कड़े प्रतिकार को रहना होगा तैयार

कड़े प्रतिकार को रहना होगा तैयार
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Dilip Chaturvedi | Updated: 05 Mar 2019, 02:56:56 PM (IST) विचार

पारंपरिक युद्ध में यदि हम पड़ गए तो शायद यह आर्थिक तौर पर देश के हित में न हो। फिलहाल सर्वश्रेष्ठ विकल्प तो यही है कि सीमा पर किसी भी सूरत में कड़े प्रतिकार के लिए हम तैयार रहें। जरूरत इस वक्त जोश के साथ-साथ होश में रहकर काम करने की है।

अरुण के. साहनी, रक्षा विशेषज्ञ

पाकिस्तान ने भारतीय वायुसीमा क्षेत्र का उल्लंघन किया। उसने सैन्य कार्रवाई की और भारत के सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले करने का प्रयास किया। यह बात दीगर है कि हमारी प्रतिरक्षा व्यवस्था इतनी मजबूत थी कि पाकिस्तानी युद्धक विमान हमें हानि नहीं पहुंचा सके। इस संदर्भ में बात समझने की यह है कि भारत ने पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान की जमीन से संचालित आतंकी प्रशिक्षण शिविरों पर हमला किया था। भारत की ओर से 'नॉन-मिलिट्री प्रिएम्पटिव' एयर स्ट्राइक की गई थी। यह आतंकियों और उनके ठिकानों पर की गई कार्रवाई थी।

पाकिस्तान ने आतंक के विरुद्ध की गई इस कार्रवाई के जवाब में हवाई हमला किया। इस पाकिस्तानी हवाई हमले में उन एफ-16 युद्धक विमानों का इस्तेमाल हुआ जो उसने अमरीका से मिली आर्थिक मदद से खरीदे थे। यह आर्थिक मदद पाकिस्तान को उसकी अफगानिस्तान से लगती सीमा पर होने वाली आतंकी कार्रवाई को रोकने के लिए दी गई थी।

महत्वपूर्ण जानकारी यह भी है कि अमरीका ने एफ-16 की खरीद के समय शर्त रखी थी कि इनका इस्तेमाल किसी भी सैन्य कार्रवाई में नहीं किया जाए। घरेलू आतंकी कार्रवाई को ध्वस्त करने या आत्मरक्षा में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है। ये विमान वैश्विक आतंकवाद और राजद्रोह की स्थिति में भी प्रयोग में लाए जा सकते हैं। यही नहीं, आधुनिक सुविधाओं से लैस इन विमानों में लगी एएम-आरएएएम (एडवांस्ड मीडियम-रेंज एयर-टु-एयर मिसाइल) मिसाइलों के इस्तेमाल से पूर्व अमरीका की अनुमति की भी शर्त थी।

पाकिस्तान ने अमरीका की शर्तों का पालन नहीं करते हुए, इन एफ-16 विमानों का इस्तेमाल भारत के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई में किया, जिस पर अमरीका ने नाराजगी जताई है। निश्चित रूप से कूटनीतिक तौर पर यह काफी गंभीर बात है। अमरीका अभी एफ-16 और एएम-आरएएएम मिसाइलों के गलत इस्तेमाल के सबूत जुटा रहा है। चिंता की बात यह है कि अमरीका संसाधनों का गलत इस्तेमाल हुआ है। पूर्व में अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को अमरीकी सहायता पर रोक भी लगाई थी। अब अमरीका की हालिया नाराजगी का असर यह हो सकता है कि वह भविष्य में दी जाने वाली अन्य सहायता पर भी रोक लगा सकता है। वह विमानों के रख-रखाव के लिए दी जाने वाली मदद रोक सकता है। फिलहाल अमरीका शर्तों के उल्लंघन को लेकर गंभीर दिखाई दे रहा है।

जहां तक भारत की बात है, खैबर पख्तूनख्वा तक गहराई में जाकर आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया गया है। अच्छी बात यह रही कि भारत ने जता दिया है यदि उसकी सरजमीं पर कोई आतंकी कार्रवाई होगी तो वह चुप नहीं बैठेगा, बल्कि घुस कर मारेगा। आतंकियों के विरुद्ध भारत की ओर से कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी, यह रुकने वाली नहीं है। भारतीय कार्रवाई में जैश-ए-मोहम्मद के बड़े नेताओं में से एक के मारे जाने और एक के घायल होने की जो जानकारी मिली है, यदि उसकी पुष्टि हुई, तो निस्संदेह यह बोनस है। सबसे अहम बात यह रही कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारे हमले की कार्रवाई के विरुद्ध किसी किस्म की नकारात्मक टिप्पणी नहीं हुई, बल्कि इसका समर्थन ही किया गया। यह हमारी कूटनीतिक रणनीति का सकारात्मक परिणाम कहा जा सकता है।

सवाल उठता है कि भारत को अब क्या करना होगा। इस संदर्भ में मेरा यही मानना है कि पाकिस्तान भी एक घोषित परमाणु शक्ति है। ऐसे में हमें चाहिए कि हम संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के माध्मय से उसको प्राप्त आर्थिक मदद रोके जाने का दबाव बनाएं। सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों पर पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को नष्ट करने का इस वक्त पूरा दबाव बनाने का अवसर भारत के पास है। इसके साथ हमारी सेना पाकिस्तान की हर किस्म की कार्रवाई का मुंहतोड़ जवाब देने को तैयार है और ऐसा कर भी रही है। पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने के साथ हम आतंकियों के विरुद्ध कार्रवाई भी करते रहें तो मुझे लगता है कि पाकिस्तान की हरकतों को काबू में कर पाना आसान हो सकता है।

जहां तक विंग कमांडर अभिनंदन को पाकिस्तान द्वारा मुक्त कर हमें सौंपने की बात है तो निस्संदेह पाकिस्तान ने उन्हें युद्धबंदी के तौर जिनेवा संधि के तहत मुक्त किया है। इसका अर्थ तो यही निकलता है कि हालात युद्ध के हैं। पाकिस्तान ने इसके साथ ही शांति और वार्ता की बात की है। निस्संदेह पाकिस्तान दबाव में है और चेहरा छिपाने के लिए उसने दुनिया के सामने शांतिदूत बनने का ढोंग किया है। अन्यथा वह हमारे पुराने युद्धबंदियों को क्यों नहीं छोड़ देता। पहले भी हमारे जवानों के साथ उन्होंने कोई कम ज्यादतियां नहीं की हैं। अभिनंदन की सुरक्षित वापसी के लिए भारत की ओर से हर प्रकार का दबाव बनाया गया और इस मामले में हमें बड़ी सफलता मिली।

सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह युद्ध स्थिति बनी रहनी चाहिए तो मेरा मानना है कि चौकन्ना तो हमें रहना ही होगा। हर आतंकी गतिविधि का हमें इसी तरह मुंहतोड़़ जवाब भी देना होगा। लेकिन, पारंपरिक युद्ध में यदि हम पड़ गए तो शायद यह आर्थिक तौर पर देश के हित में न हो। फिलहाल सर्वश्रेष्ठ विकल्प तो यही है कि सीमा पर किसी भी सूरत में कड़े प्रतिकार के लिए हम तैयार रहें। जरूरत इस वक्त जोश के साथ-साथ होश में रहकर काम करने की है।

जहां तक आमजन का भारतीय सेना को समर्थन और जोश की बात है तो यह सब केवल युद्ध की परिस्थितियों के दौरान ही क्यों दिखना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि आम दिनों में जब किसी शहीद के परिवार को मदद नहीं मिलती और उसे सरकारी विभागों के चक्कर लगाने को मजबूर होना पड़ता है, तब भी उन्हें ऐसा ही समर्थन मिले। एक परिपक्व राष्ट्र वही होता है, जिसमें शांतिकाल में भी फौजियों को वही सम्मान और समर्थन मिले, जो युद्ध के हालात में मिलता है।

(लेखक, भारतीय सेना के सेवानिवृत्त अधिकारी। दक्षिण पश्चिम कमान के कमांडर भी रहे। परम विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित।)

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