सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जुड़ा गांधी का अहिंसा मार्ग

महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर विशेष...

- गांधी ही थे जिन्होंने स्वाधीनता आंदोलन को व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करते उसे भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों से जोड़ा।

By: विकास गुप्ता

Updated: 30 Jan 2021, 08:47 AM IST

कलराज मिश्र, राज्यपाल, राजस्थान

अहिंसा का उनका हथियार ऐसा था जिसमें राज्य के दमन के सारे तर्क विफल हो जाते हैं। इसके बाद फिर भी लोगों को कुचलने के लिए कार्य होता है तो राज्य की अपनी नैतिकता दांव पर लग जाती है। महात्मा गांधी को हम सभी राष्ट्रपिता संबोधित करते हैं। जब भी उनके इस संबोधन पर गहराई से विचार करता हूं, राष्ट्र से जुड़े उनके आदर्श और सभी को साथ लेकर चलने की उनकी उदात्त दृष्टि जहन में कौंधने लगती है। गांधी ही थे जिन्होंने स्वाधीनता आंदोलन को व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करते उसे भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों से जोड़ा।

राष्ट्र के रूप में हमारे देश का विकास केवल यहां के भू-भाग और किसी राजनीतिक सत्ता के अस्तित्व के कारण नहीं, बल्कि पांच हजार से भी अधिक पुरानी हमारी संस्कृति के कारण हुआ है। एक बड़े भू-भाग में भाषा, क्षेत्रों की परम्पराओं में वैविध्यता के बावजूद इसीलिए हमारे सांस्कृतिक मूल्य निरंतर जीवंत रहे हैं। गांधीजी ने आजादी आंदोलन में इसी सांस्कृतिक जीवंतता को अहिंसा और नैतिक जीवन मूल्यों से जोड़ा। यही उनका वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद था जिसमें देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने हेतु आंदोलनों का नेतृत्व करते उन्होंने राष्ट्र को सांस्कृतिक दृष्टि से एक किया। राष्ट्र को सर्वोपरि रखते हुए उन्होंने अपने आंदोलनों में जन-जन की भागीदारी सुनिश्चित की। उनके लिए स्वाधीनता केवल अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति तक सीमित नहीं थी, बल्कि पूरे देश में स्वराज की स्थापना पर उनका जोर था। इसीलिए स्वदेशी को अपनाने के बहाने उन्होंने राष्ट्र और उससे जुड़ी वस्तुओं, संस्कृति से प्रेम करने की राह भी सुझाई।

गांधीजी का यह पक्ष भी मुझे हमेशा से प्रभावित करता रहा है कि राजनीति को दूसरे पक्ष के विरोध की बजाय उन्होंने सृजन और सहनशीलता से जोड़ा। चरखे पर सूत कातना, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना दूसरे पक्ष का विरोध नहीं, प्रत्यक्षत: सृजन सरोकार ही थे और सत्याग्रह सहनशीलता। लोगों में परस्पर सद्भाव जगाते जन-मानस में सकारात्मक बदलाव की उन्होंने पहल की। यह एक तरह से उनके द्वारा देश में गुलामी के दौर में भी लोकतांत्रिक संस्कृति का विकास करने जैसा था।

अंग्रेज देश को लम्बे समय तक गुलाम बनाए रखने की कूटनीति जानते थे, इसीलिए आजादी बहुत बार मिलते-मिलते रह जाती थी। पर गांधीजी ने चम्पारण सत्याग्रह के जरिए आजादी आंदोलन में इस तरह से राजनीतिक प्रवेश किया कि तब उनके नेतृत्व में लोगों ने न तो राज्य के विरुद्ध हिंसा की, न बगावत की। नील आंदोलन में ब्रिटिश सरकार द्वारा गांधीजी को जब प्रतिबंधित किया गया तो 1917 में उन्होंने न्यायाधीश के समक्ष अपनी जो बात रखी, वह आज भी मन में कौंधती है। उन्होंने कहा, 'कानून को मैंने तोड़ा है। इसके लिए आप मुझे सजा दे सकते हैं परन्तु मेरा अधिकार है कि मैं अपने देश में कहीं भी

आ-जा सकता हूं।' निडरता से, अहिंसक ढंग से तर्कसंगत अपनी बात रखने का उनका यह जो तरीका था वही आजादी आंदोलन का बाद में बड़ा मंत्र बना। उनकी बातों के तर्क और अहिंसापूर्ण तरीके के आंदोलन से अंतत: अंग्रेजों को चम्पारण आंदोलन में झुकना पड़ा। इस आंदोलन ने देश को वह राह दी जिसमें अलग-थलग पड़े पूरे देश का हिंसक-अहिंसक स्वरूप आजादी आंदोलन के रूप में पूरी तरह से संगठित हुआ और ब्रिटिश राज के खिलाफ अहिंसा एक कारगर हथियार बनी।

राज्य की हिंसा वैधानिक होती है और जनता की हिंसा बगावत मानी जाती हैै। बगावत को अनैतिक मानते हुए कुचलना कोई मुश्किल नहीं होता। इसलिए कि बहुत से मायनों में बगावत में अनैतिकता भी कई बार प्रवेश कर जाती है, ऐसे में राज्य को जनता की हिंसा को कुचलने की नैतिकता का हथियार मिल जाता है। अंग्रेजों ने अपने राज की आड़ में हमेशा यही किया। गांधीजी इस बात को जानते थे इसलिए उन्होंने राज्य की हिंसा का मुकाबला भारतीय संस्कृति में चली आ रही अहिंसा की परम्परा से करने का नैतिक साहस देश की जनता को दिया। अहिंसा का उनका हथियार ऐसा था जिसमें राज्य के दमन के सारे तर्क विफल हो जाते हैं। इसके बाद फिर भी लोगों को कुचलने के लिए कार्य होता है तो राज्य की अपनी नैतिकता दांव पर लग जाती है। गांधीजी ने अंग्रेजों को इस तरह मानसिक रूप से अशक्त करने का कार्य किया।
एक बड़ा पहलू गांधीजी के आजादी आंदोलन का यह भी था कि राजनीतिक आजादी के लिए वह सामाजिक सुधार को केन्द्र में लेकर आए। उन्होंने बार-बार कहा भी है कि राजनीतिक आंदोलन बगैर सामाजिक सुधार के सफल नहीं हो सकता। इसीलिए गांधीजी को किसी दल विशेष से जुड़ा नहीं कहा जा सकता। वह देश को इस रूप में पूर्ण स्वतंत्र करने के पक्षधर थे जिसमें अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के हित को नीति निर्धारण में रखा जा सके।

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