अनुचित दबाव के आगे न झुके भारत

डब्लूटीओ समझौते के अनुसार भारत जितना आयात शुल्क लगा सकता है, वह उससे कहीं कम और सामान्यत: लगभग एक चौथाई आयात शुल्क ही लगा रहा है। कहा जा सकता है कि भारत अपने आयात शुल्कों को चार गुना भी कर दे तो भी वह डब्लूटीओ समझौते के अनुरूप ही होगा।

By: dilip chaturvedi

Published: 10 Mar 2019, 04:01 PM IST

अश्विनी महाजन, आर्थिक मामलों के जानकार

पिछले कुछ समय से डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन भारत सरकार से आर्थिक मुद्दों पर नाराज चल रहा था, पर अमरीकी प्रशासन ने अचानक भारत से जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रफेरेंसेस (जीएसपी) ट्रेड स्टेटस 60 दिन के भीतर वापिस लेने की घोषणा कर चौंका दिया। गौरतलब है कि भारत और कुछ अन्य देशों को अमरीका द्वारा व्यापार में प्राथमिकता देने वाला यह प्रावधान उन देशों को विश्व व्यापार संगठन के प्रावधानों से अलग कम या शून्य आयात शुल्क व्यापार करने की सुविधा देता रहा है। कहा जा रहा है कि यह सुविधा वापिस लिए जाने से भारत का 5 अरब डॉलर तक का व्यापार प्रभावित हो सकता है।

पिछले कुछ समय से नाराज अमरीका भारत को जीएसपी सूची से बाहर करने की धमकी देता रहा है। हालांकि भारत ने आधिकारिक तौर पर यह कहा है कि इसके कारण उसके निर्यातों पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा, लेकिन भारत के पास यह विकल्प खुला है कि वह भी जवाब के तौर पर अमरीकी आयातों पर शुल्क बढ़ा दे। यानी कहा जा सकता है कि इससे भारत और अमरीका के संबंधों पर प्रभाव पड़ सकता है।

अमरीका की नाराजगी के कई कारण हैं, पर वे सभी अमरीकी कंपनियों के आर्थिक हितों से जुड़े हैं। अमरीकी नाराजगी का त्वरित कारण यह है कि भारत सरकार ने अमरीकी ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा दिए जा रहे डिस्काउंट पर अंकुश लगा दिया है। ये कंपनियां भारी डिस्काउंट देकर छोटे व्यापारियों को रोजगार से बाहर कर रहीं थीं। इससे पहले नाराजगी की वजह यह थी कि भारत ने जनस्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु अपने पेटेंट कानून को अमरीकी कंपनियों के हित साधन के लिए बदलने से इंकार कर दिया था। कुछ समय पहले जब भारत सरकार ने स्टेंट और घुटनों के इम्प्लांट की कीमतों पर कैप (सीमा) लगाने का फैसला लिया, तब भी अमरीकी कंपनियों की नाराजगी जाहिर हुई थी।

कुछ समय पहले किसानों को राहत देने के लिए मोनसेंटो के बीटी कपास के बीज पर कीमत नियंत्रण लागू किया गया। इससे मोनसेंटो की लूट पर कुछ अंकुश लगा। वह कंपनी भी अमरीकी प्रशासन पर दबाव बनाकर भारत से रियायतों की अपेक्षा कर रही है। यही नहीं, अमरीकी प्रशासन का कहना है कि भारत अमरीका से आने वाले दूध पर से यह शर्त हटा दे कि केवल शाकाहारी गायों का ही दूध आयात होगा।

यानी दिखाई दे रहा है कि अमरीकी प्रशासन अपनी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से बांह मरोड़ कर उनके लिए रियायतें लेने हेतु भारत सरकार पर दबाव बना रहा है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अमरीकी प्रशासन भारत की नीतियों में जिस परिवर्तन की अपेक्षा कर रहा है, वह भारतीय जनता, किसान, व्यापारियों के हित में नहीं है। इसलिए यदि भारत सरकार अमरीकी दबाव में झुक जाती है तो दुनिया और भारतीय जनता में भी अच्छे संकेत नहीं जाएंगे। इसलिए अमरीकी प्रशासन भी जानता है कि उसे इस संबंध में भारत सरकार पर दबाव बनाने से अभी कुछ हासिल नहीं होगा। लेकिन शायद अमरीकी प्रशासन लंबी रणनीति के तहत यह कोशिश करेगा कि चुनावों के बाद सरकार उनकी बातों को मानकर अमरीकी कंपनियों को राहत दे।

कुछ लोगों का कहना है कि पुलवामा के आतंकवादी हमले के बाद भारत द्वारा पाकिस्तान को सबक सिखाने के उपक्रम में हमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग की महती आवश्यकता है। भारत को इस बाबत अमरीका की मदद भी मिली है। अमरीका, फ्रांस, रूस और ब्रिटेन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस आतंकवादी हमले की कड़ी भत्र्सना करवाने में भी भूमिका निभाई, जिसके चलते चीन भी इसकी खिलाफत नहीं कर पाया।

दूसरी ओर, कुछ लोगों की राय में कूटनीतिक कारणों से भारत को चाहिए कि वह अमरीका को नाराज नहीं करे। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि किसी भी देश, चाहे वो कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, की अनुचित मांगों को स्वीकार करना किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए अच्छा कदम नहीं माना जा सकता। हम जानते हैं कि अमरीका स्वयं को बहुत शक्तिशाली मानते हुए दूसरे मुल्कों पर अनावश्यक दबाव डालता है। यदि भारत उसकी अनुचित मांगों के सामने झुक जाता है तो इससे अमरीका की इस प्रवृत्ति को और बल ही मिलेगा।

अमरीका का यह कहना कि भारत उनकी कंपनियों पर अनुचित रोक-टोक लगा रहा है या भारत के आयात शुल्क बहुत ज्यादा हैं, जिसके कारण अमरीका के निर्यात प्रभावित हो रहे हैं, पूर्णतया असत्य और अनुचित है। जहां तक आयात शुल्कों का सवाल है, डब्लूटीओ समझौते के अनुसार भारत जितना आयात शुल्क लगा सकता है, वह उससे कहीं कम और सामान्यत: लगभग एक चौथाई आयात शुल्क ही लगा रहा है। कहा जा सकता है कि भारत अपने आयात शुल्कों को चार गुना भी कर दे तो भी वह डब्लूटीओ समझौते के अनुरूप ही होगा। इसलिए अमरीका का यह दबाव बनाना कि भारत अपने आयात शुल्क कम करे, डब्लूटीओ समझौते के खिलाफ है।

अमरीका का यह कहना कि उनकी कंपनियों को निर्बाध रूप से लाभ कमाने की छूट देने के लिए हम अपने पेटेंट कानून को बदल दें, सर्वथा अनुचित और डब्लूटीओ समझौते का उल्लंघन है। गौरतलब है कि सभी विशेषज्ञ इस बात पर सर्वसम्मत हैं कि भारत का पेटेंट कानून डब्लूटीओ समझौतों के अनुरूप है। दुनिया भर में यह मिसाल दी जाती है कि किस प्रकार डब्लूटीओ समझौतों का पालन करते हुए कोई देश अपने जनस्वास्थ्य की सुरक्षा पेटेंट कानूनों के माध्यम से कर सकता है।

अब जबकि अमरीका ने जीएसपी दर्जा वापिस लेने का तय कर ही लिया है तो भारत को राष्ट्रीय हितों के अनुरूप जनस्वास्थ्य, रोजगार और कृषि को बचाने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। हमें भूलना नहीं चाहिए कि 1999 में पोकरण विस्फोट के बाद अमरीका ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे। तब वाजपेयी सरकार ने अमरीका से इस बाबत बात भी नहीं की और अंततोगत्वा अमरीका ने अपने ही देश की कंपनियों के दबाव में सभी प्रतिबंध वापिस ले लिए थे। आज भारत 1999 की तुलना में और मजबूत अर्थव्यवस्था है, इसलिए लेखक, भारत को और दृढ़ता के साथ स्थिति का सामना करना चाहिए।

(दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन। स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक।)

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