बचाव उपायों में सबके मन की सुनें सरकार

आधा दर्जन उच्च न्यायालयों सहित स्वयं सुप्रीम कोर्ट हर दिन कोरोना पर सरकारों को निर्देश दे, उनकी पालना की समीक्षा भी कर रहा है।

लगातार कोशिशों के बावजूद देश में न तो ऑक्सीजन की कमी दूर हो पा रही और न ही संक्रमितों को दवा- इंजेक्शन मिल पा रहे।

By: विकास गुप्ता

Published: 08 May 2021, 08:22 AM IST

अब तो चुनाव भी हो गए। तमाम जिम्मेदार राजनेता अपने-अपने ठिकाने आ बैठे। लगातार कोशिशों के बावजूद देश में न तो ऑक्सीजन की कमी दूर हो पा रही और न ही संक्रमितों को दवा- इंजेक्शन मिल पा रहे। सरकारों की नाकामियों से व्यथित जनता की उम्मीदों की आखिरी किरण न्यायपालिका भी खूब कोशिशें कर रही है। आधा दर्जन उच्च न्यायालयों सहित स्वयं सुप्रीम कोर्ट हर दिन कोरोना पर सरकारों को निर्देश दे, उनकी पालना की समीक्षा भी कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को भी दिल्ली और कर्नाटक से जुड़े ऑक्सीजन सप्लाई के दो मामलों में केन्द्र सरकार को आड़े हाथों लिया। कोर्ट ने कहा कि हर हाल में कर्नाटक को 1200 एमटी और दिल्ली को 700 एमटी लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन रोज मिलनी ही चाहिए। कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल के इन हताशा भरे शब्दों को भी अनसुना कर दिया कि हम उपलब्ध सारी ऑक्सीजन उच्च न्यायालयों के सुपुर्द कर देते हैं, वह बांट दें। उल्टे कोर्ट ने कहा कि हम उनसे 'आंख बंद करने को नहीं कह सकते।' इलाहाबाद हाईकोर्ट का लॉकडाउन आदेश याद करें। राज्य ने उसे नहीं माना और यूपी की जनता हर गांव में कोरोना को भोग रही है। यही हाल दिल्ली का है। हो सकता है कि अगले कुछ दिनों में कोर्ट और सख्त हों। सख्ती और सजा अपनी जगह है, जो आपराधिक लापरवाही करने वालों को दिखनी और मिलनी ही चाहिए।

सबसे बड़ी जरूरत राहत की है और सबसे बड़ा जिम्मा केंद्र सरकार का है। उसे नौकरशाही के घेरे से निकलकर सम्बन्धित पक्षों से चर्चा करनी चाहिए। चाहे विपक्ष हो या वैज्ञानिक, जनप्रतिनिधि हों या चिकित्सक या फिर दवा निर्माता कंपनियां, उन्हें मानना ही चाहिए कि अब तक जो हालात बने हैं, वह इस घेरे की सलाह की वजह से ही। यह बात अच्छी तरह समझनी होगी कि आवाज को दबाकर सच नहीं दबाया जा सकता, जैसा कि लखनऊ में अस्पताल के मामले में हो रहा है। इसलिए अब सबके मन की सुनेंं और न केवल इस लहर में और बड़े नुकसान से बचाव के उपायों पर अमल करें, बल्कि तीसरी और चौथी लहर के डर से बचाव की भी पुख्ता रणनीति बनाने पर ध्यान दें। कमियां स्वीकारने में कोई हर्ज नहीं, पर न्यायपालिका समेत सबकी सुनकर, यदि देश को आगे कोरोना के कहर से बचाया जा सकता है, तो सरकार को वह रास्ता बिना संकोच और देरी के अख्तियार करना चाहिए।

सरकारें तो आती-जाती रहेंगी, लेकिन जो लोग हमेशा के लिए दुनिया से विदा हो गए, उनकी यादें उनके अपनों और देशवासियों के दिलों से कभी नहीं जाएंगी। लापरवाही किसी की भी हो, वे उन्हें शायद ही माफ कर पाएं।

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विकास गुप्ता
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