आख्यान : विष्णु अवतार परशुराम के राम की परीक्षा लेने का महात्म्य

राम से युद्ध के आग्रह में परशुराम का अहंकार नहीं, कत्र्तव्यबोध था। वे राम को यों ही अगले युग का नायक स्वीकार नहीं कर सकते थे।

By: विकास गुप्ता

Published: 21 Jul 2021, 10:32 AM IST

सर्वेश तिवारी श्रीमुख, (पौराणिक पात्रों और कथानकों पर लेखन)

अपने चारों पुत्रों के विवाह के बाद पुत्रों, वधुओं और समस्त सेना के साथ जनकपुर से अयोध्या लौटते महाराज दशरथ के पथ में अचानक तेज आंधी चलने लगी। अत्यधिक धूल के कारण दिखना बंद हो गया, सैनिक इधर-उधर भाग कर छिपने लगे। कुछ क्षण बाद आंधी का वेग कम हुआ तो सबने देखा, सामने से जमदग्नि कुमार भगवान परशुराम आ रहे थे। अयोध्या के ऋषि समाज ने उनकी आगवानी की, पर क्रोध से भरे परशुराम सीधे दाशरथि राम के पास पहुंचे और कहा, 'मैं तुम्हारी शक्ति को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूं। संसार में दो धनुष सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं, उनमें एक भगवान शिव के धनुष को तुमने तोड़ दिया, दूसरा भगवान विष्णु का धनुष मेरे पास है। तुम इसकी प्रत्यंचा चढ़ा सको तो मैं तुम्हें अपने साथ द्वंद्वयुद्ध का अवसर दूंगा।' महाराज दशरथ भगवान परशुराम के तेज को जानते थे, वे उनसे शांत होने की प्रार्थना करने लगे। वशिष्ठ आदि ऋषियों को भी परशुराम ने अनसुना कर दिया। वे राम से ही बात करते रहे। मुस्कुराते राम ने धनुष लिया और क्षण भर में ही प्रत्यंचा चढ़ा कर बाण खींच लिया। फिर उन्होंने परशुराम की ओर मुड़ कर कहा, 'आप ब्राह्मण हैं भगवन! सो मैं आप पर तो प्रहार नहीं कर सकता। अब आप ही बताइये कि इस बाण से किस पर प्रहार करूं। क्यों न मैं इस तीर से आपके समस्त पुण्यों का नाश कर दूं...।'

परशुराम जड़ हो गए थे। अब तक दूर खड़े महर्षि विश्वामित्र आगे बढ़े और हाथ जोड़ कर रहस्यमय स्वर में कहा, 'पहचान लिया भगवान?' परशुराम मुस्कुराए। राम की ओर बढ़ कर समर्पण भाव से कहा, 'शीघ्रता कीजिए प्रभु! अपने बाण से मेरी समस्त प्रतिष्ठा को समाप्त कर दीजिए। अब से यह युग आपका है, आप संभालें इसे। मैं निश्चिंत हो कर महेंद्र पर्वत जाकर तप करूंगा।' राम ने बाण वायु में छोड़ दिया और परशुराम उन्हें प्रणाम कर के वापस महेंद्र पर्वत चले गए। प्रश्न यह है कि क्या बाण से पुण्यों का नाश हो सकता है? नहीं। वस्तुत: भगवान राम के प्रत्यंचा चढ़ाने और परशुराम के समर्पण से उनके द्वारा अर्जित की गई सदैव अपराजेय रहने की प्रतिष्ठा का नाश हो गया था। परशुराम भगवान विष्णु के अवतार और अपने युग के नायक थे। राम से युद्ध के आग्रह में उनका अहंकार नहीं, कत्र्तव्यबोध था। वे राम को यों ही अगले युग का नायक स्वीकार नहीं कर सकते थे। इसके लिए राम की शक्ति, धैर्य, और साहस की परीक्षा आवश्यक थी, जो इसी घटना के समय पूरी हुई। तभी रामयुग में भगवान परशुराम पूर्णत: शांत ही रहे।

विकास गुप्ता
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