सेना को चाक-चौबंद कैसे करें

सेना को चाक-चौबंद कैसे करें

Dilip Chaturvedi | Publish: Mar, 12 2019 01:22:44 PM (IST) विचार

हालिया रक्षा खर्च का रुझान देखते हुए कहा जा सकता है कि हमारे रणनीतिकार एक बार फिर ऐसी बड़ी-बड़ी चीजों पर खर्च कर रहे हैं जिनका इस्तेमाल ज्यादा नहीं होना है। इसके उलट वे हमारे थलसैनिकों की सुविधाओं पर ध्यान नहीं दे रहे हैं जो आज भी देश की जंग को निर्णायक अंत तक पहुंचाने का काम करते हैं।

मोहन गुरुस्वामी, नीति विश्लेषक

प्रधानमंत्री ने अमेठी में एके203 राइफल उत्पादन के एक कारखाने का उद्घाटन किया है। जल्द ही भारत के 20 लाख से ज्यादा सुरक्षा बलों को इस राइफल से लैस किया जाएगा। अच्छी बात यह है कि इसका उत्पादन न केवल नए कारखाने में होगा, बल्कि नई कंपनी करेगी। भारत के काशीपुर और ईशापुर स्थित आयुध कारखानों के हालात से जो कोई परिचित है, वह जानता है कि इनसे तो कोई अच्छी खबर आने से रही। इसका सबसे बढिय़ा उदाहरण इंसास राइफल है।

ब्रह्मोस सुपरसोनिक प्रक्षेपास्त्र की तर्ज पर राइफल का यह नया कारखाना रूसी कंपनी रोसोबोरॉन एक्सपोर्ट के साथ संयुक्त उपक्रम होगा, जिसका नाम है इंडो रशिया राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड। यहां क्लाशनिकोव राइफल का संस्करण एके203 निर्मित किया जाएगा जिसकी संख्या होगी 7,50,000 और आकार होगा 7.62 गुणा 39 एमएम। इसे एके शृंखला में सबसे आधुनिक हथियार माना जाता है।

दिलचस्प है कि भारत ने भी अब 5.56 एमएम राइफल का नाटो द्वारा स्वीकृत तत्कालीन मानक त्याग दिया है। इसके मानक के बदलने के पीछे की कहानी भी काफी दिलचस्प है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किए गए एक अध्ययन में अमरीकी सेना द्वारा इस्तेमाल किए गए हथियारों पर अमरीका के प्रसिद्ध सैन्य विश्लेषक ब्रिगेडियर जनरल एसएलए मार्शल ने पाया था कि अधिकतर सिपाहियों ने वास्तव में इनका इस्तेमाल बहुत कम किया था, ज्यादातर वक्त वे कवर लेते रहे और बहुत कम गोलियां चलाईं। यह भी पाया गया था कि उन सिपाहियों ने ही ज्यादातर गोली चलाईं, जो ब्राउनिंग ऑटोमैटिक राइफल चला रहे सिपाही के करीब तैनात थे। इसकी वजह यह थी कि बीएआर से उसे अच्छा कवर मिल जाता था। इससे यह नतीजा निकला कि जंग में ऑटोमैटिक राइफल की तैनाती की जरूरत ज्यादा है।

इस बात को अमरीकी जनरल डगलस मैकआर्थर ने कुछ यों रखा था द्ग 'जिसने भी कहा था कि तलवार से ज्यादा ताकतवर कलम है, उसने ऑटोमैटिक हथियार नहीं देखे होंगे।'

नाटो का मानक सबसे पहले अमरीका ने तोड़ा 7.62 एमएम की एम-14 ऑटोमैटिक राइफल से, जिसके बाद बाकी देशों ने उसे अपनाया। भारत इस मौके को पूरी तरह चूक गया। उस वक्त भारत अपना रक्षा बजट हन्टर, मिस्ट्री और ओरागॉन जेट लड़ाकुओं और विमान वाहकों पर खर्च कर रहा था जबकि चीन अपनी थलसेना के लिए बेहतर उपकरण और गियर तैयार कर रहा था। तभी 1962 की जंग में हमारे सैनिकों को पॉइंट थ्री नॉट थ्री ली एनफील्ड सिंगल शॉट राइफलों व कमजोर कपड़ों के सहारे चीनी फौज से लडऩे को छोड़ दिया गया, जिनके पास ऑटोमैटिक राइफलें और बर्प गनें थीं।

हालिया रक्षा खर्च का रुझान देखते हुए कहा जा सकता है कि हमारे रणनीतिकार एक बार फिर ऐसी बड़ी-बड़ी चीजों पर खर्च कर रहे हैं जिनका इस्तेमाल ज्यादा नहीं होना है। इसके उलट वे हमारे थल सैनिकों की सुविधाओं पर ध्यान नहीं दे रहे हैं जो आज भी देश की जंग को निर्णायक अंत तक पहुंचाने का काम करते हैं। एसयू-30, रफाल, 155 एमएम सेल्फ प्रोपेल्ड गन और परमाणु पनडुब्बी आदि को लेकर इतनी बहस चल रही है और बेतहाशा पैसा खर्च किया जा रहा है, जबकि हमारे पैदल सैनिकों और उनके हथियारों को लेकर अपेक्षित विचार नहीं किया जा रहा है।

अमरीकी सेना ने जब से यूजीन स्टोनर की डिजाइन की हुई 5.56 एमएम वाली एम-16 राइफल को वियतनाम युद्ध के आखिरी चरणों में उतारा, तब से 5.56 ही नाटो का मानक बन गया। इसके उलट रूस की बनी एके-47 जो 7.62 एमएम की है, कम वेग से फायर करती है जिसके चलते उसका दायरा 200 मीटर के बाद गिरने लगता है। चूंकि झटका न्यूनतम होता है, लिहाजा इसे चलाना आसान होता है। दस लाख से ज्यादा क्षमता वाली भारतीय फौज को अपनी जरूरत के हिसाब से 80,000 राइफलों में कटौती करनी पड़ी, जिसके चलते 15000 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत एक-तिहाई से भी कम पर आ गई। भारतीय फौज में साढ़े चार लाख इनफैन्ट्री हैं। इससे मुझे याद आता है कि कोरिया में अमरीका के खिलाफ लड़ते हुए पीएलए ने एक के बाद एक इन्फैन्ट्री को भेज दिया था जिसमें केवल नेतृत्व करने वाले सैनिक के पास ही राइफल हुआ करती थी। उसके गिरते ही पीछे वाले राइफल उठाकर जंग जारी रखते थे।

फील्ड मार्शल आर्किबाल्ड वेवेल, जो बाद में भारत के वायसरॉय बने, ने लिखा था, 'तीन तथ्यों को लेकर साफ हो जाना चाहिए द्ग पहला, अंत में सारी जंग पैदल सैनिक ही जीतते हैं। दूसरा, जंग की मार सबसे ज्यादा पैदल सैनिकों पर ही पड़ती है। तीसरा, पैदल सैनिकों की कला उतनी रूढ़ नहीं होती है और सेना के किसी भी अंग के मुकाबले आधुनिक जंग में अपनाना कहीं ज्यादा मुश्किल होता है।'

मुझे हमेशा से इस बात पर शक रहा है कि जंग के लिए काम आने वाले विशाल और आकर्षक हथियारों के सामने राइफलों को उतनी तरजीह नहीं दी जाती क्योंकि बड़े उपकरणों के साथ लाभ भी जुड़े होते हैं। परेड ग्राउंड और सेना की झांकियों में इनका प्रदर्शन काफी भव्य होता है। सच्चाई हालांकि यह है कि हमारा सैनिक एक राइफल के साथ ही जीता और मरता है। स्टालिन ने कहा था द्ग 'असली ताकत लंबी राइफल से ही आती है।'

विडंबना है कि हमारे पैदल सैनिक ज्यादातर गांवों से आते हैं। यह एक ऐसा संयोग है, जिसके चलते एक पैदल सैनिक की मारक क्षमता को हमारी प्राथमिकताओं में अपेक्षित जगह हासिल नहीं हो पाती है।

(लेखक, सामाजिक, आर्थिक एवं सुरक्षा विषयों के टिप्पणीकार। कई प्रतिष्ठित संस्थानों में अहम पदों पर रहे।)

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