कैसे सहेगा भारत कोयले की और 'कालिख'

- कोयले की खदानें और कार्बन उत्सर्जन: खनन पर भारी समूचे विश्व के स्वास्थ्य, पर्यावरण और जलवायु पर दुष्प्रभावों का आकलन

- संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन की दर को उलटने में भारत की महती भूमिका है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों से निपटने को लेकर भारत की स्थिति बेहद कमजोर है। एचएसबीसी ने इस संदर्भ में भारत को 67 देशों की सूची में पहले स्थान पर रखा (2018), जबकि जर्मनवॉच ने भारत को 181 देशों की सूची में पांचवें स्थान पर रखा (2020)।

 

By: विकास गुप्ता

Published: 05 May 2021, 10:48 AM IST

बाढ़ से लेकर गर्मी में लू तक हर हाल में जलवायु की बुरी दशा को देखते हुए एक बात स्पष्ट है कि अब किसी भी देश को कोयले में निवेश नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह सर्वाधिक प्रदूषणकारी ईंधन है। कार्बन उत्सर्जक देशों की सूची में अग्रणी अमरीका, चीन, जापान ने 'कार्बन न्यूट्रलिटी' यानी कार्बन से परहेज करने संबंधी योजनाओं की घोषणा की है। भारत ने भी ऊर्जा नवीनीकरण की प्रतिबद्धता दोहराई है। इस वास्तविकता के बीच एक खबर है अडानी के 16.5 बिलियन अमरीकी डॉलर की लागत वाले कारमाइकल कोल माइन प्रोजेक्ट की, जिससे प्रमुख रूप से भारत को कोयला निर्यात किया जाएगा और भारत में 4.6 बिलियन टन कार्बन प्रदूषण और बढ़ जाएगा। यह फैसला और भी ज्यादा दोषपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह निवेश सिर्फ और सिर्फ सरकारी सब्सिडी के प्रावधान के दम पर ही संभव हो सका है।

वर्ष 2019 में विश्व भर में कार्बन उत्सर्जन की मात्रा करीब 36 बिलियन टन थी, जिसके करीब 40 प्रतिशत की वजह कोयला था। कोयले की विध्वंसक भूमिका से पूरी दुनिया वाकिफ है। दक्षिण-पश्चिमी चीन में कोयला जलाने से हुआ पर्यावरणीय और सामाजिक नुकसान कोयले की कीमत से चार गुना अधिक है। अमरीका में कोयला आधारित पावर स्टेशनों से सेहत को पहुंचने वाला नुकसान कुल उत्पादन के मूल्य का एक से छह गुना है। कोविड-19 से दुनिया भर में जितनी मौतें हुई हैं, उनमें से करीब 15 फीसदी के पीछे लंबे समय तक वायु प्रदूषण के बीच रहना अहम वजह हो सकता है। ऑस्ट्रेलिया से भारत को कोयले के निर्यात के चलते भारी मात्रा में कोयला खनन एवं कोयला जलाने के कारण भारत व ऑस्ट्रेलिया समेत सम्पूर्ण विश्व के स्वास्थ्य, पर्यावरण और जलवायु को भारी नुकसान उठाना होगा।

आने वाले समय में कारमाइकल खान, ऑस्ट्रेलिया की सबसे बड़ी कोयले की खान होगी, जिससे सालाना 60 मिलियन टन और 60 साल की अवधि के दौरान करीब 2.3 बिलियन टन कोयले का उत्पादन होगा। जरूरत है कि इसके घातक परिणामों के साथ जलवायु पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों का भी आकलन किया जाए। अडानी की कारमाइकल माइन से होने वाले सालाना 79 मिलियन टन कार्बन के बराबर कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जन की गंभीरता को इस तरह समझा जा सकता है कि पूरे मलेशिया का यह उत्सर्जन 81 मिलियन टन, जबकि ऑस्ट्रिया का महज 13 मिलियन टन है। यह खदान गैलिली बेसिन में भी सबसे बड़ी खदान होगी, जिसे नौ अन्य कोयला खदानों के लिए खोला जा रहा है। नतीजा यह होगा कि गैलिली बेसिन से समग्र रूप से प्रति वर्ष 705 मिलियन टन कार्बन डाइ ऑक्साइड का उत्सर्जन होगा। यह ऑस्ट्रेलिया के मौजूदा उत्सर्जन से 1.3 गुना अधिक है। भयानक गर्म हवाओं, जंगलों में आग लगना, मूसलाधार बारिश जैसी जलवायु परिवर्तन की घटनाओं से सबक लेते हुए ऑस्ट्रेलिया ही नहीं, भारत को भी खदानों से होने वाले उत्सर्जन पर गहन चिंतन और पुनर्विचार करने की जरूरत है।

ऑस्ट्रेलिया, विश्व का सबसे बड़ा कोयला निर्यातक देश है। 2020 में ऑस्ट्रेलिया से होने वाले कोयला निर्यात का 16 प्रतिशत निर्यात भारत को हुआ। कोयला खनन का ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान है। भले ही ऑस्ट्रेलिया में कोयले के खनन और निर्यात से आय होती हो और रोजगार सृजन होता हो, लेकिन इससे होने वाले प्रदूषण, मृदा क्षरण और जैव विविधता को होने वाले नुकसान के चलते उस योगदान का मूल्य नकारात्मक साबित हो रहा है।

ऑस्ट्रेलिया इंस्टिट्यूट की एक रिपोर्ट ने इस पहलू को उजागर किया है कि कोयले के उत्खनन और उसको जलाने से होने वाले नुकसान को दरअसल कोयला खनन प्रोजेक्ट की कुल लागत में शामिल नहीं किया जाता। एक अनुमान के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया में इससे सेहत को होने वाले सालाना नुकसान का आकलन करीब 2.6 बिलियन डॉलर है।

चीन के बाद भारत ही कोयले का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। भारत के पास ऊर्जा नवीनीकरण के लिए महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं, परन्तु देश की प्राथमिक ऊर्जा जरूरत का 50 प्रतिशत हिस्सा अभी भी कोयले से ही पूरा होता है। भारत में कोयले के कारण ही प्रतिवर्ष एक लाख लोग असमय मृत्यु का शिकार होते हैं। सर्वाधिक मार गरीब तबके पर पड़ती है। कार्बन डाइ ऑक्साइड ही ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण है, जो जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है। संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन की दर को उलटने में भारत की महती भूमिका है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों से निपटने को लेकर भारत की स्थिति बेहद कमजोर है। एचएसबीसी ने इस संदर्भ में भारत को 67 देशों की सूची में पहले स्थान पर रखा (2018), जबकि जर्मनवॉच ने भारत को 181 देशों की सूची में पांचवें स्थान पर रखा (2020)। सरकारी नीतियों और पब्लिक-प्राइवेट निवेश में भारत पर मंडरा रहे प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन के जोखिमों के प्रति चिंता नजर आनी चाहिए। यदि भारत को आर्थिक वृद्धि कायम रखनी है और गरीबी घटानी है तो जलवायु परिवर्तन की दर को उल्टा करना ही होगा। कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जन में भारत तीसरे स्थान पर है। कोयला-आधारित क्षमता व आयात बढ़ाना अब भारत और सहन नहीं कर सकता है। अडानी प्रोजेक्ट से यदि भारत को भारी मात्रा में कोयले का निर्यात हुआ तो उत्सर्जन का स्तर और बढ़ेगा।

मनुष्य की सेहत को नुकसान पहुंचाने और जलवायु परिवर्तन को खतरनाक स्तर पर पहुंचाने में कोयले की भूमिका चूंकि सर्वविदित है, ऐसे में विशेष तौर पर सरकारी सब्सिडी के दम पर नए निवेश को जायज नहीं कहा जा सकता। भारत के लिए उचित रणनीति यही होगी कि वह सौर व पवन ऊर्जा में निवेश बढ़ाए और ऊर्जा नवीनकरण के साथ ऊर्जा दक्षता में सुधार के प्रयास करे। भारत सरकार 'कार्बन न्यूट्रलिटी' की योजनाएं बना रही है। 'शून्य कार्बन' का लक्ष्य हासिल करने के लिए नवीनीकृत ऊर्जा के उत्पादन, संग्रह और वितरण में व्यापक निवेश करने की जरूरत है और इस चुनौती को स्वीकार करने में भारत सक्षम भी है। लेकिन अडानी की कारमाइकल खान और भारत को कोयले के निर्यात को मंजूरी दोनों ही इस चुनौती को स्वीकारने की राह में बड़ी अड़चनें हैं। यह सच है कि कोयला, ऊर्जा जरूरत का एक बड़ा हिस्सा है, लेकिन इसमें और निवेश बड़ी भूल होगी।

लेखक - डॉ. विनोद थॉमस, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में विजिटिंग प्रोफेसर और वल्र्ड बैंक के पूर्व सीनियर वाइस प्रेजीडेंट

लेखक- चित्रांजलि तिवारी एलमनस, ली कुआन यू स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी, सिंगापुर

विकास गुप्ता
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