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स्वास्थ्य दिवस पर विशेष: निरोगी काया के लिए पृथ्वी की सेहत का रहे ध्यान

धरा के स्वस्थ रहने से ही हमारा शरीर स्वस्थ होगा। हमारे ग्रंथों में स्वास्थ्य और प्रकृति को एक साथ जोड़कर बताया गया है। भारत में पृथ्वी को माता का दर्जा देकर इसके महत्त्व को स्वीकार किया गया है।

Published: April 07, 2022 07:47:19 pm

सुगंधा नागर
राष्ट्रीय संचार प्रबंधक (स्वास्थ्य और शासन कार्यक्रम), संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 'हमारा ग्रह, हमारा स्वास्थ्यÓ को इस वर्ष के स्वास्थ्य दिवस की थीम घोषित किया है। हमारी धरा से हमारे स्वास्थ्य को जोड़ती यह सोच कई हजार वर्षों से भारतीय संस्कृति व सनातन जीवनयापन का आधार रही है। हमारे सभी पर्व, व्रत, रीति-रिवाज या तो प्रकृति के विभिन्न तत्वों का उत्सव हैं या उनके संरक्षण की कला। हमारा आहार और भोजन, उसको उगाने, पकाने और खाने के सभी तरीके प्रकृति एवं ऋतुओं के अनुकूल हैं। चाहे वे प्रात: सूर्य नमस्कार कर अघ्र्य देना हो, पूर्णिमा-एकादशी के व्रत, समस्त पूजन की विधियां, दान-पुण्य या आचार व्यवहार के नियम, सभी प्रकृति से गहराई से जुड़े हुए हैं। यहां तक कि बचपन में बड़ों से सुनी गई कई बातों के अनुसार धरा, जल, अन्न व प्रकृति के तत्वों के अपव्यय और दुरुपयोग से हम पाप के भागीदार बनते हैं। भारतीय संस्कृति में पर्यावरण चिन्तन की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है, जितना मानव का अस्तित्व।
भारतीय ऋषि-मुनियों ने प्रकृति की सत्ता में सभी प्राणियों को स्वीकार किया है और वैदिक काल से ही स्वस्थ रहने के लिए मानव देवों से प्रार्थना करता आया है। संस्कृत में एक उक्ति बेहद प्रचलित है.
'वाऽम् असन् नसो: प्राय: चश्रुरक्षणो: श्रोतं कर्णयो:।
अपलिता केशा अशोणा दन्ता बहु बाहवोर्बलम्।।Ó
अर्थात् देवों ने हमारी जो आयु निर्धारित की है, उसे हम सब पूर्ण कर सकते हैं। मुख में वाणी हो, नासिक्य में प्राण हों, आंखों में देखने के लिए सामथ्र्य हो, कर्णेन्द्रियों में सुनने की क्षमता हो, बालों में पकने का दोष न हो, दन्त स्वच्छ और बाहुओं में बल बना रहे। साधारण-सी बात है कि यह सब तभी संभव हो सकता है, जब हमारी धरा सुरक्षित होगी। अपनी धरा के स्वस्थ रहने में ही हम सभी का स्वस्थ जीवन भी जुड़ा हुआ है।
हमारे ग्रंथों में स्वास्थ्य और प्रकृति को एक साथ जोड़कर बताया गया है। यही नहीं, आयुर्वेद प्रकृति और पर्यावरण से किस तरह से परस्पर जुड़ा हुआ है, इसका भी विस्तार से वर्णन है। ऐतिहासिक परिदृश्य देखें तो सदियों से भारत का प्रत्येक आस्थावान व्यक्ति पृथ्वी को माता तथा स्वयं को उसका पुत्र मानता है। अतीत की ओर देखने से पता चलता है कि अनेक सभ्यताएं अपनी चरम सीमा पर आने के बाद समाप्त हो गईं और हड़प्पा संस्कृति के पतन का कारण शहर व प्रदेशों के भूमि (मृदा) का बंजर होना बताया जाता है। ऐसे में जब तक हम अपनी धरा से प्यार करते रहेंगे, वह हमारा साथ देती रहेगी। वरना हमें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। हमें यह बात समझनी होगी और आज सम्पूर्ण विश्व के लिए यही संकट जलवायु परिवर्तन के रूप में खड़ा है। भारतीय संस्कृति में मानव की ऐश्वर्यभोग की अभिलाषा को ही पर्यावरण प्रदूषण का कारण माना गया है।
'सुखार्थमशुभं कृत्वा य एते भृषदु: खिता:।
आस्वाद: स किमेतेषां करोति सुखमण्वपि॥Ó
अर्थात् सुख (ऐश्वर्य) के लिए ही अशुभ कर्म (पर्यावरण ह्रास) करके मनुष्य नाना प्रकार के दु:ख भोग रहे हैं, सुख तो अणुमात्र भी नहीं। इसलिए मानव मन की पवित्रता पर बल दिया गया है। निर्मल मन और नैतिक नियमों के आचरण से पर्यावरण संरक्षण किया जा सकता है। दयानन्द सरस्वती के द्वारा दिए गए नारे 'वेदों की ओर लौटोÓ और 'प्रकृति की ओर वापस चलो,Ó आज के युग में अत्यंत महत्त्व रखते हैं। यदि अभी हम प्रकृति के प्रति संवेदनशील नहीं बनेंगे, तो हमारी संस्कृति एवं सभ्यता का विनाश निश्चित है।
वसुधैव कुटुम्बकम और सादा जीवन उच्च विचार वाला देश आज पाश्चात्य अवधारणा के वशीभूत होकर खाओ-पियो और मौज करो की प्रवृत्ति का शिकार हो गया है। आवश्यकता है पर्यावरणीय जागरूकता की, अपनी संस्कृति की सुप्रथाओं को पुन: जीवित कर संजोने और उन पर अमल करने की। ऋग्वेद से लेकर बृहदारण्यकोपनिषद्, पद्मपुराण और मनुस्मृति सहित अनेक ग्रन्थों में धरा की उपासना से स्वस्थ जीवन प्राप्ति की बात कही गई है। कालिदास ने पर्यावरण संरक्षण के विचार को मेघदूत तथा अभिज्ञान शाकुन्तलम में दर्शाया। रामायण तथा अन्य धार्मिक ग्रन्थों, उपनिषदों में वन, नदी, जीव-जन्तु, पशु-पक्षियों की प्रशंसा की गई है। ऐसे में स्पष्ट है कि अपनी धरा की सुरक्षा से ही अपना स्वास्थ्य भी सुरक्षित बनाया जा सकता है।
भारत में प्रकृति की पूजा की जाती है। भारत ही एक ऐसा देश है, जहां की संस्कृति में धरती के पूजन की बात कही गई है। धरती को माता कहते हैं। यदि माता स्वस्थ रहेगी तो हम उसके बच्चे, स्वत: ही स्वस्थ रहेंगे। ऋग्वेद से लेकर बृहदारण्यकोपनिषद्, पद्मपुराण और मनुस्मृति सहित अनेक ग्रन्थों में धरा की उपासना से स्वस्थ जीवन प्राप्ति की बात कही गई है।
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