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Patrika Opinion: फाइलों की शोभा न बनें खाद्य सुरक्षा योजनाएं

'कोई भूखा नहीं सोएगा का नारा सब सरकारें देती हैं लेकिन भूखों का पेट भरने की योजनाओं पर प्रभावी काम होता दिखता नहीं। देश की सर्वोच्च अदालत ने भी इस बात पर जोर दिया है कि कल्याणकारी सरकार का पहला दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि कोई व्यक्ति भूख से न मरे।

नई दिल्ली

Updated: November 17, 2021 08:21:50 am

भूख से मौत की कहीं भी और कितनी ही घटनाएं हो जाएं, आम तौर पर कोई भी सरकार इसे आसानी से स्वीकार नहीं करती। खाद्य सुरक्षा को लेकर चलाई जाने वाली योजनाओं की पोल खुलने का डर जो रहता है। इसीलिए अव्वल तो भूख से मरने की बात को छिपाने का प्रयास होता है और ज्यादा ही कहीं हो-हल्ला होने लगे तो ऐसे मामलों में लीपापोती शुरू हो जाती है। 'कोई भूखा नहीं सोएगा का नारा सब सरकारें देती हैं लेकिन भूखों का पेट भरने की योजनाओं पर प्रभावी काम होता दिखता नहीं। देश की सर्वोच्च अदालत ने भी इस बात पर जोर दिया है कि कल्याणकारी सरकार का पहला दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि कोई व्यक्ति भूख से न मरे।

इसी को देखते हुए मंगलवार को एक याचिका की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने केन्द्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह राÓयों से सलाह-मशविरा कर सामुदायिक रसोई के बारे में देशव्यापी नीति बनाए। केन्द्र की ओर से मामले को लेकर पेश किए गए हलफनामे पर भी कोर्ट ने यह कहते हुए नाखुशी जाहिर की कि इसमें नीतिगत फैसले के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी इस समस्या से निपटने के लिए राÓयों को शामिल करते हुए केन्द्र से एक समान मॉडल बनाने के लिए कहा था। यह बात सही है कि भूखे लोगों को भोजन के लिए सरकारों ने अपने स्तर पर योजनाएं संचालित कर रखी हैं लेकिन इनका लाभ सबको नहीं मिल पाता। दूर-दराज के इलाकों में ये सुविधाएं कैसी व कितनी उपलब्ध हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। बड़ी समस्या एक प्रदेश में दूसरे राज्यों से आकर रहने वालों को लेकर भी है जिन्हें समुचित पहचान के अभाव में राज्य की खाद्य सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। 'ग्लोबल हंगर इंडेक्स में पहले ही भारत का नंबर 116 देशों में से 101वें स्थान पर है। भुखमरी के साथ-साथ इस इंडेक्स में यह भी देखा जाता है कि कितने लोग कुपोषण के शिकार हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा - चिंता इस बात की ही है कि लोग भूख से मर रहे हैं। इसे कुपोषण से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

यह विडम्बना ही है कि हमारे यहां कोर्ट के सख्त रवैये के बाद ही सरकारें हरकत में आती हैं। कोरोना से मौत के आंकड़े व मुआवजे को लेकर भी कोर्ट की सख्ती के बाद ही सरकारी मशीनरी सक्रिय हुई थी। भूख से होने वाली मौत किसी भी राज्य में हो, सरकारों की बदनामी का कारण तो बनती ही है, जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी सवालिया निशान खड़ा करती है। खाद्य सुरक्षा योजानाएं सिर्फ फाइलों की शोभा बन कर रहेंगी तो फिर सरकारें भूख से होने वाली मौतों पर पर्दा डालने के काम में ही जुटेंगी!

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