scriptGulab Kothari Article Sharir hi Brahmand 26 march 2022 | शरीर ही ब्रह्माण्ड: वर्तमान में रहना ही पूजा | Patrika News

शरीर ही ब्रह्माण्ड: वर्तमान में रहना ही पूजा

Gulab Kothari Article Sharir hi Brahmand: धर्म आत्मकेन्द्रित होता है। विवेक पूर्ण कर्म करने का निर्णय, कर्म पूर्ण रूप से नियंत्रित, तन्मयता ही पूर्जा-कर्म कहलाता है। इसमें न अतीत को स्थान मिलता है, न अनागत को। वर्तमान, बस। कर्ता, कर्म, वर्तमान तीनों एकाकार। समय में रहने को ही धर्म कहा है। 'शरीर ही ब्रह्माण्ड' श्रृंखला में 'धर्म' और 'अधर्म' को कृष्ण ने किस प्रकार स्पष्ट किया है, समझने के लिए पढ़िए पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विशेष लेख

Updated: March 26, 2022 11:13:01 am

Gulab Kothari Article Sharir hi Brahmand: धर्म शब्द का अर्थ है- धारण करने वाला-'धारणाद्धर्ममित्याहु:'। इस अवधारणा के मूल में यह भावना है कि जगत के प्रत्येक पदार्थ की स्थिति कुछ नियमों पर होती है। कोई भी पदार्थ तभी तक स्थित रहता है जब तक उन नियमों का अनुसरण होता रहता है। नियमों के उल्लघंन से उस पदार्थ के अस्तित्व के लिए संकट उत्पन्न हो जाता है। अस्तित्व का हम तीन श्रेणियों में वर्गीकरण कर सकते हैं। पहली-सम्पूर्ण जड़-चेतन का अस्तित्व जिसे हम ब्रह्माण्ड कहते हैं। दूसरी-मनुष्यों के समूह का अस्तित्व, जिसे समाज कहा जाता है और तीसरी-व्यक्ति का अस्तित्व। इन तीन प्रकार के अस्तित्वों के संरक्षण के लिए तीन ही प्रकार के धर्म है-ब्रह्माण्डकेन्द्रित, समाजकेन्द्रित और व्यक्तिकेन्द्रित। इसी आधार पर मनु ने धर्म के चार स्रोत बताए हैं-''श्रुति: स्मृति: सदाचार: स्वस्य च प्रियमात्मन:।'
वर्तमान में रहना ही पूजा
वर्तमान में रहना ही पूजा
इनमें ब्रह्माण्डकेन्द्रित धर्म का प्रतिपादन श्रुति करती है, समाजकेन्द्रित धर्म का प्रतिपादन स्मृति करती है और व्यक्तिकेन्द्रित धर्म का आधार सदाचार और आत्मा की प्रियता है। इनमें ब्रह्माण्डकेन्द्रित धर्म ही समाजकेन्द्रित धर्म और व्यक्तिकेन्द्रित धर्म का भी आधार बनता है। इसलिए धर्म के चार स्रोत होने पर भी उसका मूल श्रुति ही है-'वेदोऽखिलो धर्ममूलम्'।

परमेश्वर ने इस सृष्टि में अनन्त अपरिमित शक्तियों को उत्पन्न किया है। इनमें ज्ञानशक्ति एवं क्रियाशक्ति ये दो ही शक्तियां प्रधान हैं। अन्य सभी शक्तियों का इन्हीं दोनों शक्तियों में अन्तर्भाव है। इनमें इस ज्ञानशक्ति से वेद का तथा क्रियाशक्ति से धर्म का सम्बन्ध है। क्रियाशक्ति की अपेक्षा ज्ञानशक्ति की प्रधानता है।

जिस पदार्थ से सत्ता का पता चलता है वह ज्ञानशक्ति है तथा जिससे क्षोभ (हलचल या गतिविधि) का बोध होता है वह क्रियाशक्ति है। एक ही वस्तु में क्षणभर के लिए असत् एवं अनेक क्षोभ का अनुसरण होने से भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का ज्ञान होता है। सत्ता के क्षोभरूप न होने से ज्ञानशक्ति नित्य तथा एक है।
क्षोभ चूंकि क्षणिक होता है यानी क्षोभ के सत्तारूप न होने से उससे सम्बन्धित क्रियाशक्ति को सत्तारहित बताया गया है। क्रियाशक्ति के सत्तारहित होने से वह ब्रह्म द्वैतभाव से रहित है। यह सम्पूर्ण सृष्टि ब्रह्म ही है। इस सृष्टि में नानात्व नहीं है।

सत्-चित् और आनन्द ही ज्ञानशक्ति है। यह सत् है, यह चित् (ज्ञानरूप) है, यह आनन्द है। ये तीन शाखाएं जिस एक मूलशक्ति से उत्पन्न होती है वह मूलशक्ति, ज्ञानशक्ति के नाम से जानी जाती है। यदि ज्ञानशक्ति की सत्ता न हो तो क्रियाशक्ति में प्रतीत होने वाले सत्त्व, चैतन्य तथा आनन्द का पता ही नहीं चलेगा। क्रियाशक्ति धर्म तथा ज्ञानशक्ति धर्मी है।

यही कारण है कि क्रियाशक्ति की व्यवहार दशा में उसमें किया जाने वाला भेद काल्पनिक है। परमार्थ भाव की दशा में तो उसका अभेद ही वास्तविक है। अत: यह सब कुछ दृश्यमान पदार्थ ज्ञानशक्ति ही है। उस धर्म मेे क्रियाशक्ति के वैचित्र्य से अनेक रूप हो जाने के कारण जहां क्रिया विशेष में ज्ञानशक्ति का स्वरूप अंश मात्र भी दिखाई पड़ता है वह सत्त्वप्रधान क्रियाशक्ति कहलाती है।
जिस क्रिया में पूर्णरूप से ज्ञानशक्ति स्वरूप का अभाव रहता है वहां यह तमस् प्रधान क्रियाशक्ति होती है। इस तरह क्रियाशक्ति की द्विविधता से सारा संसार जड़-चेतन रूप दो भागों में विभक्त हो जाता है। सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति का मूल तथा सृष्टि का पालन करने वाली क्रिया रजस् शब्द से प्रतिपादित की जाती है।

यह क्रिया संचर एवं प्रतिसंचर स्वभावभेद से दो तरह की होती है। संचर निरन्तर प्रवृत्त कराने वाली प्रवृत्ति है। प्रतिसंचर, मार्ग से विमुख कराने वाली प्रवृत्ति है। ऊपर के (भुव:, स्व:, मह:, जन:, तप: एवं सत्य) लोक में सत्त्वगुण प्रधान सृष्टि है। अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल, पाताल नाम के अवर (नीचे के) लोकों में तमोगुण प्रधान सृष्टि है। मध्यलोक अर्थात् पृथ्वी पर रजोगुण प्रधान सृष्टि है। यह त्रिविध सृष्टि ब्रह्मा से लेकर वृक्ष-लतादि पर्यन्त है।

उस ज्ञानशक्ति के रजोगुण से युक्त होने से तमोलक्षण प्रकृति की प्रधानता होने पर पृथ्वी, जल, तेज, वायु आकाश आदि तत्त्वमूलक सामग्री की उत्पत्ति होती है। क्षोभलक्षण वाली प्रकृति की प्रधानता होने पर मूल अर्थात् निम्न योनियों- पशु आदि से लेकर जीवों की उत्पत्ति होती है। सत्व लक्षण वाली प्रकृति के प्रधान होने पर श्रेष्ठ जीवों की उत्पत्ति होती है। इस तरह से यह भूतों की त्रिविधिता होती है।
क्रिया से विशिष्ट ज्ञान ब्रह्म तथा ज्ञान से विशिष्ट क्रिया कर्म कहलाती है। ज्ञानशक्ति का स्वरूप ज्ञानेन्द्रिय की विद्यमानता में ही प्रतीत होता है। श्रोत्र-त्वक्-चक्षु-जिह्वा तथा घ्राण ज्ञानेन्द्रियां हैं। वाक्-पाणि-पाद-पायु एवं उपस्थ कर्मेन्द्रियां हैं।

इन दोनों ही के अधिष्ठाता देवता दो तरह के हैं-मन एवं प्राण। प्राण के सहायक मन के साथ ज्ञानेन्द्रियां तथा प्राणयुक्त रहते हैं। मन के सहायक प्राण के साथ कर्मेन्द्रियां तथा प्राणयुक्त रहते हैं। इसलिए मन के साथ एकादश इन्द्रियाँ तथा प्राण के साथ एकादश प्राण युक्त होते हैं।

कई बार प्रश्न उठता है कि धर्म करने के लाभ भी होते हैं क्या, अथवा व्यक्ति केवल तपता ही रहता है। धर्म का व्यवहार में क्या स्वरूप होता है? जीवन को देखने का ढंग है धर्म, क्या बनना है-इसके लिए संकल्पित होना है धर्म। होने अथवा बनने में दैवी सहायता की अपेक्षा हो तो कर्ता आस्तिक कहलाता है।
स्वयं के बूते पर ही जीने का निर्णय उसे नास्तिक बना देता है। वह सभी प्रकार की मर्यादाओं से सदा ही मुक्त है। इसके विपरीत धर्म आत्मकेन्द्रित होता है। विवेक पूर्ण कर्म करने का निर्णय, कर्म पूर्ण रूप से नियंत्रित, तन्मयता ही पूर्जा-कर्म कहलाता है।

इसमें न अतीत को स्थान मिलता है, न अनागत को। वर्तमान, बस। कर्ता, कर्म, वर्तमान तीनों एकाकार। समय में रहने को ही धर्म कहा है। धर्म या अधर्म जैसे सन्देह जीवन काल में अनेक बार आते हैं। ऐसे अवसरों पर पर निर्णय कैसे किया जाए, यही कृष्ण ने स्पष्ट किया है। जो कर्म में अकर्म को तथा अकर्म में कर्म को देखता है मनुष्यों में वही बुद्धिमान तथा वही समस्त कर्मों को सम्पन्न करने वाला योगी है-


कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य:।
स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत्।। गीता 4.18
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शरीर ही ब्रह्माण्ड: अभाव ही बन्धन

कार्य और अकार्य ही धर्म तथा अधर्म है। इनका निर्णय ही गीता का प्रथम प्रयोजन है। धर्म का अन्तिम लक्ष्य मोक्ष है। गीता का भी मुख्य प्रयोजन मोक्ष है। धर्म का अर्थ है स्वरूप रक्षा, मोक्ष ही बन्धन मुक्ति है। यह इच्छा प्राणिमात्र में स्वाभाविक है। परिवार भी स्वरूप है।

व्यक्ति जब कुटुम्ब वाला बन जाता है तब सन्तान आदि को अपने स्वरूप में ही निहित मानने लग जाता है। इसीलिए सन्तान आदि कुटुम्बियों की रक्षा करना उसका धर्म बन जाता है। समाज भी उसका एक स्वरूप है। समाज के सुख की रक्षा भी उसके लिए जरूरी है। तब समाज के उपयुक्त सत्य, अहिंसा, दया आदि भी उसके धर्म में शामिल हो जाते हैं।

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यश-शरीर भी धर्म का हिस्सा है। जैसे कि सम्राट दिलीप ने गाय को सिंह से बचाने के लिए सिंह के समक्ष स्वयं के शरीर को प्रस्तुत कर दिया था। सिंह ने समझाया कि मूर्ख मत बनो, अपने शरीर की रक्षा करो। सम्राट दिलीप का कहना था कि पंचमहाभूत का शरीर तो नष्ट होना ही है, तुम मेरे यश- शरीर पर दया करो। महर्षि दधीचि ने भी तो इसी प्रयोजन के लिए वज्र निर्माण हेतु अपनी अस्थियां प्रस्तुत कर दी। यश की रक्षा के लिए शरीर त्यागना भी उचित लगा।

स्वरूप ज्ञान के अनुसार धर्म ज्ञान भी विस्तार पाता है। तीनों शरीरों की तथा मुख्य आत्मा के स्वरूप की रक्षा धर्म का आध्यात्मिक रूप है। इसमें आधिदैविक शिक्षा जोड़ देने पर सर्वधर्म समभाव- सबमें एक ही आत्मा दिखती है। स्व/पर के भेद से दूर हो जाता है। चींटी से हाथी तक सबमें समान धर्म है। धर्म का प्रयोजन अर्थ को मानना, लौकिक उन्नति के लिए धर्माचरण करना भूल है। केवल मोक्ष ही धर्म का उद्देश्य है। क्रमश:

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