तकनीक नहीं है तो नई आर्थिक नीतियां भी नहीं ला सकते: प्रोफेसर सूद

- हम पीपीई किट्स से लेकर वेंटिलेटर भी बनाने लगे और उनका निर्यात भी करने लगे। हमारा विज्ञान उस स्तर पर आ गया है। एक साल में वैक्सीन तैयार की है, जिसमें 8 से 10 साल लग जाते थे।

By: विकास गुप्ता

Published: 27 Jan 2021, 10:24 AM IST

बेंगलूरु. देश में अब भी अनुसंधान एवं विकास पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 0.7 फीसदी खर्च हो रहा है। वैज्ञानिक समुदाय इसे बढ़ाकर कम-से-कम 2 फीसदी करने की मांग कर रहा है। सीमित संसाधनों के बावजूद देश में विज्ञान पर जो भी निवेश हुआ, संकट के समय उसका अच्छा रिटर्न मिला। सामाजिक-आर्थिक विकास में विज्ञान के योगदान, चुनौतियों एवं भविष्य की दिशा पर पद्मश्री से सम्मानित आइआइएससी के भौतिक विज्ञानी और देश के शीर्ष वैज्ञानिकों में से एक प्रोफेसर अजय कुमार सूद से राजीव मिश्रा की बातचीत के प्रमुख अंश:

भारतीय अर्थव्यवस्था को हमारा विज्ञान किस तरह सपोर्ट कर रहा है?
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आर्थिक और सामाजिक विकास की धुरी बन रहा है। कोविड ने साबित किया है कि अगर हमारी विज्ञान की ताकत कम होगी तो ऐसी चुनौतियों से नहीं निपट पाएंगे। मार्च से लेकर अब तक जो प्रगति हुई, वह अभूतपूर्व है। चाहे पीपीई किट्स हों, वैक्सीन या दवाएं, अगर विज्ञान का आधार मजबूत नहीं होता तो हम इतने कम समय में इसे नहीं कर पाते। जिस समाज में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकसित होगी, वही इन चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपट पाएगा। सबसे महत्त्वपूर्ण, अगर आपके पास तकनीक नहीं है तो नई आर्थिक नीतियां भी नहीं ला सकते।

आत्मनिर्भर भारत में विज्ञान किस तरह योगदान कर रहा है?
जब हम तकनीक की बात करते हैं तो बहुत जरूरी है कि यह आपकी अपनी इनोवेशन हो। आजकल पेटेंट इतने मजबूत हैं कि अगर तकनीक आपकी नहीं है तो पेटेंट नहीं ले पाएंगे। पुरानी तकनीक ही इस्तेमाल कर पाएंगे। नई तकनीक, नए पेटेंट ड्राइव या नए बाजार के लिए 'फ्रंट-ऐंड' तकनीक विकसित करनी होगी, मुफ्त में तकनीक नहीं मिलने वाली। विज्ञान एवं तकनीक में आत्मनिर्भरता ही देश को आत्मनिर्भर बना एगा।

कोरोना नेे विज्ञान के समक्ष किस तरह की चुनौतियां पेश कीं, क्या बदलाव हुए?
चुनौतियां कई क्षेत्रों में आई हैं। पहले तो पीपीई किट्स और उनसे जुड़ी चीजें बनाई गईं ताकि डॉक्टर और अन्य स्टाफ अस्पतालों में काम कर सकें। जनवरी के अंत में हमारे पास पीपीइ किट और मास्क न के बराबर थे। लेकिन, चार माह में ही इतना हुआ कि हम पीपीई किट्स से लेकर वेंटिलेटर भी बनाने लगे और उनका निर्यात भी करने लगे। हमारा विज्ञान उस स्तर पर आ गया है। एक साल में वैक्सीन तैयार की है, जिसमें 8 से 10 साल लग जाते थे। इतनी तीव्र प्रगति कभी नहीं हुई। हमने एक नया तरीका ढूंढा है और अब उसे लगातार करते रहना होगा।

इस साल विज्ञान का लक्ष्य क्या होगा? दिशा क्या होगी?
दिशा तो बिल्कुल आत्मनिर्भरता की तरफ है। क्योंकि, जो राष्ट्र तकनीक में मजबूत होगा, वही विश्व का नेतृत्व करेगा। आप उधार की तकनीक पर नहीं चल सकते। इसके लिए जो भी परिवर्तन आवश्यक है, वह करना होगा। चाहे वह बुनियादी ढांचे की बात हो या नौकरशाही की। साइंस से राह आसान बनानी होगी। मेरा ख्याल है कि कोविड से जो सबक हमने सीखा, उसका इस्तेमाल नए वर्ष में करना चाहिए। कैसे हमने लालफीताशाही को कम किया, या फिर किस तरह एक-दूसरे का सहयोग किया। इसे एक सबक के तौर पर लेकर आगे बढ़ें।

क्या संदेश देना चाहेंगे?
संदेश यही है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी को कई रूपों में आगे बढऩा है। हमें इनोवेशन पर जोर देना होगा। बेसिक साइंस में तो आगे बढऩा ही है, उसे व्यावहारिक भी बनाना है। हम ये कर रहे हैं और अगर मोटिवेटेड रहे, तो आगे भी कर सकते हैं।

विकास गुप्ता
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