देश के ज्वलंत मुद्दों पर चिंतन हो सदनों में

- शुक्रवार को शुरू हो रहा है संसद का बजट सत्र।
- बजट पेश होने से पहले राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का अभिभाषण हुआ।
- देश में चल रहे किसान आंदोलन के चलते संसद में हो सकता है गतिरोध।

By: विकास गुप्ता

Published: 30 Jan 2021, 08:32 AM IST

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अभिभाषण के साथ ही संसद का एक और बजट सत्र शुक्रवार को शुरू हो गया। एक कहावत है कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। दो चरणों में 8 अप्रेल तक प्रस्तावित संसद के इस सत्र में सरकार और तमाम राजनीतिक दल देश के लिए क्या करेंगे, इसका आभास पहले दिन की शुरुआती कार्यवाही में ही हो गया। करीब-करीब समूचे विपक्ष ने किसान आंदोलन पर सरकारी रवैये के विरोध में अभिभाषण का बायकॉट किया। सरकार ने बायकॉट को टालने के लिये पर्दे के पीछे कुछ किया हो तो पता नहीं, कम से कम वह देश के सामने तो नहीं आया।

जरूरत इस बात की है कि पक्ष-विपक्ष यदि ईमानदारी से इस देश और उसकी जनता का भला करना चाहते हैं, तो उन्हें अपने सारे मतभेद और अहंकार भुलाकर इस पवित्र मंच का इस्तेमाल देश के ज्वलंत मुद्दों पर चिंतन-मनन के लिए करना चाहिए। भले ही राष्ट्रपति और राज्यपाल जो सम्बोधन सदनों में देते हैं, वह उनसे जुड़ी सरकारों का मन होता है। स्वयं राष्ट्रपति और राज्यपाल, भले विरले ही इनमें अपना मन खोलते हैं लेकिन वे पूरे सदन के सामने देश-प्रदेश के मुद्दे तो खोलकर रख ही देते हैं। जैसे राष्ट्रपति कोविंद ने अपने सम्बोधन में किसान आंदोलन, चीन से सीमा विवाद, अर्थव्यवस्था, बेकारी और जम्मू-कश्मीर के नवीनतम हालात, कोरोना, बाढ़-भूकंप, टिड्डी हमला, बर्ड फ्लू, अयोध्या, नक्सल समस्या और पूर्वोत्तर की हिंसा सहित अन्य अनेक विषयों पर अपनी बात कही है। अब यह सांसदों पर है कि वे उनका सच सदन के मार्फत देश की जनता के सामने रखें। वे ऐसा कर सकते हैं लेकिन दुर्भाग्य है कि वे दलीय राजनीति में उलझ कर ऐसा करते नहीं। पक्ष का आदमी काले को गोरा और विपक्ष का आदमी दिन को रात बताने लग जाता है। इसी से इन सदनों की प्रतिष्ठा को ग्रहण लगना शुरू हो जाता है, जो न केवल उनकी अपनी, उनकी पार्टी की और अंतत: लोकतंत्र की छवि को कलंकित करता है। बेशक, हमारा लोकतंत्र बहुत अच्छा है

लेकिन हमें उसकी निरंतर झाड़-पोंछ भी करते रहनी चाहिए। जो कमियां इसमें आ रही हैं, खासतौर से अहंकार की, उन्हें पहले दूर करना चाहिए। ऐसा हुआ तो संवाद का रास्ता खुला रहेगा, जो जीवन्त, स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र की पहली जरूरत है। अफसोस यह है कि जिन पर इसका दारोमदार है, उनकी कथनी-करनी में बहुत फर्क है। यदि हमें वाकई में, अपने इन सदनों को प्रभावी बनाना है, जनता का हितकारी बनाना है तो सबसे पहले इस फर्क को मिटाना होगा। दलीय सरकारें आएंगी- जाएंगी, लेकिन सदन हमेशा रहेगा। वह चले, इसी में देशहित है।

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