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आपराधिक लापरवाही, जिम्मेदारी से नहीं बच सकते आयोजक

अब यह जरूरी है कि ‘उतावलेपन एवं लापरवाह’ कृत्य को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य जुटाए जाएं ताकि मुख्य आयोजक एवं व्यवस्था के लिए जिम्मेदार सेवादारों के विरुद्ध अपराधिक लापरवाही का मुकदमा चलाया जा सके। अनुमान से अधिक भीड़ आने पर की जाने वाली व्यवस्था की पूरी जानकारी एकत्रित करनी होगी।

जयपुरJul 05, 2024 / 09:50 pm

Gyan Chand Patni

आर. के. विज छत्तीसगढ़ के पूर्व स्पेशल डीजीपी
हाल ही में उत्तर-प्रदेश राज्य के जिला हाथरस के ग्राम फुलरई में हुई भगदड़ में 120 से अधिक लोगों की जान चली गई जो अत्यंत दुखद और चिंताजनक है। जिला प्रशासन द्वारा 80,000 लोगों को इकट्ठा होने की अनुमति दी गई थी, जबकि मौके पर करीब दो-ढाई लाख लोग इकट्ठे थे। वर्ष 1954 के कुंभ मेले से लेकर हाथरस की इस घटना के बीच विभिन्न धार्मिक आयोजनों के दौरान कई हादसे हो चुके हंै। हालत यह है आज भी राष्ट्रीय स्तर पर कोई ऐसी नीति या कानून नहीं है जिसका पालन करना ऐसे आयोजनों में जरूरी हो। उत्तर-प्रदेश सरकार ने घटना की न्यायिक जांच के लिए एक कमेटी गठित की है जो एक मार्गदर्शिता भी तैयार करेगी। औषधि और चमत्कारिक उपचार अधिनियम, 1954 तथाकथित चमत्कारिक बाबा लोगों के उपचारों के रोकथाम में प्रभावी सिद्ध नहीं हुआ है। लोगों की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले ऐसे बाबाओं के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई के लिए इस अधिनियम में भी संशोधन करने की आवश्यकता है।
वर्ष 2013 में आंध्रप्रदेश सरकार द्वारा ‘आंध्रप्रदेश पब्लिक सेफ्टी प्रवर्तन अधिनियम’ अधिसूचित किया गया था, जिसमें यह प्रावधान था कि जिस भी आयोजन में 100 से अधिक लोगों के आने की संभावना हो, वहां आने-जाने के रास्तों की निगरानी और नियंत्रण के लिए तकनीक की मदद ली जानी चाहिए। ऐसे स्थानों पर सीसीटीवी कैमरा स्थापित करना अनिवार्य है। यह व्यवस्था आने-जाने वाले संदिग्ध लोगों पर नजर रखने और आवश्यकता पडऩे पर पुलिस जांच में साक्ष्य एकत्रित करने के लिए बनाई गई है। हैरानी की बात है कि देश के विभिन्न भागों में जहां लाखों की भीड़ जमा होने की अनुमति दी जाती है, वहां ऐसी कोई शर्त नहीं लगाई जाती। वर्ष 1993 में वीआइपी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जस्टिस वर्मा कमेटी ने यह अनुशंसा की थी कि कार्यक्रम के आयोजक वीआइपी यात्रा के संबंध में अपडेटेड जानकारी पुलिस अधिकारियों से साझा करें और सुरक्षा व्यवस्था में सहयोग करें ताकि कोई चूक न हो। हालांकि उपरोक्त दोनों उदाहरण हाथरस की व्यवस्था पर सीधे लागू नहीं होते, परंतु इतनी सीख अवश्य ली जा सकती है कि किसी भी सुरक्षा व्यवस्था में आयोजकों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है।
पुलिस अधिकारी जब किसी आयोजन की जिम्मेदारी स्वयं संभालते हैं तो वे लोगों के आने-जाने के रास्ते एवं आपातकालीन रास्ते की व्यवस्था जरूर करते हैं। लोगों के लिए पीने के पानी और एंबुलेंस की व्यवस्था प्रशासन द्वारा सुनिश्चित की जाती है। अस्पताल जाने का रास्ता सुरक्षित किया जाता है और चिकित्सकों को अलर्ट पर रखा जाता है। ऐसी व्यवस्था केवल ऐसे अति-विशिष्ट या विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए की जाती है जिन्हें समाजकंटकों से खतरा हो। धार्मिक आयोजनों में इतनी सघन सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता चाहे न हो, परंतु भीड़ को नियंत्रित एवं रेगुलेट करने और आपात स्थिति से निपटने के लिए कुछ निश्चित मापदंड अवश्य पालन करने चाहिए। पूरी भीड़ को कुछ सेक्टरों में बांटना, मल्टीपल रास्ते बनाना, लोगों को नियंत्रित एवं निर्देश देने के लिए कंट्रोल रूम स्थापित करना एवं आपातकालीन स्थिति के लिए मेडिकल व्यवस्था करना जरूरी होता है।
अब यह जरूरी है कि ‘उतावलेपन एवं लापरवाह’ कृत्य को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य जुटाए जाएं ताकि मुख्य आयोजक एवं व्यवस्था के लिए जिम्मेदार सेवादारों के विरुद्ध अपराधिक लापरवाही का मुकदमा चलाया जा सके। अनुमान से अधिक भीड़ आने पर की जाने वाली व्यवस्था की पूरी जानकारी एकत्रित करनी होगी। जहां तक प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने का प्रश्न है, यह देखना होगा आयोजन की अनुमति देते समय कौन-कौन सी व्यवस्था करने की शर्तें लगाई गई थी और पालना सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी।

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