scriptGulab Kothari Article on Drug trade and apathy of governments | जानलेवा 'टस्कर' | Patrika News

जानलेवा 'टस्कर'

Gulab Kothari Article: देश के विभिन्न राज्यों में नशे का कारोबार किस तरह अपनी जड़ें जमा रहा है। इसकी लत का शिकार बच्चे-युवा बर्बाद हो रहे हैं। हालात दिनोदिन बिगड़ रहे हैं। सरकारों की उदासीनता और अकर्मण्यता पर चोट करता 'पत्रिका' समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विचारोत्तेजक अग्रलेख-

Updated: June 18, 2022 09:26:50 am

Gulab Kothari Article: पढ़ा-लिखा, होशियार अफसर जितनी हानि कर सकता है, उतनी अनपढ़ नहीं कर सकता। सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी का पेट अफसर ही चीर सकता है। पता नहीं कुर्सी बदलने के बाद अवसर मिले, न मिले। जिस गति से सरकारी जमीनें बिक रही हैं, उससे तो लगता है, आने वाली पीढिय़ों के लिए कुछ जमीनें बचेंगी भी या नहीं। सड़कें बनाने के नाम पर गांव-खेत उजड़ रहे हैं। सड़कें चौड़ी करने के मद में दोनों ओर के पेड़ कट जाते हैं-सैकड़ों मील तक। उन पर बसेरा करने वाले लाखों पक्षी काल के ग्रास में चले जाते हैं। बिजली चोरी करने वाले कौन? जलदाय, रोडवेज सार्वजनिक निर्माण जैसे विभाग जनता के बजाय सरकार की बपौती बन गए। किसी भी विभाग की बांबी में हाथ डालो, सांप डसते हैं, भले ही अगले जन्म में इनको जानवर बनना पड़े। टस्कर (हाथी) केवल जानवरों में ही नहीं होते। उधर वे झुंड में चलते हैं, खेतों-पेड़ों को रौंदते चलते हैं। इधर ये टस्कर भी तो समाज को रौंदने में ही लगे हैं। लेकिन डरता कौन है! इसका एक ही कारण है-सरकार भूखी है। कहीं चोरी करती है, कहीं डण्डा दिखाती है। यहां तक भी जनता सहन कर लेती है। लेकिन बात तब गंभीर हो जाती है, जब नौकर, मालिक के खानदान को उजाडऩे पर ही तुल जाए।
Gulab Kothari Editor-in-Chief of Patrika Group
Gulab Kothari Editor-in-Chief of Patrika Group

सुना है कि कलियुग में ऐसा ही होता है। मिट्टी का शरीर मिट्टी में मिल जाता है। यह कटु सत्य है। किन्तु मरने के बाद ऐसा होता है। आज नेताओं और अफसरों का कालाधन हथियारों और नशीली दवाइयों के माध्यम से देश को ही खा रहा है। सत्ता पक्ष के साथ पुलिस रहती है।

बिना पुलिस संरक्षण के नशे का जाल स्कूली छात्रों के कण्ठ पकड़ सकता है? नशे के इस माफिया के पीछे सरकारी तंत्र ही तो है। आय का कितना बड़ा स्रोत है। गृहविभाग सबसे बड़ा कमाऊपूत है-फाइलों के बाहर। देश की नई पीढ़ी को अपंग-नकारा करने वाले इस माफिया को क्या कहा जाए-भ्रष्ट, देशद्रोही?

आप कुछ नहीं कह सकते। सरकार स्वयं नशे के कारोबार में शामिल होती है। बगुला भगत की तरह। विभाग में पद का नाम है-'आबकारी एवं मद्य संयम आयुक्त' और करते क्या हैं? नशाखोरी के प्रसार की मॉनिटरिंग।
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इस वर्ष राजस्थान सरकार ने 15000 करोड़ रुपए की शराब बिक्री का लक्ष्य रखा है। बिक्री बढ़ाना ही नीति है। घटाई तो जुर्माना/ नकद गारंटी। बिक्री बढ़ाने वाला अधिकारी भी पुरस्कृत। लगभग 5000 करोड़ रुपए की अवैध शराब भी बिकती है राज्य में। गुजरात जैसे मद्य निषेध वाले प्रदेश की बड़ी सप्लाई राजस्थान होकर जाती है।

ये सब किसकी सहायता और भागीदारी से? राजस्थान ही नहीं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ से लेकर यूपी, पंजाब, हरियाणा सब जगह हालात एक जैसे ही हैं। चलिए छोडि़ए! ये आधुनिक विकासवादी युग के व्यापार हैं। जिन परिवारों में कष्ट भोगना लिखा है, वहां ऐसी कमाई जायज मानी जाती है। शायद हर युग में इसका स्थान होता है।

आजकल जिस कार्य का संचालन पुलिस, माफिया और परोक्ष रूप में सरकार कर रही है, वह है-बच्चों में नशाखोरी को लेकर योजनाबद्ध अभियान। पकड़ा जाए सो चोर! जयपुर की बापू बस्ती में छापा मारकर आठ को गिरफ्तार करना पुलिस की मजबूरी बन गया था।

धंधा तो कब से कहां-कहां नहीं हो रहा, पुलिस भी जानती है, स्कूल-कॉलेजों के संचालक भी जानते हैं। कमाई बांट रहे हैं। बच्चों को अभियान चलाकर, जाल में फंसाया जाता है। हो सकता है कुछ समय बाद स्कूलों में भी भांग-गांजे के पौधे मिलने लगें।
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कुछ वर्ष पूर्व बड़े निजी स्कूलों के पास थडिय़ों पर नशा बिकता था। समाज चिन्तित होने लगा तो सरकार नकली 'नशा मुक्ति' के अभियान चला देती। आज स्कूल-कॉलेजों में शरारती लोगों की गैंग काम करती है। ये लोग बच्चों को शुरू में मुफ्त में और बाद में सस्ती दरों पर नशा (भांग, गांजा, अफीम, डोडा, स्मैक, हेरोइन, एमडी ड्रग्स) उपलब्ध कराते हैं।

एक बार लत पड़ गई तो घर-परिवार चौपट। आप श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ जिलों को देख लें। नई पीढ़ी पांगळी (अपंग) होने लगी है। पुरानी पीढ़ी को शराब पी रही है। पूरा क्षेत्र शनै:शनै: कैंसर की भेंट चढ़ रहा है। दूसरी ओर कोटा-झालावाड़ में तो 'मानव चूहे' पैैदा हो गए।

बच्चे घरों में चोरियां करने लगे। पुलिस में एफआइआर होने लगी है। नई कौंपलें (12-13 वर्ष की आयु के बच्चे) हुक्काबार में नियमित जाने लगी हैं। बड़े स्कूलों का नाम 'रोशन' हो रहा है। वहां कई नाम चलते हैं आकर्षित करने के लिए। जैसे- फन्टास्टिक फ्राइडे।
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अब दवा के रूप में भी खुले आम नशा मिल रहा है। सस्ता व आसानी से उपलब्ध होने के कारण अब किसान और मजदूर वर्ग भी इस घेरे में उतर आया है। पंजाब से आने वाला 'चिट्टो' भी बहुत प्रचलन में आ चुका है। राजनीतिक युवा संगठन अपराध में पूर्ण रूप से लिप्त हो चुके हैं।

आज नशे के गोली-केप्सूल तक उपलब्ध हैं। पूरी पीढ़ी को जिन्दा खाया जा रहा है। सबके शरीर मिट्टी के (नकारा) होने लगे हैं। ये देश का भविष्य बनेंगे!

कुछ समय पहले यह प्रदेश देहरादून के पास रहने वाले माफिया की आश्रयस्थली रहा है। हर सरकार पांच साल में राज्य के एक हिस्से की बलि चढ़ा देती है। सरकारें किसी की भी आए, इस प्रक्रिया में कोई अंतर नहीं आता। उससे बड़ी क्या सेवा हो सकती है जनता की?
भीलवाड़ा में वर्ष 2021 में तस्करों ने दो पुलिसकर्मियों की गोली मारकर हत्या कर दी। जांच में तस्करों से मिलीभगत के दोषी पाए गए छह पुलिसकर्मियों को बर्खास्त भी किया गया। पुलिस मौन क्यों है? केवल दो-चार छापे मारने, दो-चार पुलिस कर्मियों को निलम्बित व बर्खास्त करने से जिम्मेदारी की इतिश्री मान ली?

क्या क्षेत्र के एसएचओ, सीआई, एसपी डीजीपी जैसे अधिकारियों को जेल नहीं जाना चाहिए? क्या स्कूल प्रबन्धकों को जेल नहीं जाना चाहिए? ईश्वर भी इनको माफ नहीं करेगा। किसी न किसी अभयारण्य में इनकी योनि रिजर्व हो चुकी होगी। ये मानव को पशु के समान ही लाकर छोड़ देते हैं।

ये लोकतंत्र के कैसे सेवक हैं? एक श्रेणी धन चुराती है, दूसरी धंधा करवाती है। कृष्ण भी शिथिल पड़े शरीरों में आंसू बहा रहे होंगे कि इन परिस्थितियों से तो कंस का कारागार भी अच्छा था। मुखौटा तो नहीं था।

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