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मेहरानगढ़ की याद दिला गया हाथरस हादसा

हाथरस के भगदड़ हादसे ने अनायास ही 30 सितंबर 2008 को जोधपुर के मेहरानगढ़ में हुए हादसे की दर्दनाक याद को ताजा कर दिया।

जयपुरJul 03, 2024 / 10:53 am

Kirti Verma

दौलत सिंह चौहान
हाथरस के भगदड़ हादसे ने अनायास ही 30 सितंबर 2008 को जोधपुर के मेहरानगढ़ में हुए हादसे की दर्दनाक याद को ताजा कर दिया। नवरात्र स्थापना के दिन अलसुबह हुए उस हादसे में 224 युवाओं की मौत हुई और 400 से ज्यादा घायल हो गए थे। उस काली सुबह मैं मेहरानगढ़ की तलहटी में स्थित अपने घर की छत पर सोया हुआ था। नवरात्र स्थापना पर मां चामुंडा के मंदिर की अपनी कवरेज ड्यूटी पर भेजे गए हमारे फोटोग्राफर एसके मुन्ना की कॉल मेरे मोबाइल पर आई। देर रात सोने की वजह से कच्ची नींद में मैं हड़बड़ा कर जागा। दूसरी तरफ से मुन्ना की घबराहट भरी आवाज आई, सर यहां बहुत बड़ा हादसा हो गया है और 100-150 लोग मर गए हैं। एकाएक विश्वास नहीं हुआ तो उसे डपट दिया, ऐसा कैसे..? पर थोड़ी ही देर में पुलिस, एंबुलेंस और दमकल वाहनों की सायरन बजाती गाड़ियों का रेला किले की सड़क पर दौड़ता दिखा तो मैं मन में आशंका लिए बालासा मंदिर की सीढ़ियों से लगभग भागता हुआ मेहरानगढ़ पहुंचा।
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किले की पोल में घुसते ही फर्श पर दर्जनों युवाओं को बेसुध हालत में यत्र-तत्र पड़े पाया। इनको किले के अंतिम छोर पर स्थित चामुंडा मंदिर से लोग कंधों पर, टांगाटोळी करके और टेंट की कनात में बेसुध हालत में भरकर करीब एक किलोमीटर नीचे लाकर किले के द्वार पर रखा ताकि अस्पताल पहुंचाया जा सके। इनमें से कितने लोगों की मौत हो चुकी थी और कितने बेहोश थे ये बताने वाला कोई नहीं था। एबुलेंस की कम संया और उनके आने में विलंब को देखते हुए युवाओं ने वहां श्रद्धालुओं को लेकर आई सिटी बसों में इनको भर कर अस्पताल के लिए रवाना किया। करीब दो घंटे तक यह सिलसिला चला। मैंने देखा श्रद्धालुओं में शामिल एक डॉक्टर ने कम से कम चार-पांच युवकों को मौके पर ही पपिंग करके होश में ला दिया। लेकिन वह अकेला डॉक्टर इतना ही कर पाया। जिन लोगों को अस्पताल ले जाया गया, उनमें से ज्यादातर दम तोड़ चुके थे। कहने का मतलब प्रशासन ऐसे भीड़भाड़ वाले आयोजन स्थलों पर किसी तरह की कोई व्यवस्था तो करता ही नहीं है। पुलिस होती भी है तो इतनी कम कि वह कुछ भी नहीं कर पाती। अगर मेहरानगढ़ में 5-7 चिकित्सकों की ड्यूटी होती तो मृतकों में से ज्यादातर युवक आज अपने परिजनों के साथ होते।
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यही हाल उत्तर प्रदेश के हाथरस हादसे में भी देखने को मिला। हजारों की भीड़ के बावजूद मौके पर चंद पुलिस वालों के अलावा कोई था ही नहीं, चिकित्सकों की उपस्थिति के बारे में तो सोचना ही बेमायने है। हालात का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है की दोपहर एक-डेढ़ बजे के इस हादसे की सूचना त्वरित संचार व्यवस्था के इस युग में राजधानी लखनऊ तक पहुंचने में शाम की पांच बज गई। बाकी जांच के आदेश, मुआवजे की घोषणा, दोषियों के खिलाफ सत कार्रवाई, किसी को बशा नहीं जाएगा जैसी रस्मी कवायद मेहरानगढ़ हादसे के बाद भी हुई थी जो आज हाथरस हादसे के बाद भी दोहराई गई। लेकिन किससे छिपा है कि मेहरानगढ़ हादसे की जांच के लिए गठित न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट तक जनता के सामने नहीं आ पाई, विधानसभा में पड़ी धूल फांक रही है। जिन्होंने अपने खोये वो रो-पीट कर मजबूरन बैठ गए। एक भी दोषी को सजा नहीं मिली। न कोई अफसर जेल गया न मेहरानगढ़ ट्रस्ट पर कोई आंच आई। ऐसे में हाथरस में जितनी भी बड़ी-बड़ी बातें की जाए अंजाम मेहरानगढ़ हादसे से अलग होगा ऐसा कतई लगता नहीं। लगता है लोगों का मरना एक खबर से ज्यादा कुछ नहीं है। लाशों पर राजनीति तो हमारे देश की परंपरा ही बन गई है। किसी को शर्म नहीं है।

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