scriptHate speech will stop only with strict provision of punishment | सजा के सख्त प्रावधान से ही रुकेगी हेट स्पीच | Patrika News

सजा के सख्त प्रावधान से ही रुकेगी हेट स्पीच

अपने हलफनामे में गेंद को केन्द्र सरकार के पाले में डालते हुए चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि जब तक सरकार कानून में हेट स्पीच को परिभाषित नहीं कर देती या इसके लिए विशेष कानून नहीं बना देती तब तक उम्मीदवारों के चुनाव लडऩे पर रोक नहीं लगाई जा सकती है।

Published: September 14, 2022 09:59:24 pm

देश भर में भड़काऊ बयानबाजी यानी हेट स्पीच और इसके बाद होने वाली सियासत किसी से छिपी नहीं है। चुनाव के दौर में तो जैसे हेट स्पीच देने वाले नेताओं में होड़-सी मच जाती है। इस बीच चुनाव आयोग ने फिर लाचारी जाहिर कर दी है कि उकसाने वाले बयानों के मामले में उसके पास ऐसे बयान देने वालों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने अथवा संबंधित व्यक्ति के राजनीतिक दल की मान्यता रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे में चुनाव आयोग की इस लाचारी का कारण समझ में भी आता है।
प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र
दरअसल हेट स्पीच के मामले में देश में अलग से कोई कानून है ही नहीं। अपने हलफनामे में गेंद को केन्द्र सरकार के पाले में डालते हुए चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि जब तक सरकार कानून में हेट स्पीच को परिभाषित नहीं कर देती या इसके लिए विशेष कानून नहीं बना देती तब तक उम्मीदवारों के चुनाव लडऩे पर रोक नहीं लगाई जा सकती है। हेट स्पीच की कोई कानूनी परिभाषा भले ही न हो लेकिन बोलकर, लिखकर, इशारों से या किसी भी तरीके से हिंसा भडक़ाने या दो वर्ग-समुदायों के बीच सौहार्द बिगाडऩे की कोशिश को ही ‘हेट स्पीच’ समझा जाता है। सुप्रीम कोर्ट वैमनस्य बढ़ाने वाले भाषणों, बयानों व इससे जुड़ी सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर अपने कई फैसलों में इस संबंध में सख्त कानून बनाने की जरूरत बता चुका है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर पिछले सालों में जिस तरह से भड़काऊ, दूसरे को नीचा दिखाने वाले और साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने वाले बयानों ने माहौल खराब किया उसके नतीजे देश ने भुगते भी हैं। कई बार तो बात का इतना बतंगड़ हो गया कि समाज को भयावह परिणति का सामना करना पड़ा। अब चूंकि चुनावों का दौर फिर शुरू होने को है, ऐसे में चुनाव आयोग को ताकत देना वक्त की मांग है। जरूरत हो तो आइपीसी और जनप्रतिनिधित्व कानून में और संशोधन कर समुचित प्रावधान किए जाने चाहिए। फिलहाल तो भड़काऊ बयान देकर माफी मांगने में नेता सबसे आगे रहते हैं। यह बात और है कि वे ऐसा कर अपने नापाक इरादों में कामयाब हो जाते हैं।
देखा जाए तो हेट स्पीच के मामले में सभी पक्षों की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करना जरूरी है। सोशल मीडिया मंचों पर नफरत फैलाने वाली सामग्री पर अंकुश लगाना ज्यादा जरूरी हो गया है। सवाल सिर्फ कानून बनाने का ही नहीं, बल्कि कानून का डर तब ही होगा जब भड़काऊ बयान देने वाले नेताओं को हमेशा के लिए चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाए।

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