लापरवाही के संक्रमण से ग्रस्त स्वास्थ्य सेवाएं

जिला अस्पताल की दहलीज पर एक गर्भवती प्रसव पीड़ा से तड़पती रही, लेकिन रात अधिक होने के कारण दरवाजे नहीं खुले और जब खुले तो बहुत देर हो चुकी थी। अंतत: गर्भस्थ शिशु के साथ गर्भवती की सांसें थम गईं।

By: विकास गुप्ता

Published: 03 Jul 2021, 08:14 AM IST

कोरोना संक्रमण के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ और सक्षम बनाने के दावे सरकारें खूब करती हैं, पर हकीकत अलग है। इसकी बानगी मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में गर्भवती की दर्दनाक मौत का ताजा मामला है। जिला अस्पताल की दहलीज पर एक गर्भवती प्रसव पीड़ा से तड़पती रही, लेकिन रात अधिक होने के कारण दरवाजे नहीं खुले और जब खुले तो बहुत देर हो चुकी थी। अंतत: गर्भस्थ शिशु के साथ गर्भवती की सांसें थम गईं।

जाहिर होता है कि जिला मुख्यालय स्तर तक के सरकारी अस्पताल दुर्दशा की बीमारी से ग्रस्त हैं। जवाबदेही का संकट स्वास्थ्य सेवाओं पर गहराया हुआ है। दुखद तो यह है कि देशभर के अलग-अलग इलाकों से इस तरह के दुर्भाग्यपूर्ण किस्से सामने आते ही रहते हैं। सरकारी तंत्र सदैव ही इन पर पर्दा डालने की कोशिश करता है। जांच समितियां बनती हैं और बगैर किसी नतीजे पर पहुंचे उनका काम समाप्त भी हो जाता है। न किसी को दण्ड मिलता है और न ही व्यवस्था में सुधार की कोई ठोस पहल ही होती है। हां, मगर इस तरह की घटनाओं पर अदालतों ने जरूर कड़ा संदेश देते हुए राज्य को दंडित किया है। हाल ही में चेन्नई उच्च न्यायालय की मदुरै खंडपीठ ने वहां की राज्य सरकार को आदेशित किया कि मृतका के परिजन को पांच लाख रुपए का हर्जाना दिया जाए। इस केस में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव के बाद महिला की तबीयत बिगड़ी थी और उसे मेडिकल कॉलेज के अस्पताल ले जाना था। मगर वक्त पर एंबुलेंस की व्यवस्था नहीं हो सकी और अस्पताल पहुंचने के पहले ही महिला की जान चली गई। फैसले में अदालत ने यह भी कहा है कि आपातकालीन सेवा में कोताही बरतने पर सरकार को माफ नहीं किया जा सकता है क्योंकि एक पल की देरी से भी किसी की जिंदगी जा सकती है।

अब प्रश्न यह है कि क्या अदालत के इस आदेश को कोरोना की दूसरी लहर में हुई मौतों के संदर्भ में देखा या पढ़ा जा सकता है। कोरोना काल में तो अस्पताल परिसर में ही बेहिसाब लोगों की सांसें घुट गईं। उन्हें न तो कोरोना पीडि़त माना जा रहा है और न ही व्यवस्था की खामी का शिकार। वैसे तो मृतकों के परिजन को मुआवजा देने का मामला शीर्ष न्यायालय में विचारधीन है, फिर भी सीहोर जिले में हुई लापरवाही जैसे मामलों के बारे में अधिक जागरूकता की आवश्यकता है। वर्तमान में नागरिकों को यह जानकारी ही नहीं है कि वे सरकार के आगे गिड़गिड़ाने के बजाय अदालत की शरण में भी जा सकते हैं। जब ऐसी घटनाएं याचिका बनकर अदालतों में जाएंगी, तो ही सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के आसार बन सकते हैं।

विकास गुप्ता
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