विकास की दौड़ में पहचान का संकट

गोवा 451 साल तक पुर्तगालियों का उपनिवेश रहा। यहां के रहन-सहन और खान-पान पर उसकी छाप है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पुर्तगाली शैली की बस्तियां हैं, जिन्हें उजाडऩे की बजाय संजोने की दरकार है।

By: Patrika Desk

Published: 13 Sep 2021, 02:02 PM IST

महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच स्थित गोवा में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं। सत्ताधारी भाजपा के साथ विपक्षी दल चुनावी गोटियां फिट करने में जुटे हैं। कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना क्षेत्रीय दलों को साधने की कोशिश में हैं। कोरोना संकट के बीच महंगाई और बेरोजगारी अहम मुद्दा है। चुनावी बुखार चढऩे में अभी वक्त है। विकास के दावों और वादों के बीच स्थानीय लोगों को गोवा की पहचान गुम होने की चिंता सता रही है।

अरब सागर किनारे बसे गोवा को भरपूर नैसर्गिक खूबसूरती मिली है। दूर तक फैला समंदर, ऊंचे पहाड़, नदियां, जंगल के साथ ऐतिहासिक धरोहरें दुनिया भर के सैलानियों को आकर्षित करती हैं। पर्यटकों की आवभगत के लिए सैकड़ों होटल खुले हैं। उद्योग-धंधे लगाए गए हैं। बहुमंजिली इमारतें, शॉपिंग मॉल खुल गए हैं। कोई इनके खिलाफ नहीं है। हर कोई विकास चाहता है। आगे बढऩा चाहता है। लेकिन, प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना।

गोवा 451 साल तक पुर्तगालियों का उपनिवेश रहा। यहां के रहन-सहन और खान-पान पर उसकी छाप है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पुर्तगाली शैली की बस्तियां हैं, जिन्हें उजाडऩे की बजाय संजोने की दरकार है। बौद्धिक तबका इसी को लेकर परेशान है। डर सता रहा है कि विरासत उजड़ गई, तो अगली पीढ़ी को क्या देंगे। यह भी कि आधुनिकता के अंधानुकरण के चक्कर में युवा पीढ़ी कहीं अपनी जड़ों को ही न भूल जाए। फिक्र इस बात की भी है कि नशे के अड्डे, मानव तस्करी, अश्लीलता या कसीनो गोवा की पहचान नहीं हो सकते।

- बसंत मौर्य

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