India-China: रिश्तों की मजबूती

भारत-चीन नए रिश्तों की दहलीज पर खड़े दिख रहे हैं। इसका स्वागत होना चाहिए। यह दोनों देशों के लिए आर्थिक मजबूती लेकर आएगा...

Dilip Chaturvedi

October, 1406:06 PM

विचार

India-China Relationship: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा से पहले जो आशंकाएं थीं, वे धराशायी हो गईं और रिश्तों की एक नई इबारत उभर कर आई है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग ने साफ किया कि दोनों देश बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था हैं और इसके लिए साथ चलना पसंद करेंगे। कूटनीतिक और सामरिक स्तर पर दोनों देशों के बीच भले ही रिश्ते अलग हैं, लेकिन निकट भविष्य के कारोबार में दोनों सदियों पुराने संबंधों को मजबूत बनाने की कोशिश करेंगे। नए रिश्तों की गरमाहट का ही असर रहा कि जिस कश्मीर के मुद्दे को इस यात्रा के दौरान सबसे अहम माना जा रहा था, उस पर कोई जिक्र तक नहीं हुआ।

यात्रा से पहले अरुणाचल में भारतीय सैन्य अभ्यास और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को भी बड़ा मुद्दा माना जा रहा था, लेकिन चीन के राष्ट्रपति ने कश्मीर के मुद्दे के साथ इनसे भी किनारा कर लिया। अगर कोई मुद्दा दोनों नेताओं के लिए अहम दिखा तो सिर्फ यह कि कैसे दोनों देश अपने व्यापारिक घाटे को कम करेंगे? यह आज के वक्त में दोनों देशों की सबसे बड़ी जरूरत है। मंदी की आहट के बीच भारत को निर्यात के लिए नए बाजारों की तलाश है, जबकि चीन को भी अपना सामान बेचने के लिए भारतीय बाजार की सबसे ज्यादा जरूरत है।

आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2018-19 में भारत का कुल व्यापार घाटा 176 अरब डॉलर था। इसमें 5३ अरब डॉलर घाटे के लिए चीन जिम्मेदार था। अगर सरल भाषा में कहें तो भारतीय निर्यात को चीन से बहुत उम्मीदें हैं। पिछले साल वुहान में हुई दोनों नेताओं की मुलाकात में भी निर्यात का मुद्दा उठा था और उस समय इसे सुधारने का भरोसा दोनों ओर से दिया गया था। हालांकि यह भी सिर्फ चावल और चीनी पर ही आकर रुक गया।

भारतीय दवाइयों के लिए चीन ने अपने दरवाजे अब तक नहीं खोले हैं। दूसरी ओर, चीन का व्यापारिक घाटा अमरीका की वजह से लगातार बढ़ रहा है। अमरीका ने चीन से होने वाले आयात पर दरें बढ़ा दी हैं। ऐसे में चीन की नजर भारतीय बाजार पर है। दोनों देशों के लिए यह सही वक्त है, जब वे एक-दूसरे के लिए व्यापारिक रास्ते खोलें। इस यात्रा में दोनों देशों ने अपने व्यापारिक रिश्तों की गांठों को सुलझाने के लिए मामल्लापुरम (महाबलीपुरम) को चुना। यह वही स्थान है, जो सदियों पहले भी दोनों देशों के बीच कारोबार का सबसे बड़ा केंद्र रहा।

यह कोशिश इस बात का संकेत है कि आने वाले कल में एशिया के भीतर एक नई दुनिया का उदय हो रहा है। चीन भले ही भरोसेमंद न हो, लेकिन व्यापारिक जरूरतों के लिए दोनों को एक-दूसरे पर विश्वास करना ही होगा। रिश्तों की कूटनीति यही है कि बदलते वक्त में रिश्तों के भीतर भी बदलाव दिखे। भारत-चीन नए रिश्तों की दहलीज पर खड़े दिख रहे हैं। इसका स्वागत होना चाहिए।

dilip chaturvedi
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