मजबूत हो निगरानी

दूरसंचार आयोग का फैसला ट्राई की सिफारिशों के अनुरूप है। इसने मंत्रालय की भेदभाव रहित इंटरनेट सुविधा देने की नीति को अमलीजामा पहना दिया है।

By: सुनील शर्मा

Published: 15 Jul 2018, 11:59 AM IST

देश में बिना भेदभाव निर्बाध इंटरनेट की पहुंच बनाए रखने के लिए दूरसंचार आयोग ने नेट न्यूट्रलिटी के नियमों को मंजूरी देकर फेसबुक की 'फ्री बेसिक' व एयरटेल की 'जीरो' योजना का एक तरह से अंत कर दिया। दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियों के व्यावसायिक हितों से आम उपभोक्ताओं को राहत प्रदान करते हुए देश में इंटरनेट की आजादी सुनिश्चित कर दी गई है। आयोग का फैसला दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) की सिफारिशों के अनुरूप ही है। इसने दूरसंचार मंत्रालय की भेदभाव रहित इंटरनेट सुविधा प्रदान करने की नीति को अमलीजामा पहना दिया है।

इन नियमों का उल्लंघन करने पर सेवा प्रदाता कंपनियां दंडित होंगी। पिछले कुछ सालों से नेट न्यूट्रलिटी के मुद्दे पर पूरी दुनिया में बहस चल रही है। प्रमुख सेवा प्रदाता कंपनियां लगातार दबाव बना रही थीं कि आम लोगों को बुनियादी इंटरनेट की मुफ्त सुविधा देने के लिए उन्हें इंटरनेट की स्पीड, कंटेंट, प्लेटफॉर्म व इस्तेमाल के तरीकों में प्राथमिकता तय करने और विशेष उपभोक्ताओं से अलग-अलग कीमत वसूलने की इजाजत मिले। उनका तर्क यह था कि ऐसा होने पर गरीबों को लाभ व उनकी तरक्कीका मार्ग प्रशस्त होगा। हालांकि, इसका जबरदस्त विरोध भी हो रहा था।

लेकिन, सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि सिर्फ नियम बना कर ही काम खत्म नहीं हो जाता। नियमों की मनमाफिक व्याख्या कर उनका अपने पक्ष में इस्तेमाल करना या उनकी अनदेखी करते हुए उल्लू सीधा करते रहना प्रभावशाली कंपनियों के लिए आम है। उदाहरण के लिए शराब के प्रचार पर रोक के नियम को धता बताते हुए उसी ब्रांड के सॉफ्ट ड्रिंक का प्रचार करना। जाहिर है कि निगरानी व नियंत्रण के लिए सरकार को नया तंत्र विकसित करना होगा। वर्तमान व्यवस्थाओं में मनमानी रोकना सरकार के लिए वैसे ही मुश्किल है जैसे सोशल साइटों पर अफवाह रोकना या अश्लील सामग्री को नियंत्रित करना। देश में बुनियादी आइटी ढांचे के विकास व इसके प्रबंधन पर सरकार को जोर देना चाहिए।

नेट न्यूट्रलिटी के नियमों में कुछ चुनिंदा 'संवेदनशील सेवाओं' को छूट दी गई है। आने वाला समय इंटरनेट के इस्तेमाल से चलने वाले चालक-रहित वाहनों का है। डिजिटल हेल्थकेयर जैसी संवेदनशील सेवाओं के लिए इंटरनेट में थोड़ी-सी बाधा जानलेवा साबित हो सकती है। सरकार का यह तर्क वाजिब है कि ऐसी सेवाओं को सोशल साइटों के मुकाबले ज्यादा तरजीह मिलनी चाहिए। इसलिए आयोग ने चुनिंदा क्षेत्रों को नेट न्यूट्रलिटी के नियमों से अलग रखने का निर्णय लिया है ताकि उनके लिए प्राथमिकता सुनिश्चित की जा सके। ऐसी संवेदनशील सेवाओं की पहचान के लिए अलग कमेटी बनेगी। सामान्य तौर पर 'संवेदनशील सेवाओं' को छूट देने का निर्णय उचित है लेकिन यही वह बिंदु भी है जिसका दुरुपयोग हो सकता है। इसलिए इस श्रेणी की परिभाषा और स्पष्ट की जानी चाहिए। साथ ही यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि परोक्ष रूप से भी कोई इसका गैर-कानूनी लाभ न उठा पाए।

सुनील शर्मा
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