उद्योग, मोदी और जनता

उद्योग, मोदी और जनता

Jameel Khan | Publish: Sep, 11 2018 10:20:06 AM (IST) विचार

भले ही यह सर्वे वर्ष 2019 में मोदी के सत्ता में लौटने पर मुहर लगाता दिख रहा हो पर इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में चुनावी जीत रूपी ताले की असली चाबी तो जनता के हाथ में है।

इंडिया लीडरशिप काउंसिल के एक सीईओ सर्वे ने तय कर दिया कि वे चाहते हैं देश में फिर बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार बने। सीईओ के इस समूह को लगता है कि जो काम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में किए हैं, उसके बेहतर परिणाम दूसरे कार्यकाल में मिलने लगेंगे। ये सर्वे इसलिए भी मायने रखता है, क्योंकि जब भी चैंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री के लोग प्रधानमंत्री या वित्तमंत्री से रूबरू हुए तो उन्हें लगा कि वे इंडस्ट्री की दिक्कतों से वाकिफ हैं। भले ही यह सर्वे वर्ष 2019 में मोदी के सत्ता में लौटने पर मुहर लगाता दिख रहा हो पर इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में चुनावी जीत रूपी ताले की असली चाबी तो जनता के हाथ में है।

ये परिणाम लगभग तब आए जब जीडीपी के हाल ही जारी आंकड़ों पर यूपीए ने दावा किया कि उसके कार्यकाल में आजादी के बाद सबसे ज्यादा तरक्की हुई। यूपीए का दावा है कि वो एनडीए के लिए भरी-पूरी अर्थव्यवस्था छोड़ गए थे, जो पहले कार्यकाल में 8.87 की दर से बढ़ी और 9.5 फीसदी तक पहुंची। हमें यह याद रखना चाहिए कि वर्ष 2004 से 2008 के दौरान ग्लोबल इकोनॉमी बूम कर रही थी और मंदी के चलते जब गुब्बारा फूटा, तो सभी देशों के लिए दिक्कतें शुरू हो गईं। राष्ट्रीय सांख्यिकीय आयोग (NSC) के हालिया आंकड़ों पर नीति आयोग के चेयरमैन राजीव कुमार की दलील है कि 2009-2011 और इसके पहले के साल में उच्च विकास दर का कारण बैंकों से हुई जबरदस्त फंडिंग थी, जिसने देश की अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार दिया।

यह बात भी गौर करने योग्य है कि विकास के आंकड़ों और रोजगार के दावों पर चुनाव से पहले बहस और सियासत हमेशा से होती आई है। वर्ष 2019 के चुनाव में भी रोजगार सृजन का आंकड़ा अहम पहलू बनने जा रहा है। चाहे भाजपा हो या कांग्रेस या फिर कोई और दल, आमतौर पर सत्ता में आने पर यही कहते आए हैं कि उन्हें खजाना खाली मिला। जाहिर है यह बात सत्ताधारी पार्टी को उपलब्धियों और आर्थिक विकास दर को बड़ा करके दिखाने में मदद करती है। इस बीच यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या मोदी की अगुवाई वाली एनडीए 2019 के आम चुनाव में हार सकती है? तो सवाल यह भी है कि क्या इसके लिए जरूरी आक्रोश जनमानस में नजर आ रहा है?

देखा जाए तो मोदी का विजन और उनकी लीडरशिप अब भी लोगों में उम्मीद जगाती नजर आती है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सरकार की कई फ्लैगशिप योजनाओं में अपेक्षा के अनुरूप बढ़त नहीं मिल पाई। इस नाकामयाबी की वजह नौकरशाहों को बताया जा सकता है। कारण यह कि उनका सही समय पर क्रियान्वयन नहीं हो पाया। योजनाओं के पिछडऩे दूसरा कारण यह कि बीजेपी शासित राज्यों में से कुछ में मुख्यमंत्री बहुत अच्छा काम नहीं कर पाए। प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि जब देश वर्ष 2022 में आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा होगा तो 50 लाख बेघरों को अपना घर मिल चुका होगा, 99 फीसदी ग्रामीण और शहरी घरों तक बिजली पहुंच चुकी होगी। वे पिछले चार बरसों में मुद्रा योजना के जरिए सात करोड़ लोगों को लोन दिए जाने और सात करोड़ टॉयलेट्स व 1.2 लाख किलोमीटर राजमार्ग निर्माण की उपलब्धि भी गिना रहे हैं।

एक तरफ सरकार के ये दावे चुनाव से आठ महीने पहले मतदाताओं के बीच उम्मीद जगाते नजर आते हैं, दूसरी ओर कुछ अर्थशास्त्री मोदी के काम को कम आंकते हैं, खास तौर से जीएसटी और नोटबंदी के चलते बनी सरकार की नकारात्मक छवि को लेकर, तो तीसरी ओर 54 फीसदी सीईओ हैं जो उनके काम की सराहना कर रहे हैं।सीईओ के इस समूह का मानना है कि संरचनात्मक सुधारों के नकारात्मक प्रभाव खत्म हो रहे हैं, मैन्यूफैक्चरिंग और ग्राहक खर्च में मजबूत प्रदर्शन दिखाई दे रहा है और अप्रेल से जून 2018 की तिमाही की ग्रोथ 8.2 फीसदी रही है। 52.78 फीसदी सीईओ मानते हैं कि मोदी अगर वर्ष 2019 में सत्ता में लौटे तो पटरी पर वापस लौटती नजर आ रही अर्थव्यवस्था गति पकडऩे लगेगी।

इंडस्ट्री के ये शीर्ष लोग गठबंधन सरकार की अपनी बाध्यताओं और मजबूरियों से अनभिज्ञ नहीं हैं। वे बखूबी जानते हैं कि कई बार गठबंधन ऐसी नीतियों के लिए दबाव डालता है जो लोकप्रिय हों, जो अक्सर विकास और वित्तीय संतुलन पर नकारात्मक असर डालने लगती हैं, और यह भी जानते हैं कि गठबंधन सरकारों में शामिल होने वाले क्षेत्रीय छत्रप आर्थिक पहलुओं के बजाय सियासी फायदों को ज्यादा तरजीह देते हैं। ऐसे में ये सवाल गौर करने लायक हैं द्ग क्या सीईओ सर्वेक्षण इस विविधता भरे और बड़े देश की नब्ज को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ रहा है? क्यों ब्लूचिप कंपनियों के लिए सेंसेक्स चुनौतीपूर्ण रहने के बावजूद उन्हीं के 86 फीसदी शीर्षस्थ लोग मोदी के पक्ष में हैं? क्यों उन्हें लगता है कि बीजेपी दूसरे दलों की तुलना में आर्थिक विकास के मोर्चे पर सही दिशा में बढ़ रही है? हालांकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव जीतना कहीं ज्यादा जटिल है, यह बात निश्चित है कि असली चुनावी मुद्दे वर्ष 2018 के आखिर तक सतह पर नजर आने लगेंगे।

बिंदु डालमिया

नीति विश्लेषक

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