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शहरी विकास में मानवीय पक्ष को शामिल करना होगा

Published: Sep 28, 2022 08:59:20 pm

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Patrika Desk

स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग के समाधान आर्थिक व पर्यावरणीय दृष्टि से सब जगह उपयुक्त नहीं

प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र
वरुण गांधी
भाजपा सांसद और ‘ए रुरल मेनिफेस्टो : रियलाइजिंग इंडियाज फ्यूचर थ्रू हर विलेजेज’ पुस्तक के लेखक
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दिल्ली एनसीआर में भारी बारिश के एक दिन के बाद ही पानी से भरी सडक़ें, जगह-जगह रेंगता यातायात और घुटनों तक गहरे पानी से निकलने की लोगों की जद्दोजहद के परिचित दृश्य देखने को मिले। इसके साथ-साथ कहीं बिजली की कटौती तो कहीं दीवार ढहने या करंट लगने से लोगों का हताहत होना। दो हफ्ते पहले, बेंगलूरु की 126 झीलें उफान पर थीं, 2,000 से अधिक घरों में बाढ़ का पानी आया और करीब 10,000 घर अलग-थलग पड़ गए। पॉश इलाकों सहित कई जगह लोगों को पेयजल और बिजली की किल्लत का सामना कर पड़ा। यह दुखद स्थिति शहरी नियोजन की कमियों की तरफ इशारा करती है।
आम तौर पर हमारे शहर नियमित रूप से शहरी नियोजन के प्रमुख तत्वों की उपेक्षा करते हैं। नालियों की बेहतर निकासी क्षमता और झीलों व नदियों पर ध्यान देने की बजाय पूरा जोर शहरों को कंक्रीट के जंगलों में बदलने पर नजर आता है। कुल मिलाकर भारतीय शहरों के शहरी नियोजन का पक्ष सीमित क्रियान्वयन के संकट से घिरा है। सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरनमेंट के अनुसार, बेंगलूरु ने ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स 2020 में ‘क्वालिटी ऑफ लाइफ’ मेट्रिक के तहत सौ में से 55.67 स्कोर किया। दिल्ली राजधानी होने के बावजूद 57.56 तक पहुंचा, जबकि भुवनेश्वर का स्कोर इकोनॉमिक एबिलिटी के लिहाज से 11.57 ही था।
पश्चिम में 1898 में सर एबेनेजर हॉवर्ड के गार्डन सिटी आंदोलन ने शहरों में काम के माहौल को विकेंद्रीकृत करने की मांग की। मकसद था शहरों को योजनाबद्ध तरीके से डिजाइन करना ताकि कारखानों के श्रमिकों का जीवन स्तर बेहतर हो। यूएस में यातायात कम करने व सुरक्षित सडक़ों के लिहाज से एक स्थानीय स्कूल या सामुदायिक केंद्र के आसपास आवासीय घरों के रूप में यह अवधारणा विकसित हुई। लंदन में प्रदूषण व भीड़भाड़ पर नियंत्रण के साथ जैव विविधता बनाए रखने के लिए शहर के चारों ओर 5,13,860 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली एक महानगरीय हरित पट्टी है। पेरिस ने अपनी कोशिश ‘15 मिनट सिटी’ के तौर पर आगे बढ़ाई है। इसके तहत हर पेरिसवासी की खरीदारी, कामकाज, मनोरंजन और सांस्कृतिक जरूरतें 15 मिनट की पैदल यात्रा या बाइक की सवारी के भीतर पूरी होनी चाहिए। इस दिशा में अगला कदम वाहनों के बजाय पैदल चलने वालों के लिए शहर की योजना होगा। भारतीय शहरों में रिंग रोड और शहरी फैलाव के बजाय ऐसा क्यों नहीं हो सकता है? क्या बेंगलूरु को इस तर्ज पर फिर से डिजाइन नहीं किया जा सकता?
आदर्श रूप से प्रत्येक भारतीय शहर में एक मास्टर प्लान होना चाहिए द्ग एक रणनीतिक शहरी नियोजन दस्तावेज, जिसे एक-दो दशक के अंतराल पर अपडेट किया जाए। इस तरह की योजनाओं में गरीबी के कारण होने वाले विस्थापन पर ध्यान देने के साथ-साथ किफायती आवास पर ध्यान देना जरूरी है। भूमि अधिग्रहण में मुद्रास्फीति की भी गणना के साथ इस तरह की योजनाओं और जमीनी नगरपालिका बजट (और फंड रिलीज) के बीच विरोधाभास भी दूर किया जाए।
देश में शहरी भूमि उपयोग को बेहतर करने की जरूरत है। सैटेलाइट मैप इमेजरी से जाहिर है खेतों में पसरते जा रहे देश का शहरी विकास अनौपचारिक, अनियोजित और खासा बेतरतीब है। मुंबई की ही बात करें तो करीब 1/4 भूमि सार्वजनिक स्थान है, जिसका आधा हिस्सा केवल इमारतों के चारों ओर कम उपयोग वाली जगह है। यदि ऐसे खुले स्थान उपलब्ध हों, तो सार्वजनिक भूमि उपलब्धता के लिहाज से मुंबई वैश्विक स्तर पर बेंचमार्क शहरों एम्स्टर्डम व बार्सिलोना जैसा अनुपात हासिल कर सकता है।
एक बड़ी समस्या जलवायु परिवर्तन की भी है। विश्व बैंक के अनुसार, 2050 तक भारत के सकल घरेलू उत्पाद में तीन फीसदी की कमी आ सकती है, जिससे नागरिकों के जीवन स्तर में गिरावट आएगी। कई शहरी विशेषज्ञ स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में जो समाधान खोजते हैं, वे आर्थिक व पर्यावरणीय दृष्टि से सब जगह उपयुक्त नहीं होंगे। दरअसल, जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए तमाम चल रही और भावी शहरी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। जबकि समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, मुंबई में तटीय सडक़ बनाने का क्या कोई अर्थ है?
शहरी संसाधनों तक व्यक्तिगत पहुंच का सुनिश्चित होना जरूरी है। देश में शहरी विकास को लेकर संस्थागत ढांचे को सुदृढ़ व विकसित करने की दरकार है। इसके लिए संस्थानिक क्षमता भी बढ़ानी होगी। भारत को आदर्श रूप से 2031 तक 3 लाख टाउन और कंट्री प्लानर्स की जरूरत होगी, जबकि अभी 5,000 टाउन प्लानर ही हैं। अभी ऐसे 26 संस्थान ही हैं, जो टाउन प्लानिंग से जुड़े पाठ्यक्रम चलाते हैं, जिनसे देश को हर साल करीब 700 टाउन प्लानर मिलते हैं।
यह सवाल बड़ा और दिलचस्प है कि हमारी ऐतिहासिक वास्तुकला से प्रेरित हमारे शहर स्पष्ट रूप से भारतीय क्यों नहीं दिखते? उत्तर भारत के हर शहर में सार्वजनिक स्थान के रूप में एक बावली (बावड़ी) क्यों नहीं हो सकती है? दरअसल, हम संगठित निजी संपत्ति द्वारा संचालित शहरी परिदृश्य बना रहे हैं और इस कारण अपने शहरों को और अधिक मानवीय बनाना भूल गए हैं। आज जरूरत है कि हम अपने शहरी परिदृश्य का पुनर्निर्माण करते हुए एक नए प्रकार के भारतीय नागरिक संस्कार को गढ़ें, जो जातिगत पूर्वग्रहों और छोटी-छोटी प्रतिद्वंद्विता को अप्रभावी करते हुए शहरी ताने-बाने को बेहतर व संवेदनशील शक्ल दे। जाहिर है इसके लिए हमारे शहरी नीति निर्माताओं को शहरी विकास के ऐतिहासिक संदर्भ से अवगत होने की जरूरत है।

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