होनहार युवा के लिए एक नौकरी नहीं थी, आज उसी देश में अमरीकी नागरिक हरगोविंद खुराना के नाम पर उभरती हुई प्रतिभाओं को सम्मान दिए जाते हैं। सीआर राव, हरिश्चंद्र ऐसे नामों की फेहरिस्त अंतहीन है क्योंकि हमने अपनी गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा और 21 वीं सदी में भी इस फेहरिस्त में नाम जुड़ते जा रहे हैं।


चीन ने अपनी नीतियों में बदलाव करके अपने देश से प्रतिभाओं के पलायन को काफी हद तक रोक लिया है। इसके लिए उसने शोध और अनुसंधान पर जोर देना शुरू कर दिया है और उसके बजट में बेतहाशा वृद्धि की है। भारत की अगर हम बात करें तो हमारे यहाँ बुनियादी शिक्षा में प्रायोगिक के बजाए सैद्धांतिक शिक्षा पर जोर दिया जाता है। इसका परिणाम हमारे सामने उस सर्वे रिपोर्ट के रूप में आता है जो यह कहती है कि देश के 80त्न इंजीनियर बन कर निकलने वाले युवा नौकरी करने के लायक नहीं हैं। केवल 2.5त्न के पास वो टैलेंट होता है जो आज की आवश्यकता के अनुरूप है।और जैसा कि होता आया है इस 2.5त्न में से अधिकांश युवा बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश चले जाते हैं।


अगर हम वाकई में एक देश के रूप में एक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ाना चाहते हैं तो हमें अपने देश की प्रतिभाओं को पहचानना होगा। ऐसी प्रतिभाएं जो विज्ञान के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता रखती हों। भारत के पास प्रतिभाओं की कमी नहीं है। भारत सदा से ही कल्पनाओं और विचारों का केन्द्र बिन्दु रहा है। सीमित संसाधनों और कम बजट में उपलब्धियां हासिल करने की भारतीयों की क्षमता विश्व में बेजोड़ है। हमारे स्पेस प्रोग्राम इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। पिछले कुछ सालों में इसरो ने जिस प्रकार विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है वो इसका सबूत है। लेकिन यह भी सच है कि भरतीय प्रतिभाओं के बिना भारत आगे नहीं जा सकता। देर से ही सही लेकिन अब सरकार ने इस दिशा में सोचना शुरू कर दिया है। 2019 के बजट में देश की प्रतिभाओं को देश में ही अनेक अवसर उपलब्ध कराने की घोषणाएं तो हुई हैं लेकिन उन्हें यथार्थ में बदलना सरकार के लिए चुनौती होगी। अगर हम विश्व में भारत का कद बढ का सपना साकार करना चाहते हैं तो हमें इस दिशा में प्रयास करने होंगे कि हमारे देश की प्रतिभाओं को अपने सपने सच करने के लिए इसी देश की जमीन मिले उनके हौसलों की उड़ान को इसी देश का आसमान मिले। अपने सपने सच करने के लिए उन्हें विदेशी धरती का सहारा ना लेना पड़े।

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