scriptGulab Kothari Article on adulterated milk and system flaws | पूतना का दूध | Patrika News

पूतना का दूध

Gulab Kothari Article: खेती व पशुपालन को आसुरी वातावरण से बाहर निकालना पड़ेगा। यह आज की अनिवार्यता है। सरकारें मारने के लिए साल-दर-साल नए आंकड़े तय करेगी। देश का भविष्य युवा पीढ़ी के हाथों में है। हमें इस अमृत की रक्षा करनी है... मिलावटी दूध और व्यवस्था की खामियों पर चोट करता 'पत्रिका' समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विचारोत्तेजक अग्रलेख-

Updated: April 19, 2022 08:45:42 am

Gulab Kothari Article: यह देश आत्मा की शुद्धता के प्रयासों के लिए जाना जाता रहा है। भारत को योग भूमि और पश्चिम को भोग भूमि माना गया है। क्यों? जीवन में बाहर-भीतर का संतुलन, सात्विक चर्या, सात्विक अन्न, यज्ञ-दान-तप रूप शास्त्रोक्त कर्मों के लिए। वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा के लिए। हमारे यहां सर्वाधिक महत्ता अन्न की रही। 'जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन' जैसा संदेश साधारण व्यक्ति के लिए भी उपलब्ध रहा है। वैज्ञानिकों के लिए इसका आधार भी वैज्ञानिक ही था। इसके अनुसार पृथ्वी का पूर्वी गोलाद्र्ध इन्द्र के अधीन उष्णता का क्षेत्र है। पश्चिमी गोलाद्र्ध वरुण का शीत (सोम) प्रधान क्षेत्र है। अग्नि ऊर्जा है तथा सोम पदार्थ रूप है।

Gulab kothari Editor-in-chief of Patrika Group
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संस्कृति का प्रसार संत करते थे। स्थानीय भाषा की नृत्य-नाटिकाएं मन्दिरों के माध्यम से गांव-गांव पहुंचकर इस कार्य को करती थीं। आज के कथकली, भरतनाट्यम् हो अथवा गवरी और नौटंकी, सब का मूल स्वरूप और उद्देश्य यही था। इसीलिए सम्पूर्ण भारत एक ही शृंखला में जुड़ा रहा। प्रत्येक व्यक्ति इस परम्परा से बंधा था। तब देश में कोई अन्य धर्म-सम्प्रदाय पैदा नहीं हुआ था। सारा सन्देश सनातन जीवन का अंग था।

गौ इस देश में एक पवित्र शब्द रहा है। सूर्य की किरणों को गौ कहते हैं। हमारे लिए अग्नि-जल-अन्न-प्रकाश-वर्षा आदि का माध्यम गौ है। पृथ्वी पर गौ ही कामधेनु है। जिस प्राणी में सूर्य का गौ-तत्त्व सर्वाधिक रहता है, उसे भी गौ (गाय) कहते हैं। कृष्णावतार के स्वरूप के साथ बांसुरी, मोर पंख के साथ गौ को भी अभिन्न अंग बताया गया है। दूध, दही, मक्खन कृष्ण की बाल लीलाओं का प्रमुख अंग रहा है। कृष्ण ने जितना बड़ा संदेश मक्खन की महत्ता को लेकर दिया, उतना शायद ही विश्व में किसी अन्य भोग्य वस्तु को मिला होगा।

उन्होंने मक्खन खाने के लिए चोरी को भी पवित्र कर्म का रूप दे डाला। तब इससे अधिक जीवनदायी और चित् को प्रसन्न, तन-मन को स्वस्थ करने वाला अन्न कौनसा होगा भला? कृष्ण का तो नाम ही माखनचोर पड़ गया था। कृष्ण के स्वास्थ्य पर उस समय के असुरों की नजरें टिकी थीं। इससे बड़ा संदेश ही प्रमाण है कि गाय का दूध और दूध के उत्पाद हमारे जीवन की सर्वोच्च नियामत है।
समय परिवर्तनशील है। जो आज है, कल नहीं रहेगा। जो कल था, आज नहीं है। मनुष्य और असुर अलग-अलग पहचान रखते थे। आज दोनों एक ही शरीर में उपलब्ध हैं। न गाय वही है, न गाय का अन्न वही है, न दूध-दही-घी-मक्खन वही है। आज कृष्ण भी लौटकर आ जाएं तो इस दूध-मक्खन के तो हाथ नहीं लगाएंगे।

उन्होंने पूतना का दूध तो पी लिया, किन्तु आज की डेयरी के दूध का विषपान नहीं कर सकेंगे। शायद वे जानते थे कि पूतना का विषगर्भित दूध कैसा था। आज जो दूध हमें विज्ञान के लिबास में ढककर जनसेवकों द्वारा उपलब्ध कराया जाता है, उससे पूतना का दूध इन अर्थों में तो अच्छा ही था कि वह करोड़ों लोगों की जान लेने की क्षमता नहीं रखता था। एक बार में तो एक पर ही आक्रमण हो सकता था।

आज का नजारा क्या है? बड़े शहरों में तो ताजा दूध की उपलब्धता ही लगभग असम्भव हो गई। कानून ऐसे बन गए कि शहरों में दूध बेचने के लिए डेयरी-पशु रख ही नहीं सकते। मानो ताजा दूध एक अभिशाप हो। आपको नई तकनीक से तैयार 'पूतना का दूध' पीना पड़ेगा। पैसे के आगे जीवन छोटा पड़ गया है। पैसा देकर विष खरीदना भी एक अनिवार्यता बन गई है।
खेती पूरी तरह से विषाक्त हो गई। हर शरीर कैंसर जैसे रोगों के लिए एक प्रवेश द्वार बनने लगा है। रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, असंतुलित जल सिंचन, टे्रक्टरों से उर्वरा की हत्या, उन्नत बीज का झुनझुना! मौत की पहली आहट किसान के द्वार! वही चारा पशु का आहार। पशु-अन्न-बीज-मिट्टी सभी विषाक्त।

दूध की स्थिति सबसे गई-गुजरी। हजारों-हजार विभिन्न पशुओं का मिश्रित दूध, ठण्डा दूध, कई दिनों पुराना दूध, नकली दूध (सिन्थेटिक), इंजेक्शन वाला दूध, बीमार पशुओं का दूध, पाउडर का दूध, पानी मिला दूध, कीटनाशकों से प्रभावित दूध। और क्या चाहिए? सन् 2011 के खाद्य सुरक्षा तथा मानक विनियमों पर ही हमारा कानूनी निषेध प्रावधान लागू है।

मिलावटखोर आज पहले से अधिक। खाद्य निरीक्षकों की मिलीभगत, नकली कार्यवाहियां और बस! क्या इनमें से किसी के पास भी संवेदनशील हृदय है? क्या ये जानते हैं कि माताओं के दूध में कितना कीटनाशक नवजात शिशु को जन्म घुट्टी के रूप में मिलता है? इस देश में विष्णु का निवास ही क्षीर सागर में है। लक्ष्मी अर्ध विकसित देशों को अधिक झेलनी पड़ रही है।
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डेयरी का दूध उम्रभर का कोरोना बन गया। नाम बदलता रहेगा। कोरोना बहरूपिया बना रहेगा। एक तरफ भुखमरी, बेरोजगारी, अन्न में विष, दूध में विष, नकली दवाइयां और भी न जाने क्या क्या। मौत का स्थायी मंजर चारों ओर अट्टहास करते विकसित राष्ट्रों का दस्यु वैज्ञानिक वंश। निर्दयी-संवेदनाहीन।

बीस साल पहले तक सड़कें बनाने के नाम पर पेड़ काटकर लाखों पक्षियों को मारकर जेबें भरते थे। वह क्रम तो आज कई गुणा बढऩे के बाद भी छोटा लग रहा है। बाढ़ और सूखे की मौतें तो जन्मदिन का खर्चा भी नहीं उठा पाती। अब नर-संहार (सामूहिक) की विकसित परम्परा चल पड़ी। किसी भी विश्व युद्ध से अधिक लोग मरेंगे, किन्तु अपनी-अपनी सम्पत्तियां बेचकर, नरक की विभीषिका भोगकर।

चीन पहला निशाना बना। अब भारत की बारी है। दर्जनों देशों ने चीन से दूध का आयात बन्द कर दिया। सिंगापुर, भूटान, ब्रुनई, बांग्लादेश, घाना, फिलीपीन्स, मलेशिया, आइवरी कोस्ट, बुरुन्दी, गेबोन जैसे कई देशों के नाम हैं, जहां दूध का यह आयात-निषेध है। अब तो कुछ देश सभी तरह के डेयरी-उत्पादों पर प्रतिबन्ध लगाने लगे हैं।
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भारत इस दौड़ में अभी इतना आगे नहीं आया। पहले यहां कुछ बड़ी तबाही हो जाए। मरना तो पड़ेगा ही। अनाज, सब्जियां, फल-फूल सब विषाक्त हैं। जन्मघुट्टी से लेकर जीवन की मिट्टी तक विषाक्त होने लग गई। अनाज मुफ्त बंटने लगा है। पंजाब, हरियाणा, उत्तरी राजस्थान की आबादी ने भर्ती होना शुरू कर दिया है।

जीवन को इन दरिन्दों के हाथों से और खेती व पशुपालन को आसुरी वातावरण से बाहर निकालना पड़ेगा। यह आज की अनिवार्यता है। सरकारें मारने के लिए साल-दर-साल नए आंकड़े तय करेगी। देश का भविष्य युवा पीढ़ी के हाथों में है। हमें इस अमृत की रक्षा करनी है, प्रत्येक हृदय में बैठे ईश्वर को बचाना है।

मुझे याद है कि जब डेयरी प्रबन्ध ने दूध खरीद का नित्य नकद भुगतान शुरू किया तो गौ-पालक प्रसन्न हुए थे। हलवाई महीने में हिसाब करता था। नकद भुगतान ने सबको रातोंरात विदेशी बना दिया। बीडिय़ां तो सिगरेट में बदल गई और विदेशी शराब की नहरें बह निकलीं। सुबह का धनवान शाम तक निर्धन होने लग गया। नकद भुगतान के लालच में बच्चों का दूध भी बिकने लग गया।
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देश में जो हाल सहकारी बैंकों का हुआ वही, उससे कई गुणा अधिक भ्रष्टाचार डेयरी प्रबन्ध की पहचान बन गया। वहां भी प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ में प्रबन्ध रहने से सरकारों के वारे-न्यारे होते हैं। उनको माल भी कुछ ज्यादा शुद्ध मिलता है। अत: उन घरों में तो स्वास्थ्य रक्षा-क्षमता (इम्यूनिटी) और रोगों का आंकड़ा आसानी से उपलब्ध हो सकता है।

गुर्जर आन्दोलन के समय मैंने कर्नल बैंसला से कहा था कि आपका युवा वर्ग अपने-अपने गांव में ताजा दूध के केन्द्र खोल ले। उसे नौकरियों के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। होटलों से कई-कई गांव एक साथ जुड़ सकते हैं। फिर से देश में कन्हैया मुस्कुराने लगेंगे। पूतना के दूध से निजात मिल सकेगी। वैज्ञानिक ढंग से मरना कोई उपलब्धि नहीं है।
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