भारत को साबित करनी होगी अपनी नेतृत्व क्षमता

करीब 100 देश मानवता को बचाने के लिए कोरोना वैक्सीन एवं अन्य औषधियों को पेटेंट कानून से मुक्त करने की मांग कर चुके हैं
कोरोना वैक्सीन को पेटेंट के दायरे से बाहर लाने की कोशिश...

By: विकास गुप्ता

Published: 25 May 2021, 08:32 AM IST

रामपाल जाट, (राष्ट्रीय अध्यक्ष, किसान महापंचायत)

विश्व में एक संस्कृति की उपज च्यवन ऋषि हैं, दूसरी संस्कृति की उपज बिल गेट्स जैसे धनाढ्य हैं । भारत में उपजी, पनपी, फली-फूली ऋषि-कृषि की संस्कृति से उपजे च्यवन ऋषि ने बुढ़ापे को जवानी में परिवर्तित करने के लिए 'च्यवनप्राश' नामक औषधि का निर्माण किया। इसके उपरांत बिना किसी प्रकार का शुल्क लिए विश्व को समर्पित कर दिया। दूसरी संस्कृति की उपज विश्व के धनाढ्यों ने कोविड-19 के संक्रमण को रोकने के लिए जीवन रक्षक औषधि एवं कोरोना रोधी टीकाकरण को पेटेंट कानून से मुक्त करने के विरोध में झंडा थामा हुआ है। 'बौद्धिक संपदा' ईश्वर प्रदत्त होते हुए भी उसका उपयोग स्वयं के धनोपार्जन के लिए करने की इच्छा ही नहीं रखते, बल्कि वे उसके प्रति गंभीर दुराग्रह भी पाले हुए हैं। अभी कोविड-19 विश्व महामारी के रूप में विभिन्न देशों में कहर ढा रहा है। तालाबंदी जैसे कदमों के कारण सामान्यतया विश्व के सभी कोविड प्रभावित देशों की आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित हो रही हैं।

भारत की ऋषि-कृषि संस्कृति में बुद्धि निजी संपदा मानकर उससे धनार्जन की वृत्ति को अस्वीकार किया गया है। इसी कारण भारत में 'बौद्धिक संपदा अधिकार' से संबंधित पेटेंट के लिए कानून अंग्रेजी शासन में 1852 के पूर्व अस्तित्व में नहीं थे। जब भारत में बौद्धिक संपदा के अधिकार से संबंधित पेटेंट के कानून की धारणा को स्वीकार किया गया, तब भी विश्व के अन्य देशों में बने कानूनों से भारत का कानून श्रेष्ठतर है। जीवन रक्षक औषधियों को मुक्त रखने के साथ ही जिनके लिए कानून बनाया गया, उसकी अवधि विश्व के अन्य देशों की तुलना में कम रखी गई, यथा - विश्व के अधिकतर देशों में इस कानून संरक्षण की अवधि 30 वर्ष थी, तब भी भारत में यह अवधि 20 वर्ष की रखी गई थी। वर्ष 1991 के डंकल प्रस्ताव के गर्भ से उपजे विश्व व्यापार संगठन के वर्ष 1995 में विश्वव्यापी समझौते में इसी बौद्धिक संपदा अधिकार के संरक्षण को धनोपार्जन के उपकरण के रूप में काम में लिया गया।

भारत में वर्ष 1852 से पेटेंट कानून बनने का सिलसिला चला और इस अवधि में जो कानून अभी हैं, उनमें भी भारतीय पेटेंट अधिनियम 1970 संशोधित वर्ष 2003 तक में प्राकृतिक नियमों के प्रत्यक्षत: प्रतिकूल, नैतिकता के विरुद्ध, मानव-पशु-पौधों के जीवन या स्वास्थ्य या पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले औषधीय/ उपचार की प्रक्रिया/ रोग मुक्त करने के लिए या उनके उत्पादों के आर्थिक मूल्य को बढ़ाने के लिए उपचार के लिए सभी प्रकार की प्रक्रिया इस कानून की परिधि से बाहर रखी गई है। 1970 के कानून में वर्ष 1999 में संशोधन लाने के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति ने भी औषधीय, फार्मास्यूटिकल एवं एग्रो केमिकल्स को इन कानूनों की परिधि से बाहर रखने के लिए अनुशंसा दी, वह भी भूतलक्षी प्रभाव से। ये कानून ऋषि-कृषि संस्कृति की छाया से दूर नहीं किए गए।

विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों की संख्या 165 है, जिनमें से 100 देश मानवता को बचाने के लिए कोरोना रोधी वैक्सीन एवं अन्य औषधियों को पेटेंट कानून से मुक्त करने की मांग कर चुके हैं। आगामी 8-9 जून को विश्व व्यापार संगठन द्वारा गठित ट्रिप काउंसिल की बैठक है। यह अवसर है कि भारत इस प्रकार के प्रस्ताव को पारित कराने के लिए जी-जान से जुटकर विश्व में अपनी नेतृत्व क्षमता को सिद्ध करे। इस दिशा में अक्टूबर 2020 में भारत तथा दक्षिण अफ्रीका विश्व व्यापार संगठन में संयुक्त प्रस्ताव रख चुके हैं। इसमें विकसित देशों का विरोध बाधा बना हुआ है। खास बात यह है कि इस ट्रिप काउंसिल में इस प्रकार का प्रस्ताव पारित करने के लिए सर्वसम्मति की बाध्यता नहीं है। विश्व व्यापार संगठन के प्रावधानों के अनुसार दो तिहाई बहुमत की ही आवश्यकता है।

विकास गुप्ता
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