मानवता की फसल

भारत को स्वतंत्र हुए कागजों में सत्तर साल से अधिक हो गए, किन्तु हमारे संविधान के रखवाले मन से भारतीय हुए ही नहीं। इनके बनाए हुए कानूनों को हमें समझने का प्रयास करना चाहिए। अधिकांश कानून या तो भारतीय जीवन शैली से मेल नहीं खाते अथवा कानूनों का लाभ सीधा-सीधा सत्ताधीशों को मिल रहा होता है।

Shri Gulab Kothari

21 Jan 2020, 12:35 PM IST

गुलाब कोठारी

भारत को स्वतंत्र हुए कागजों में सत्तर साल से अधिक हो गए, किन्तु हमारे संविधान के रखवाले मन से भारतीय हुए ही नहीं। इनके बनाए हुए कानूनों को हमें समझने का प्रयास करना चाहिए। अधिकांश कानून या तो भारतीय जीवन शैली से मेल नहीं खाते अथवा कानूनों का लाभ सीधा-सीधा सत्ताधीशों को मिल रहा होता है। संसद एक ऐसी प्रयोगशाला बन गई है, जहां सत्ता में बैठी कोई भी पार्टी जनता पर प्रयोगधर्मी कानून बनाती रहती है। उनके कानूनों का स्वरूप पाश्चात्य देशों के कानूनों को प्रतिबिम्बित करता है।

अब तक के जनप्रतिनिधियों में सम्पूर्ण राष्ट्र को एक ही धागे में माला की तरह देखने वाले तो बहुत कम ही थे। अधिकारियों पर ही निर्भर रहते थे। अधिकारी वर्ग ने तो आज तक भी भारतीय जीवन शैली को स्वीकार नहीं किया है। उनके निजी अथवा पारिवारिक जीवन पर दृष्टि डालकर देख सकते हैं। अभी तक तो आम आदमी को बराबरी का भी नहीं मानते। प्रशिक्षण भी अंग्रेजी तर्ज पर दिया जाता है। जिस प्रकार के कानून बनते हैं, वे भारतीय जीवन में प्रवेश तक नहीं कर पाते और कानूनों के हवाले से नागरिकों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाइयों की एक बाढ़ सी आ जाती है, मानो वे इस देश के नागरिक ही नहीं हैं। कानून में व्यक्ति का कोई सम्मान नहीं है। पुलिस का व्यवहार देख लीजिए, कानून की कछुआ चाल देख लीजिए, चाहे नेताओं के वादे याद कर लीजिए-कहीं जनता के प्रति दर्द दिखाई नहीं देता। सत्ता में आने के बाद जनता के घोड़े पर सवार होकर पांच साल में जनता के नाम पर जो कुछ जनता के लिए किया जाता है, वह लोक का हित साधक तो नहीं कहा जा सकता।

पिछले दो दिनों से संघ प्रमुख मोहन भागवत जनसंख्या पर अपना वक्तव्य दे रहे हैं। वे भी देश को सत्ताधीश की तरह ही सम्बोधित कर रहे हैं। यही जनसंख्या का मुद्दा कभी परिवार नियोजन के नाम पर महान गृह संग्राम देख चुका है। जनता पर सरकारी निर्देश, जोर-जबरदस्ती का एक अचिन्त्य वातावरण बना हुआ था। इसकी सजा भी सत्ताधीशों को भुगतनी पड़ी थी। चीन में 'एक दम्पत्ति-एक संतान' का अध्यादेश लगभग तीन दशक पूर्व जारी हुआ था। सन् 2016 में 'दो संतान' की नीति लागू की गई। संघ प्रमुख के नाते भागवत का किसी भी विषय पर बोलना बहुत महत्वपूर्ण है। इसीलिए जनसंख्या पर उनके बयान चर्चा में ही नहीं आए अपितु लोग उनके अपने-अपने अर्थ भी लगाने लगे।
यह किसने तय किया कि कौन भारत में पैदा होगा और कौन किसी दूसरे देश में? संतान का पैदा होना और कितना पैदा करना, सरकार का अधिकार क्षेत्र होना चाहिए अथवा प्रकृति का? क्या परिवार नियोजन से सम्बद्ध कानून और इन्हें लागू करने के नियम प्रकृति को चुनौती नहीं हैं। किसी एक शासन की नीतियों का नुकसान पूरा देश भुगते, फिर दूसरा शासन कहे-'भविष्य में आप ज्यादा संतानें पैदा करेंगे।' आपको इसलिए सुविधाएं, नौकरी में प्रोत्साहन दिए जाएंगे। नहीं तो कठोर दण्ड भी मिल सकता है। कभी पैदा करने पर सजा, कभी पैदा न करने पर सजा! वाह, इंसान क्या हुआ, सत्ताधीशों की प्रयोगशाला हो गई। आपकी मर्जी नहीं चलेगी। यह लोकतंत्र है। आपकी संतान होना, न होना, आपका नहीं राज्य का दायित्व है।


क्या देश भूल गया नसबन्दी अभियानों को, सरकारी आंकड़ों की अनवरत गगनचुम्बी इबारत को। लाखों महिलाओं के ऑपरेशन सरकारी अमले ने करवाए होंगे, कितने दलाली करने वालों के घर रोशन हुए थे। जब सरकार आबादी नहीं चाहे, तो आपको नसबन्दी करानी ही पड़ेगी। गली-गली में गर्भनिरोधक सामग्री का प्रचार-मुफ्त वितरण। नहीं मानों तो सजा। जब सरकार कहे 'हो जाओ शुरू', और चल पड़ो। आज चीन के हालात देखकर भारत भी चिन्तित होने लगा है, कि जो हालात हठधर्मिता से किए गए परिवार नियोजन ने चीन में पैदा कर दिए, कल हमें भी भुगतने पड़ेंगे।

पिछले तीस वर्षों के 'एक ही संतान' कानून के कारण आज चीन में युवा आबादी तेजी से घट गई, वृद्धजनों का प्रतिशत बढ़ गया है। अकेले पिछले वर्ष में सरकारी अनुमान से पचास-साठ लाख बच्चे कम पैदा हुए। सन् 1955 में जो वृद्धि दर दो प्रतिशत थी, आज घटकर 0.4 प्रतिशत रह गई है। इसका सीधा असर अर्थ-व्यवस्था पर पडऩे वाला है। अनुमान है कि सन् 2050 तक एक तिहाई आबादी 60 साल से अधिक उम्र वालों की हो जाएगी।

पानी सिर से गुजर गया। नव-दम्पत्ति अधिक संतान पैदा करने के पक्ष में ही नहीं हैं। महंगाई और शिक्षा खर्च दो बड़ी बाधाएं सामने खड़ी हैं। एक बच्चे की शिक्षा एवं प्रतिस्पर्धा की तैयारी में आधी आय खर्च हो रही है। देर से शादी होना भी दूसरी संतान के मार्ग में रुकावट है। हालांकि आय में वृद्धि हुई है। किन्तु जिस क्षेत्र में मंदी का दौर अधिक है, वहां दम्पत्ति संतान पैदा करने में रुचि नहीं ले रहे। रोजगार की स्थिति का सीधा सम्बन्ध है। भारत की स्थिति भी इस दृष्टि से कोई अच्छी नहीं है। शहरीकरण ने देश का नक्शा बदल डाला। विकास अपने आप में एक बड़ा परिवार नियोजन का हथियार कहा जाता है। विकास के नाम पर घोषणाएं भी होती रहती हैं, जिनमें अधिकांश मृग मरिचिकाएं साबित होती हैं। कार्यपालिका जनता की ओर देखना भी नहीं चाहती। इनके व्यवहार से जनता अधिक दु:खी होती है। चीन में एक प्रकार का रोष भी पैदा हो रहा है-नए दो संतान वाले कानून को लेकर।

भारत में स्थिति और भी खराब है। पिछले घाव आज भी हरे हैं। परिवार नियोजन को एक बार तो साम्प्रदायिक रंग तक दे डाला था। प्रतिक्रियास्वरूप इसका परिणाम भी विपरीत ही हुआ था। जिस आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में नियोजन को प्रभावी करना था, वहां तो हुआ नहीं, बल्कि सम्पन्न वर्ग आधा हो गया। आज देश की लगभग आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे चली गई। जिस प्रकार मनुष्य अपनी तृष्णा की पूर्ति के लिए अन्य प्राकृतिक संसाधनों का अमर्यादित और अवैध दोहन करता है, उसी तरह सत्ता के मद में अन्धा तंत्र स्त्री शक्ति की प्राकृतिक निर्माण क्षमता पर भी अपनी तुष्टि के लिए कानून बनाकर आक्रमण करता है। इस आसुरी चिन्तन ने धरती पर नर्क की व्यवस्था कर डाली। किसी भी देश को परिवार नियोजन का लाभ नहीं मिला। जहां भी यह भ्रम पैदा हुआ, वहां एक नया वातावरण भी स्पष्ट उभरकर आया। भारत का चित्र स्पष्ट है। जितना प्रयास परिवार नियोजन का, जिस निर्ममता से, किया गया, उसमें कुछ महिलाओं की प्रजनन क्षमता ही समाप्त कर दी गई थी। जिन्होंने गोलियां खाईं, वे अधिकांशत: कैंसर ग्रस्त हो गईं। पुरुष वहीं का वहीं रहा। उसने गोलियां नहीं खाई।

भारत में आबादी को ध्यान में रखकर पैदावार बढ़ाने का अभियान चलाया गया। नहरी सिंचाई, रासायनिक खाद, कीटनाशक का साम्राज्य फैल गया। हर नागरिक कैंसर खाने लग गया। मरना तो होगा, चाहे पैदा होने से पहले या जिन्दा रहने के बाद। सरकारें अपनी अक्षमता और नासमझी को छिपाने के लिए आम आदमी पर आक्रमण करती हैं। सरकारें चलाने के लिए टैक्स का भार भी ऐसा ही अतिक्रमण है। बाहरी उद्योगों को लाकर, बाहरी पूंजी को लाकर उत्पादन को भारतीय बताना भी उतना ही बड़ा अतिक्रमण है, जनता के अधिकारों का। ठप्पा भले ही भारतीय हो, उसमें हमारा विकास परिलक्षित नहीं होगा। उधर व्यक्ति की औसत उम्र बढ़ती चली गई। पिछले पचास सालों में लगभग 20 वर्ष आयु बढ़ गई। जितना पाया-उतना खोया।

आवश्यकता इस बात की है कि जो भारतीय दर्शन पढ़ाया जाता है, सरकारें भी उसी अनुरूप शासन चलाएं। सत्ता में अंग्रेजी के ग्लैमर ने ही देश की आज यह हालत बना दी है। बातें तो गांधीजी की करते हैं, सत्य न बोलने का प्रतिनिधि देश बनता जा रहा है। देश के लिए जीने का संकल्प तृष्णा के संघर्ष में खो गया। धन मिट्टी भी है, साथ भी नहीं जाता। हम मानवता का जितना भी ह्रास करेंगे, वो कृष्ण का ही होगा। उसने कहा था-'ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:'।

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