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सामयिक: महिलाओं के स्वतंत्र मतदान ने बदला राजनीति का रुख

- महिलाओं को टिकट देने के पीछे चुनावों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी।
- 2009 के लोकसभा चुनावों में 43 फीसदी महिलाओं ने बिना किसी की सलाह लिए खुद वोट दिए जबकि 2019 के चुनावों में अपने बलबूते वोट देने वाली महिलाओं की संख्या 81 प्रतिशत रही।

नई दिल्ली

Published: October 29, 2021 08:25:17 am

संजय कुमार, (प्रोफेसर, सीएसडीएस और लोकनीति के सहनिदेशक)

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने जब से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में महिला उम्मीदवारों को 40 फीसदी टिकट देने की घोषणा की है, एक बार फिर यह चर्चा जोर पकडऩे लगी है कि क्या महिला मतदाता किसी पार्टी के लिए गेमचेंजर हो सकती हैं। सवाल उठने लगे हैं कि सभी राजनीतिक दलों में महिला मतदाताओं के प्रति अचानक प्रेम क्यों उमडऩे लगा है? जवाब सामने है-अतीत के मुकाबले ज्यादा महिला मतदाता मतदान के लिए मतदान केंद्रों पर पहुंचती हैं।

सामयिक: महिलाओं के स्वतंत्र मतदान ने बदला राजनीति का रुख
सामयिक: महिलाओं के स्वतंत्र मतदान ने बदला राजनीति का रुख

भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा जारी लैंगिक आंकड़ों से भी इसके स्पष्ट साक्ष्य मिलते हैं। 1980 और 90 के दशक में महिला व पुरुष मतदाता के बीच जो अंतर 9-10 प्रतिशत था, वह 1950-60 में बहुत अधिक था। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में यह अंतर बहुत कम हो गया। इन चुनावों में महिला-पुरुष मतदाता समानुपात में मतदान करते दिखे। कई राज्यों में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा रही। उत्तराखंड में मतदान में महिलाएं आगे रहीं तो गुजरात में मतदान का परम्परागत रुख कायम रहा और मतदान में पुरुष, महिलाओं से आगे रहे। यह परिवर्तन केवल लोकसभा चुनावों में ही नहीं, विधानसभा चुनावों में भी सामने आया।

2017 के विधानसभा चुनावों में महिला मतदाताओं ने यही उत्साह बरकरार रखते हुए पुरुषों से 7 प्रतिशत अधिक मतदान किया। हिमाचल प्रदेश, बिहार, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, गोवा व अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में महिला मतदाताओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। महिला मतदाताओं को लुभाने की राजनीतिक दलों की कवायद का एक कारण यह भी है कि महिला मतदाताओं की भागीदारी चुनावों में बढ़ी है। इससे ज्यादा बड़ा कारण यह है कि राजनीतिक दल महिलाओं के समर्थन में नीतियां बनाने (जब सत्ता में हों) से लेकर उन्हें टिकट देने तक के प्रयास इसलिए कर रहे हैं कि ज्यादातर महिलाएं अब स्वतंत्र मतदाता बनती जा रही हैं।

भारत में चुनावों के शुरुआती वर्षांे में देखा गया कि महिला मतदाता या तो मतदान करने ही नहीं जाती थीं, या उनका वोट भी परिवार के पुरुष ही दे आते थे। जो महिलाएं जाती भी थीं वे अपने पति की सलाह पर ही अपना वोट डालती थीं। पर बीते कुछ दशकों से हालात बदले नजर आ रहे हैं। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के अनुसार, 2009 के लोकसभा चुनावों में 43 फीसदी महिलाओं ने बिना किसी की सलाह लिए खुद वोट दिए जबकि 2019 के चुनावों में अपने बलबूते वोट देने वाली महिलाओं की संख्या 81 प्रतिशत रही। जाहिर है स्वतंत्र मतदाता के रूप में महिला मतदाताओं की संख्या बढ़ी है।

लेकिन महिला मतदाताओं की संख्या बढऩा इस बात का संकेत नहीं है कि भारतीय चुनावों में महिला मतदाताओं का कोई गुट है, जिसमें कि एक गुट किसी अमुक पार्टी को ही मतदान करेगा। उनके वोट विभिन्न पार्टियों में विभाजित हैं, जबकि बाकी सामाजिक गुट अक्सर ऐसा करते हैं। लोकनीति-सीएसडीएस के सर्वेक्षणों की शृंखला के आंकड़ों के अनुसार, महिला मतदाताओं के वोट विभिन्न राज्यों की अलग-अलग पार्टियों के बीच कमोबेश विभाजित ही रहते हैं जबकि कुछ अपवाद भी हैं, जैसे उत्तराखंड में महिला वोट बीजेपी को ज्यादा मिलते हैं, केरल में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट, तमिलनाडु में एआइएडीएमके और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को। हिन्दी भाषी राज्यों में महिला मतदान बढ़ा है लेकिन किसी खास पार्टी की ओर महिला मतदाताओं के झुकाव के यहां कोई संकेत नहीं हैं। कांग्रेस की रणनीति इस बड़े वोट बैंक को अपने पक्ष में करने के लिए शुरुआत में ही कोशिश करने की है, जो जाहिर है कि बेहद चुनौतीपूर्ण है।

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