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या तो योगी, या अखिलेश

उत्तरप्रदेश में चुनावी बिगुल बज चुका है। प्रधानमंत्री के दौरे, अखिलेश की रथयात्रा तथा साधु-संतों के प्रवचन, आरती-प्रार्थना सभाएं चरम पर हैं। अतीत के पन्नों से निकलकर उत्तरप्रदेश की राजनीति आज नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। उत्तरप्रदेश के समूचे राजनीतिक परिदृश्य को समझने के लिए पढ़ें 'पत्रिका' समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठरी का यह अग्रलेख -

नई दिल्ली

Updated: December 25, 2021 07:36:08 pm

परिवर्तन शाश्वत है, नित्य है। प्रत्येक क्षेत्र में, प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। व्यक्ति भी हर पल कुछ जानता रहता है, करता रहता है। तब राजनीति कैसे अछूती रह सकती है? क्या पं. जवाहर लाल नेहरू और इन्दिरा गांधी में विरोधाभास नहीं था? क्या राहुल- प्रियंका भी इंदिरा गांधी अथवा राजीव जैसे हो सकते हैं? फिर उत्तराधिकारी के रूप में न तो अखिलेश, मुलायम सिंह हो सकते हैं, न ही मायावती- कांशीराम। बस इसी परिवर्तन पर उत्तरप्रदेश विधानसभा के आम चुनावों का आधार होगा। अर्थात जो अब तक नहीं हुआ, वही होने वाला है। अपने संवाद सेतु कार्यक्रम के तहत पिछले दिनों उत्तरप्रदेश दौरे में जो कुछ देखने- सुनने को मिला, उससे तो यही अनुमान लगता है। इस दौरान प्रमुख शहर-कस्बों में समाज के सभी वर्गों के लोगों से मुलाकात भी हुई। लोगों ने भूलकर अपने मन की बात कही।
Gulab Kothari Article
वाराणसी नया वैश्विक स्तर का पर्यटन स्थल बन रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा काशी कॉरिडोर के उद्घाटन ने एक नई लहर का संचार किया। सभी दूतावासों के कार्यालय यहां खुल जाएंगे। शहर का आधुनिकीकरण हो गया। यही दृश्य जेवर हवाईअड्डा एवं कुशीनगर के बौद्ध धाम यात्रा केन्द्र का हो चुका है। इनके अतिरिक्त उत्तरप्रदेश में कई राष्ट्रीय परियोजनाओं पर कार्य हो रहा है। इसका संदेश यही जा रहा है कि मुयमंत्री योगी आदित्यनाथ की जगह, प्रधानमंत्री मोदी ही कार्य कर रहे हैं। कई जिलों में उनके दौरे हो चुके हैं। ये भी असामान्य बात मानी जा रही है।

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उधर, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने रथ यात्रा शुरू कर दी है। प्रियंका गांधी ने महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की बात शुरू की है। पोस्टर लगाने की होड़ है। रायबरेली में स्मृति ईरानी के पोस्टर शहर भर में अटे पड़े हैं। मायावती पर टिकटों के लिए मोल-भाव शुरू करने के आरोप लगने शुरू हो गए हैं। मुस्लिम मतदाता मौन है, किन्तु सभी दलों की नजरें इन्हीं पर टिकी हुई हैं। चुनाव का शंखनाद हो चुका है। इस बार नया गणित उभरता दिखाई पड़ रहा है। चुनाव मुय रूप से दो ही दलों में होता जान पड़ता है। भाजपा और सपा आमने-सामने हैं। बसपा और कांग्रेस दोनों को चर्चा से लगभग बाहर ही माना जा रहा है।

जिस प्रकार राहुल गांधी को राजनीति विरासत में मिली, कुछ करना नहीं पड़ा, वैसी ही राजनीतिक विरासत अखिलेश यादव को भी मिली। दोनों में जोश जरूर है पर अपेक्षित संवेदना नजर नहीं आती। बातचीत करने पर लोग बताते हैं कि अखिलेश के व्यवहार के कारण लोग दूर ही हुए हैं। जहां मुलायम सिंह के साथ ब्राह्मण व राजपूत नेता भी थे वहीं अखिलेश पर जाति विशेष को तवज्जो देने का आरोप लगता रहा है।

आरोप यह भी है कि कोरोना के दौर में भी अखिलेश, विपक्ष के नेता के रूप में मौन ही नजर आए। कांग्रेस के कमजोर पड़ जाने से अखिलेश की निगाहें मुस्लिम वोटों पर टिकी हैं। रथयात्रा शुरू कर दी है किन्तु मुलायम की टीम साथ नहीं दिखती। हालांकि पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का क्षेत्र समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता है पर माना यह भी जा रहा है कि एक ओर ओवैसी की पार्टी मुस्लिम वोटों को बांटेगी वहीं दूसरी ओर भीम पार्टी के चन्द्रशेखर दलित मतदाताओं में बिखराव पैदा करेंगे। ऐसे में मायावती भी सिमटने को है और कांग्रेस भी। कांग्रेस में केवल प्रिंयका गांधी के हाथ में कमान है।
लंबे समय तक कांग्रेस के पास रही अमेठी सीट पर आज स्मृति ईरानी प्रतिष्ठित हैं, जो इस बार रायबरेली की चुनाव प्रभारी होंगी। रायबरेली पहले इन्दिरा गांधी और अब सोनिया गांधी की प्रतिष्ठित सीट है। इसीलिए केन्द्र सरकार के बड़े-बड़े संस्थान तो वहां पर बन गए, किन्तु नीचे के लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। आप रायबरेली के बाजारों से गुजरें तो मेरी बात पर भरोसा हो जाएगा। आपको लगेगा कि जब से बाजार बने हैं, तब से आज तक किसी दुकान/मकान की एक ईंट नहीं बदली है। जो टूट गया सो खण्डहर, जो खाली सो खाली।

दर्जनों दीवारें ढह चुकी हैं, खड़़ी हैं वैसे ही, जैसे लोराइड युक्त पानी पी-पीकर वहां लोग खड़े हैं अपने अष्टवक्र अस्थिपंजर के साथ। आज भी आसपास के गांव-ढाणियों में घास-फूस के झोंपड़े हैं। एक झोंपड़े में आग लगते ही पूरा गांव सुलग उठता है। अमेठी तो बहुत पीछे है।
मायावती धूमकेतु की तरह राजनीतिक क्षितिज पर उभरी थी। उसी तेजी से राजनीतिक अवसान भी हुआ। मूर्तियां लगवा डाली। सीट जीतने के पहले ही टिकट देने में जो विवाद उठे उसी वजह से राजनीति का दाव हार गईं। भीम आर्मी भी बसपा की जमीन खिसकाने में लगी है। ऐसे में अब उठने की संभावना बहुत अधिक नजर नहीं आती। लग यही रहा है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच ही मुकाबला होगा, बिना किसी लहर के।
योगी आदित्यनाथ की छवि ईमानदार नेता की है। लोगों का कहना है कि भाजपा शासन में अपराध घटे हैं। सपा पर अपराधियों को प्रश्रय देने के आरोप कम नहीं लग रहे। लगभग बीस तो ऐसे ठिकाने (रियासत काल के) थे, जो सत्ता के बल पर स्वयं अपराधी भी थे और कुछ अत्याचारी भी। कुछ जेलों में हैं, कुछ सिमटकर मौन हो गए। इनमें से हर कोई तो समृद्ध है,बाहुबली है। आप देख सकते हैं कि इनके आसपास की सीटों पर दूसरा कोई नहीं जीत पाता। ये ही सत्ता के समीकरण भी तय करते हैं और मंत्रिमण्डल में भी स्थान प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। न्यायपालिका अपने फैसले देती रहती है। इस बार इनके तेवर ढीले पड़े हैं। कुछ भाजपा की ओर देख रहे हैं, कुछ सपा की ओर। स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।
उत्तरप्रदेश में मुस्लिम आबादी लगभग बीस प्रतिशत है। लगभग तीन दर्जन सीटों पर तो उनका बाहुल्य है। इनका अपना कोई बड़ा चेहरा नहीं है। औवेसी का अस्तित्व नगण्य है। मुतार अंसारी और अतीक अहमद जैसे बाहुबली नेता तो इस बार जेलों में बंद पड़े हैं। इनका पूर्वांचल में दंबगई का दूसरा रूप हैं। अभी 25 विधायक हैं। इनमें बसपा के पांच, कांग्रेस के दो विधायक मुस्लिम हैं। लगभग 70 सीटों पर इस समुदाय के मतदाता 30 प्रतिशत से अधिक हैं। सपा को मुस्लिम मतदाताओं पर भरोसा है। हालांकि तीन तलाक कानून के कारण महिला मतदाताओं में बिखराव अवश्यंभावी है। मुत राशन, सहायता राशि, प्रधानमंत्री आवास योजना भी इनको लगभग डेढ़ करोड़ आवासों का बीस प्रतिशत हिस्सा प्राप्त हुआ है।
भाजपा सत्तादल है। इसने कई कल्याण योजनाएं लागू कर रखी हैं। अधिकांश योजनाओं की राशि लाभार्थियों के बैंक खातों में ही जाती है। स्कूल फीस, पुस्तकों की राशि भी अभिभावकों के खातों में जाती है। कोरोना प्रभावित मजदूरों के खातों में प्रतिमाह एक हजार रुपए, जनधन में प्रति महिला ५०० रुपए प्रतिमाह, हाथठेला-फुटपाथी दूकानदारों को बिना गारण्टी १० हजार रुपए का ऋण, कुहारों को बिजली के चाक, मिट्टी गूंथने की मशीन तथा मिट्टी आदि का वितरण किया जाना शामिल है।

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जनता में चर्चा है कि सन 2007 में मायावती ने मुलायम सिंह को ठीक किया था। सन 2011 में लगी मूर्तियां उसी माया को ले डूबी। वर्ष 2012 में सत्ता में आए अखिलेश ने मुस्लिमों का तुष्टीकरण करके छवि बिगाड़ ली। हालांकि अब तो विधानसभा में विपक्ष के नेता सपा के राम गोविन्द चौधरी का तो यहां तक आरोप है कि इस बार विधायकों तक का महत्त्व समाप्त हो गया है। उधर भाजपा ने दलितों को रिझाने के लिए अबेडकर पंचतीर्थ योजना के अलावा कुंभ में दलितों के पांव धोने तक का आयोजन किया। एक नया दल 'अपना दल' प्रभावी ढंग से नीचे के तबके में लोकप्रिय हो रहा है-अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व में। यह दल मानता है कि अगले दो चुनावों में सपा भी सिमट जाएगी तथा अपना दल उसका स्थान ले लेगी।
कुल मिलाकर उत्तरप्रदेश में चुनावी बिगुल बज चुका है। प्रधानमंत्री के दौरे, अखिलेश की रथयात्रा तथा साधु-संतों के प्रवचन,आरती-प्रार्थना सभाएं चरम पर हैं। हर विधायक अपने क्षेत्र में गंगा पर पक्के घाट बनवा रहा है। भाजपा का एक चुनावी दाव यह भी है कि उसके शासनकाल में एक भी दंगा नहीं हुआ। उधर मायावती को भी ब्राह्मण सम्मेलनों के दो प्रयास करके इनका आयोजन बंद करना पड़ा है। रस्साकसी चालू हो गई। परिणाम अभी कुछ दूर है, किन्तु इतने धुंधले भी नहीं हैं।

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