scriptIneffectiveness of antibiotics increases the risk | एंटीबायोटिक दवाइयों के बेअसर होने से खतरा बढ़ा | Patrika News

एंटीबायोटिक दवाइयों के बेअसर होने से खतरा बढ़ा

भारतीय चिकित्सा वैज्ञानिक अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के ताजा अध्ययन के अनुसार भारत के हर तीन स्वस्थ्य वयस्कों में से दो का शरीर एंटीबायोटिक रेजिस्टेंट हो चुका है। पिछले कुछ दशकों में बैक्टीरियल (जीवाणु) संक्रमण से होने वाले रोगों में ज्यादा वृद्धि हुई है। एंटीबायोटिक दवाइयों के अंधाधुंध प्रयोग की वजह से जीवाणुओं ने अपनी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा लिया है।

नई दिल्ली

Published: December 24, 2021 11:36:10 pm

डॉ. ए.के. अरुण
(राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त जनस्वास्थ्य वैज्ञानिक)

विगत कुछ वर्षों में संक्रामक रोगों के घातक होने की एक वजह 'एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस' भी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की कड़ी चेतावनी के बावजूद एंटीबायोटिक दवाओं का अंधाधुंध प्रयोग किया जा रहा है। इस माामले में भारत की स्थिति बहुत नाजुक है। भारतीय चिकित्सा वैज्ञानिक अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के ताजा अध्ययन के अनुसार भारत के हर तीन स्वस्थ्य वयस्कों में से दो का शरीर एंटीबायोटिक रेजिस्टेंट हो चुका है। यानी उन पर एंटीबायोटिक दवाएं बेअसर हैं।
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डब्ल्यूएचओ इस सकंट को वैश्विक स्वास्थ्य और विकास के लिए एक खौफनाक चुनौती के रूप में देख रहा है। चेतावनी यह है कि यदि स्थिति पर नियंत्रण नहीं हो पाया, तब हर साल लगभग एक करोड़ लोग एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की वजह से कालकवलित होंगे और 2.4 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीने के लिए मजबूर होंगे।
पिछले कुछ दशकों में बैक्टीरियल (जीवाणु) संक्रमण से होने वाले रोगों में ज्यादा वृद्धि हुई है। एंटीबायोटिक दवाइयों के अंधाधुंध प्रयोग की वजह से जीवाणुओं ने अपनी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा लिया है।
इन पर अब एंटीबायोटिक दवाइयों का असर ही नहीं हो रहा और ये 'सुपरबग' बन गए हैं। ऐसे में जनस्वास्थ्य वैज्ञानिकों की चिंता यह है कि एंटीबायोटिक दवा के प्रभावहीन हो जाने के बाद रोग ग्रस्त लोगों की मौत का आंकड़ा बेहिसाब बढ़ेगा और चिकित्सा जगत के लिए एक बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। इसमें भारत की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक होगी, क्योंकि अब भी भारत में बेहिसाब एंटीबायोटिक दवाइयों का दुरुपयोग हो रहा है।
आइसीएमआर के अध्ययन में पाया गया है कि एंटीबायोटिक दवाओं में सेफालोस्पोरिन और फ्लूरोक्विनोलोन के कारण लगभग 60 फीसदी से ज्यादा ड्रग रेजिस्टेंस के मामले सामने आए हैं।
इस अध्ययन में जिन बैक्टीरिया ने इन एंटीबायोटिक दवाओं को पचा लिया है उनमें, ई कोलाई, क्लेबसिएला, साल्मोनेला, शिजेला तथा येरसिनिया पेस्टिस प्रमुख हैं, जो भारतीयों में संक्रमण के लिए ज्यादा जिम्मेदार हंै। अध्ययन में साफ तौर पर पाया गया है कि भारत में एंटीबायोटिक दवाइयों का धड़ल्ले से किया जा रहा इस्तेमाल इसकी मुख्य वजह है। एंटीबायोटिक दवाइयों के दुरुपयोग को रोकने के लिए डब्ल्यूएचओ ने स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनका गंभीरता से पालन किया जाना चाहिए।
एंटीबायोटिक दवाइयों के दुरुपयोग का मामला केवल मनुष्यों में ही नहीं है। यह आहार के लिए पाले जाने वाले जानवरों में भी बहुतायत से किया जा रहा है। इसका मांसाहारी मनुष्यों को भी नुकसान होगा। एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के कारण डायरिया, पेट के रोग, फेफड़े के संक्रमण, एलर्जी आदि से ग्रस्त लोगों की स्थिति गम्भीर हो सकती है और उनकी जान खतरे में पड़ सकती है। इस खतरनाक और खौफनाक स्थिति से बचने के लिए हमारे पास एक आसान रास्ता है, अनावश्यक एंटीबायोटिक दवाइयों से बचना। साथ ही वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों को अपनाएं।
शोध बता रहे हैं कि सामान्य व महामारी की स्थिति में होम्योपैथी तथा आयुर्वेदिक दवाइयां भी भरोसा करने लायक हैं। शरीर की प्रतिरक्षा बढ़ाने तथा बचाने में वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों में कई तरह की दवाइयां मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह पर किया जा सकता है। यदि हम बीमारियों और दवाइयों के दुरुपयोग से होने वाले खतरों से बचना चाहते हैं, तो हमें वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों का महत्त्व समझना ही होगा। बेहतर तो यह है कि सरकार समस्या की गंभीरता को देखते हुए ठोस कदम उठाए।

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