स्वास्थ्य गारंटी अधिनियम समय की जरूरत

बड़ी आबादी गरीबी रेखा की सीमा पर खड़ी है। यह आबादी इलाज पर किए गए खर्च के कारण गरीबी रेखा के नीचे चली जाती है
स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश अर्थव्यवस्था पर भार नहीं डालेगा...

By: विकास गुप्ता

Published: 09 Jun 2021, 08:24 AM IST

सुनील शर्मा, शिक्षाविद

वर्ष 1918-20 में फैले स्पेनिश फ्लू के कारण भारत की 5 प्रतिशत आबादी को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा था। इसका कारण तो हमने बहुत ही सरलता से देश की गुलामी और औपनिवेशिक सरकार द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं की सतत उपेक्षा और उदासीनता में तलाश लिया। आजादी के बाद हमारी खुद की चुनी हुई सरकारों द्वारा स्वास्थ्य सेवा, स्वास्थ्य ढांचे और महामारी प्रबंधन पर किए गए खर्च पर ध्यान दिया जाए, तो यह भी बहुत उत्साहवर्धक नहीं दिखाई देता। जहां दुनिया के अधिकतर विकसित राष्ट्र स्वास्थ्य सेवाओं पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का 9 प्रतिशत से 16 प्रतिशत तक खर्च करते हैं, वहीं भारत का स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारी खर्च तो जीडीपी का मात्र सवा प्रतिशत ही है। आमजन जीडीपी का 2.5 प्रतिशत अपनी जेब से स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करता है। निरंतर कई दशकों की लापरवाही ने समस्या को काफी जटिल कर दिया है।

अगर स्वास्थ्य बीमा की बात करें, तो उसकी हालत भी हमारे यहां बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। अगर व्यक्तिगत, सेवागत और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा उपलब्ध करवाए बीमा कवर को भी जोड़ लें, तो भी 138 करोड़ जनसंख्या में मात्र 30 करोड़ लोगों को ही बीमा सुरक्षा उपलब्ध है। इसमें भी अगर गरीब परिवारों की बात करें, तो 90 प्रतिशत बिना बीमा सुरक्षा के हैं। इसे विडम्बना नहीं, तो और क्या कहेंगे कि जिस देश की कई पौराणिक कथाओं की शुरुआत ही समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर निकले धन्वंतरि से होती है, उस देश के अधिकांश पंचायत मुख्यालय आजादी के 70 साल बाद भी 'धन्वंतरि' का इंतजार ही कर रहे हैं। आखिरकार इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

अगर इसका गम्भीरता से परीक्षण किया जाए, तो इसके लिए निस्सन्देह हमारा संवेदनहीन नेतृत्व ही जिम्मेदार है, जो गरीबी उन्मूलन, सामाजिक न्याय, दलितोद्धार या विभिन्न लोकलुभावन नारों के साथ सत्ता में तो आ जाता है, किन्तु सत्तारूढ़ होते ही स्वास्थ्य-शिक्षा जैसी बुनियादी सहूलियतों की जगह बजट का रुख वोटबैंक को सुदृढ़ करने की तरफ मोड़ देता है।

आज जरूरत इस बात की है कि सरकारें अपनी प्राथमिकताओं को कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के अनुरूप पुनर्परिभाषित करें। सरकारें स्वास्थ्य और स्वास्थ्य शिक्षा को अपनी आयोजना के केंद्र में उसी प्रकार लाने की चेष्टा करें, जिस प्रकार प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि और दूसरी पंचवर्षीय योजना में आधारभूत उद्योग आयोजना के केंद्र में थे। इसकी शुरुआत 'स्वास्थ्य खर्च एवं सुनिश्चिति अधिनियम' बना कर भी की जा सकती है, जो राज्य और केंद्र सरकार पर स्वास्थ्य सेवाओं और उसके बुनियादी ढांचे पर सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत खर्च करने की विधिक/नैतिक बाध्यकारिता का उपबन्ध करती हो। साथ ही इस धन से भारत में इंग्लैंड की तर्ज पर नेशनल हेल्थ सर्विस जैसी योजना शुरू की जाए, जो हर भारतीय को नि:शुल्क स्वास्थ्य सेवा की गारंटी उपलब्ध करवाए।

आप यकीन मानिए स्वास्थ्य सेवाओं पर किया गया निवेश देश की अर्थव्यवस्था पर भार नहीं डालेगा। जितना पैसा इस मद पर खर्च होगा, उसके अनुपात में हमारी वर्कफोर्स के स्वस्थ कार्यदिवसों में बढ़ोतरी हो जाएगी। इससे न केवल खर्च की भरपाई होगी, बल्कि जीडीपी में बढ़ोतरी भी होगी। इसके अलावा देश की एक बड़ी आबादी, जो गरीबी रेखा की सीमा पर खड़ी है, हर साल इलाज पर किए गए खर्च के कारण गरीबी रेखा के नीचे चली जाती है। ऐसे लोगों को वापस गरीबी रेखा से ऊपर लाने पर जो अरबों रुपए खर्च किए जाते है, स्वास्थ्य गारंटी अधिनियम के चलते इस खर्च को भी बचाया जा सकेगा। इस धन को भी स्वास्थ्य सेवा में निवेश किया जा सकता है।

विकास गुप्ता
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