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घातक है वर्षा जल सहेजने वाली संरचनाओं की अनदेखी

जल ही जीवन: पहले जल निकासी की पुख्ता व्यवस्था होती थी, पर आज जरा-सी बारिश में जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है

जयपुरJul 03, 2024 / 09:12 pm

Nitin Kumar

अतुल कनक

साहित्यकार और लेखक

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मानसून के आगमन के साथ ही शहरों में जल प्लावन एक सामान्य दृश्य बन गया है। कुछ समय पहले तक भारी बाारिश के बाद महानगरों का यातायात रेंगने के लिए अभिशापित था, पर अब मंझोले और छोटे शहरों तक का जनजीवन जरा-सी बारिश के बाद अस्त-व्यस्त हो जाता है। जून के अंतिम दिनों में हुई बारिश के बाद देश की राजधानी में जो जल प्लावन के दृश्य देखने को मिले, राजधानी के सामान्यजन उसके अभ्यस्त हो गए हैं लेकिन राजस्थान के एक छोटे नगर गंगापुर सिटी के लोग यह देखकर अवाक थे कि ३० जून को सामान्य बारिश ने सडक़ों को दरिया में तब्दील कर दिया।
दरअसल, यह किसी अकेले शहर की कहानी नहीं है। देश के अधिकांश शहर आज सामान्य या सामान्य से कुछ अधिक बारिश में ही जलभराव की परेशानी से जूझ रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि बढ़ती हुई आबादी के कारण अधिकांश शहरों में अनियोजित तरीके से बस्तियों का विकास किया गया या अनियोजित तरीके से बनी हुई बस्तियों को नियमित करते समय उनमें जल निकासी जैसी आवश्यक सुविधा के विकास का भी ध्यान नहीं रखा गया। भारत दुनिया के उन देशों में है जहां सबसे पहले नगरीय सभ्यता का विकास हुआ था। सिंधु सभ्यता के अधिकांश शहरों में जल निकासी की व्यवस्था इतनी परिपूर्ण थी कि आज भी उस दौर की ‘इंजीयनिरिंग’ पर आश्चर्य होता है। बस्तियों को जलभराव से बचाने के लिए पर्याप्त नालियां थीं और वर्षा जल संग्रहण के लिए समुचित बंदोबस्त थे। परवर्ती नगरों में भी इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि वर्षा ऋतु में आसमान से बरसने वाला पानी बस्तियों में जल आपदा का कारक नहीं बने।
भारत एक कृषिप्रधान देश है। किसी भी कृषिप्रधान समाज के लिए वर्षा ऋतु उत्सव का आनंद जागृत करती है क्योंकि बरसते बादल अपनी संचित निधि से खेतों में पसरी उम्मीदों को नवजीवन सौंपते हैं। पर बादल केवल खेत में ही नहीं बरसते, रिहायशी इलाकों में भी बरसते हैं। बादलों से बरसता पानी लोगों में जीवन के प्रति सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, इसलिए हमारे पूर्वजों ने वर्षा जल संग्रहण के लिए हर बस्ती में कुंओं, बावडिय़ों, तालाबों, कुण्डों, जोहड़ों जैसी जल संरचनाओं का निर्माण कराया। राजस्थान के कोटा शहर के उदाहरण से इस बात को समझा जा सकता है। कोटा शहर हाड़ौती के पठार के सबसे निचले हिस्से पर बसा हुआ है। जब कभी पठार के ऊपरी हिस्से पर बरसात होती थी, बरसात का पानी तेजी से निचले हिस्से की ओर दौड़ता था। उन दिनों कोटा, बूंदी रियासत के अधीन था। बूंदी के राजकुमार धीरदेह ने सन् 1326 में इस पूरे पठार पर १३ तालाबों का निर्माण करवाया। सबसे निचले स्तर पर बनाया गया बड़ा तालाब एक बड़ी मोरी (जलनिकासी के लिए बनी संरचना) के द्वारा चंबल नदी से जुड़ा हुआ था यानी तालाबों की क्षमता से अधिक पानी की आवक होने पर भी बस्तियों में जल प्लावन की स्थिति पैदा नहीं होती थी। आजादी के बाद विकास की दौड़ में शामिल होने के उत्साह में राजकुमार धीरदेह द्वारा बनवाए गए अधिकांश तालाबों को तहस-नहस कर दिया गया तो बरसों तक कोटा जरा-सी बारिश के कारण बाढ़ में डूबने लगा। बाद में इस समस्या का यह हल निकाला गया कि पठार के ऊपरी हिस्से में बरसने वाला पानी शहर तक आने के पहले ही एक डायवर्जन चैनल के माध्यम से चंबल नदी में डाल दिया गया। इस विकल्प से बार-बार आने वाली बाढ़ की समस्या से तो पीछा छूट गया, पर नुकसान यह हुआ कि जो बरसात का पानी जमीन द्वारा आत्मसात कर लिया जाता था, धरती उसके लिए तरस गई। आज चंबल के किनारे बसे कोटा शहर में ही अनेक इलाकों में भूजल का स्तर बहुत कम हो गया है।
जब कुंए, तालाब, बावड़ी, जोहड़ वर्षा जल संग्रहण करते थे तो न केवल वर्षपर्यंत जरूरत का पानी उपलब्ध कराते थे बल्कि अपने अंक में संचित जल से भूजल स्तर बढ़ाने में भी अहम भूमिका अदा करते थे। वैश्विक स्तर पर भूजल का घटता हुआ स्तर गहरी चिंता का विषय है। नगर नियोजन से जुड़ी जिम्मेदार एजेंसियां यदि वर्षा जल संग्रहण के प्रति संवेदनशील रहें तो शहर न केवल बार-बार जल प्लावन की अवांछित स्थिति का सामना करने से बचेंगे बल्कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा भूजल की कमी से उत्पन्न होने वाली परेशानियों से भी बचेगा। क्या जिम्मेदार लोग यह संवेदनशीलता दिखाएंगे?

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