संकल्प धरातल पर लाने की चुनौती

Sunil Sharma

Publish: Sep, 06 2017 01:37:00 (IST)

Opinion
संकल्प धरातल पर लाने की चुनौती

डोकलाम और लद्दाख में हाल ही में चीन और भारत की सेनाओं के बीच हुए टकराव के बाद इस बातचीत को काफी अहम माना जा रहा है

- प्रो. स्वर्ण सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

डोकलाम विवाद के तुरंत बाद चीन में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आतंकवाद के मुद्दे पर आम सहमति बनाने में कामयाबी हासिल की है। इसे भारत की कूटनीतिक जीत बताया जा रहा है। साथ ही सीमा विवाद को भी हल करने पर जोर दिया गया। अहम सवाल यही है कि क्या चीन अपने इस दोस्ताना रवैये को कायम रख पाएगा?

बॉर्डर इलाकों में शांति कायम करने, आपसी मतभेदों को सद्भावनापूर्ण बातचीत से हल करने की बातों के साथ मतभेदों को विवाद में न बदलने की जो चर्चा हुई उससे यह उम्मीद की जानी चाहिए कि शीघ्र ही ऐसा वातावरण बनेगा जिसमें दोनों देश साझा रूप में काम करेंगे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग के बीच हुई द्विपक्षीय बातचीत में दोनों देशों के विवादों को आपसी बातचीत के जरिए हल करने पर सहमति के संकेत हैं। डोकलाम और लद्दाख में हाल ही में चीन और भारत की सेनाओं के बीच हुए टकराव के बाद इस बातचीत को काफी अहम माना जा रहा है। चीन के राष्ट्रपति का पंचशील के सिद्धांतों को दोहराना पिछले तीन माह से दोनों देशों के बीच चल रहे तनाव को पूर्ण ठहराव देना जैसा लगता है। जिनफिंग ने कहा कि चीन, भारत के साथ मिलकर पंचशील के सिद्धांतों के तहत काम करने के लिए तैयार है।

ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के नेताओं के बीच हुई इस बातचीत के सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए भारत-चीन के रिश्तों में बदलाव लाने के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। जैसी उम्मीद थी द्विपक्षीय बातचीत में इन नेताओं के बीच आतंकवाद के मुद्दे पर अलग से चर्चा नहीं हुई। ज्यादा जोर सीमाओं पर शांति बनाए रखने पर ही दिया गया। इसका कारण यह था कि ब्रिक्स सम्मेलन के घोषणापत्र में सभी सदस्य देश आतंकवाद की चुनौतियों को लेकर समान स्तर पर कटिबद्धता रखने का संकल्प दोहरा चुके थे।

ब्रिक्स घोषणा पत्र में पाकिस्तानी आतंकी संगठनों का जिक्र करा भारत ने बड़ी कूटनीतिक सफलता हासिल की है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। जाहिर तौर पर इससे चीन पर इस बात का दबाव बढ़ेगा कि वह अपने मित्र पाकिस्तान पर आतंकी संगठनों पर सख्त एक्शन लेने का दबाव बनाए। गौरतलब है कि चीन अब तक जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंध लगाने की भारत की कोशिशों पर पानी फेरता रहा है। चीन हमेशा यह तर्क देता रहा है कि इस प्रतिबंध के लिए भारत को पर्याप्त सबूत देने चाहिए।

हमें यह देखना होगा कि डोकलाम विवाद की छाया में शंघाई कॉरपोरशन आर्गनाइजेशन की अस्ताना (कजाकिस्तान) में हुई मीटिंग में भारत और चीन के बीच अस्ताना सहमति में यह बात उभर कर आई थी कि दो देशों के मध्य विवाद होने पर उन्हें अपने पड़ोसियों को लेकर पक्षपात नहींं करना चाहिए। दोनों नेताओं की बॉडी लेंग्वेज से साफ झलक रहा था कि अब भारत-चीन आपसी मतभेदों को दरकिनार कर आगे बढऩा चाहते हैं। लेकिन यह मानना जल्दबाजी होगी कि भारत-चीन के मध्य मुश्किलें पूरी तरह खत्म हो गई हैं। कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि डोकलाम जैसे विवाद फिर खड़े हो जाएं। लेकिन बॉर्डर इलाकों में शांति कायम करने, आपसी भरोसा बढ़ाने, विवादों को सद्भावनापूर्ण बातचीत से हल करने की बातों के साथ मतभेदों को विवाद में न बदलने की जो चर्चा दोनों नेताओं के बीच हुई उससे यह उम्मीद की जानी चाहिए कि शीघ्र ही ऐसा वातावरण बनेगा जिसमें दोनों देश साझा रूप में काम करेंगे।

भले ही आतंकवाद के मसले पर दोनों देशों के बीच क्या बातचीत हुई इसका ब्यौरा सामने नहीं आया लेकिन इतना तय है कि नरेन्द्र मोदी ने इस मसले पर शी जिनफिंग के सम्मुख अपना पक्ष जरूर रखा होगा। ब्रिक्स सम्मेलन के संयुक्त घोषणा पत्र में आतंकी संगठनों का जिक्र कर ‘नेमिंग एंड शेमिंग’ का बड़ा काम हुआ है। सदस्य देशों ने इस घोषणा पत्र में जो भावना व्यक्त की है उसके मुताबिक आतंकियों को विश्व के किसी भी देश में सिर छिपाने तक की जगह भी नहीं मिलनी चाहिए। जाहिर है, इशारा पाकिस्तान की ओर भी है। चाहे पाकिस्तान संरक्षण देने की बात स्वीकार नहीं करे लेकिन यह तो तय है कि जिन आतंकी संगठनों का नाम लिया गया है उनके सरगना पाकिस्तान में ही निवास करते हैं।

आतंकवाद के इस मसले को ब्रिक्स के मंच पर लाने में भारत की कामयाबी को इसलिए भी अहम माना जाता है क्योंकि गोवा में हुए पिछले ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी चाहते थे कि आतंकवाद की चर्चा के साथ इसके पोषक के रूप में पाकिस्तान का जिक्र भी हो। तब चीन के विरोध के कारण ऐसा नहीं हो पाया था। अब चूंकि ब्रिक्स सम्मेलन का मेजबान खुद चीन था। इसलिए मेजबान के नाते उसे यह दिखाना था कि वह सब सदस्य देशों की भावनाओं के साथ है। यही वजह है कि भारत अपने प्रयासों में सफल हो पाया। लेकिन मोटे तौर पर इस सम्मेलन के घोषणा पत्र में आतंकवाद को लेकर कही गई बातों को सिर्फ इच्छाओं का प्रवाह ही समझा जाना चाहिए।

असली चुनौती घोषणा पत्र में दोहराए गए संकल्प को धरातल पर उतारने की रहेगी। हमें यह भी देखना होगा कि अगला ब्रिक्स सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका में होना है। हालांकि दक्षिण अफ्रीका के लिए आतंकवाद बड़ा मुद्दा नहीं है। इसलिए आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का यह माहौल कितना रह पाएगा इस बारे में कुछ कहना आसान नहीं। ऐसे में जिस बात को अहम माना जाना चाहिए वह है आतंकवाद के खिलाफ चीन का सकारात्मक रवैया। जरूरत इस बात की होगी कि ब्रिक्स के सदस्य देश आतंकवाद से निपटने का साझा कार्यक्रम तो बनाएं ही, निगरानी का तंत्र भी बनाएं। आतंकी संगठनों के खाते फ्रीज करना, खुफिया सूचनाएं साझा करना और आतंकवाद के पोषक देशों से आर्थिक व कूटनीतिक संबंध खत्म करने जैसे कदमों को उठाकर ही इस दिशा में ठोस सफलता की उम्मीद की जा सकती है।

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