हाउस अरेस्ट रिमांड प्रावधान अभूतपूर्व बदलाव में सक्षम

फौजदारी कानून के इतिहास में हो सकता है क्रांतिकारी कदम...
आरोपों से बरी होने वाले जेल में बंद विचाराधीन बंदियों की सामाजिक, आर्थिक, मानसिक क्षतिपूर्ति किसी भी कीमत पर नहीं हो सकती

By: विकास गुप्ता

Published: 20 May 2021, 08:41 AM IST

हेमंत नाहटा

आरोपी को गिरफ्तार करने पर हिरासत में ले कर पूछताछ हेतु पुलिस रिमांड (पीसी) या फिर अनुसंधान के दौरान जेल में रखे जाने के लिए जूडिशल कस्टडी रिमांड (जेसी) दिए जाने के प्रार्थना पत्र पर दंड प्रक्रिया की धारा 167 के तहत मजिस्ट्रेट सैद्धांतिक रूप से तीन तरह के आदेश दे सकते हैं। इनमें पहला, पुलिस को सौंपे जाने के लिए पुलिस रिमांड, दूसरा जेल में निरुद्ध रखने के लिए जूडिशल रिमांड, और तीसरा आदेश कोई भी रिमांड स्वीकृत नहीं किए जाने का हो सकता है।

कानूनन रिमांड मात्र यांत्रिक तरीके से स्वीकृत नहीं किया जा सकता, परंतु हकीकत में कोई भी रिमांड नहीं दिए जाने के आदेश जारी किए जाने की स्थिति तो कभी सामने ही नहीं आती। अवकाशकालीन न्यायालयों में तो पीसी या जेसी रिमांड के अतिरिक्त जमानत सहित कोई अन्य आदेश पारित किया जाना एक दुर्लभतम स्थिति है।

गौतम नवलखा के केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह ताजा व्यवस्था दी है कि धारा 167 सीआरपीसी के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा हाउस अरेस्ट का रिमांड दिए जाने का अधिकार भी खुला है अर्थात अब चौथे विकल्प के रूप में आरोपी को उसके निवास स्थान में ही कैद करने के आदेश भी दिए जा सकते हैं। इसके लिए चिह्नित किए गए योग्यता मापदंडों में आरोपी की उम्र, उसका स्वास्थ्य, पूर्व अपराध का इतिहास, पुलिस या जेल हिरासत में रखे जाने की आवश्यकता, अपराध की प्रकृति एवं हाउस अरेस्ट में बंद रखे जाने की सक्षमता आदि मापदंड शामिल हैं, जिनके मद्देनजर हाउस अरेस्ट का आदेश गिरफ्तारी के 60 या 90 दिवस तक एवं योग्य प्रकरणों में धारा 309 सीआरपीसी के तहत सम्पूर्ण विचारण तक जारी रह सकता है।

हाउस अरेस्ट रिमांड का प्रावधान किया जाना देश के फौजदारी कानून के इतिहास में निस्संदेह अभूतपूर्व तथा रिमांड व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाने में सक्षम घटना है।

एक ओर 31 दिसंबर 2019 की स्थिति के अनुसार देश के राज्यों में बनी 1350 जेलों में कैदियों की संख्या 4.78 लाख और इसके लिए सरकारी खर्च 5958 करोड़ रुपए प्रति वर्ष तक पहुंच चुका है, वहीं दूसरी ओर आरोपी को जेल में बंद करने पर उसके परिजन भी निराधार ही शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से दंडित होते हैं। ये सभी परिस्थितियां एक विकट सामाजिक दुष्चक्र को जन्म देती रही हैं। हाउस अरेस्ट की स्थिति में आरोपी गिरफ्तारी से लेकर विचारण समाप्त होने तक स्वयं के परिवार में रह सकेगा। इस नई व्यवस्था से बंदी से अवैध वसूली, जेल हिंसा और जेल में कैदियों की संख्या में भी भारी कमी आएगी। यह कटु सत्य है कि विचाराधीन कैदियों के लिए आज की रिमांड व्यवस्था किसी सकारात्मक उपयोग से ज्यादा दंडात्मक और विध्वंसात्मक हो चुकी है। ऐसे विचाराधीन बंदी, जो कई महीनों या सालों तक ( कई प्रकरणों में 10 वर्ष तक ) जेल में रहने के बाद विचारण समाप्ति पर आरोपों से बरी किए जाते हैं, उनके जेल में बिताए हुए समय और उनकी सामाजिक, आर्थिक, मानसिक क्षति और पारिवारिक जीवन की बर्बादी की क्षतिपूर्ति किसी भी कीमत पर नहीं हो सकती है, लेकिन यदि उन्हें इस अवधि में हाउस अरेस्ट में रखा जाता है तो राज्य व्यवस्था उन के सामने कठघरे में खड़े होने से किसी हद तक तो बच सकेगी।

हाउस अरेस्ट के आदेश देने की व्यवस्था शीघ्रातिशीघ्र आत्मसात करने के परिणामस्वरूप होने वाली सामाजिक और न्यायिक क्रांति के सफल आगाज के लिए पीठासीन अधिकारी, लोक अभियोजक, पुलिस तथा अधिवक्तागण के सम्पूर्ण सामंजस्य हेतु हाई कोर्ट द्वारा तत्काल एक आपात कार्ययोजना बनाकर लागू किया जाना अत्यंत अपेक्षित है।

(लेखक राजस्थान उच्च न्यायालय में एडवोकेट हैं)

विकास गुप्ता
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