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सिंगल यूज प्लास्टिक: प्रतिबंध के लिए जन सहयोग और आधारभूत ढांचा भी जरूरी

पूरे देश में 1 जुलाई से सिंगल यूज प्लास्टिक के उपयोग पर लग जाएगा प्रतिबंध

Published: May 02, 2022 08:42:26 pm

डॉ. विवेक एस. अग्रवाल
(ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, संचार और शहरी स्वास्थ्य विशेषज्ञ)

देश में 1 जुलाई 2022 से एकबारगी उपयोग में आने वाली प्लास्टिक की वस्तुओं पर पूरी तरह प्रतिबंध की घोषणा की गई है। यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है हमारी भूमि, जल एवं वायु पर पसरते प्रदूषण के प्रकोप को रोकने की दिशा में। हर ओर, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मानवीय एवं समस्त जैविक सभ्यता को नष्ट करने में प्लास्टिक एक बड़े अवयव के रूप में स्थापित हुआ है।
प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र
हाल ही, विश्व स्वास्थ्य दिवस की पूर्व संध्या पर प्रतिष्ठित समाचार-पत्र 'द गार्जियन' के अंतरराष्ट्रीय संस्करण में प्लास्टिक संबंधी आलेख ने तो मानव शरीर में जमा हो रहे प्लास्टिक कणों की भयावहता को लेकर ध्यान आकर्षित किया है। इस बार विश्व स्वास्थ्य दिवस 'मेरा ब्रह्माण्ड: मेरा स्वास्थ्य' की थीम को लेकर मनाया गया था। आलेख के अनुसार शल्य क्रिया के समय लिए गए 13 टिश्यू नमूनों में से 11 में फेफड़ों में माइक्रो प्लास्टिक कणों को पाया गया जो कि मूलत: पोलीप्रोपाइलीन (पीपी) और पोलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी) के थे। ये वही कण हैं जो कि सामान्यतया पैकेजिंग, बोतल, पाइप इत्यादि में उपयोग किए जाते हैं। यदि इनके स्रोत की पृष्ठभूमि में जाएं तो वह श्वास, भोजन, पेय इत्यादि के माध्यम से शरीर में प्रवेश करते हैं तथा रक्त के माध्यम से विभिन्न अंगों में पहुंच कर परत-दर-परत जमा होते चले जाते हैं। यह निरंतर उपयोग के साथ बढ़ती हुई परतें अंगों में शिथिलता, निष्क्रियता और अंत में उसकी सुशुप्तता तक का कारण बन सकती हैं।
आम इंसान को यह अहसास भी नहीं हो पाता है कि प्लास्टिक किस प्रकार एवं किस रूप में उसके शरीर में प्रवेश करता जा रहा है। वह यथार्थ से अनभिज्ञ निरंतर प्लास्टिक का उपयोग यह समझते हुए करता रहता है कि इसके सतही कण किसी भी रूप में उसको व्यक्तिश: हानि नहीं पहुंचाते, किंतु माइक्रो एवं नैनो प्लास्टिक कण शरीर में चुपचाप उपयोग, सम्पर्क एवं वातावरण के माध्यम से पहुंचते जाते हैं और मानव शरीर को गंभीरतम बीमारियों की ओर धकेलते रहते हैं। जब भी प्लास्टिक के किसी भी रूप को प्रतिबंधित करने पर चर्चा होती है तो उसके मात्र पर्यावरणीय अथवा गैर-मानवीय (यथा पशुओं) प्रभाव को ही समझाया जाता है। संभवतया, इस कारण आमजन स्वयं पर उसके प्रभाव के तथ्यों को नजरअंदाज कर देता है। लेकिन, निरंतर अध्ययनों एवं प्रमाणों ने मानवीय स्वास्थ्य पर प्लास्टिक के गहरे प्रभाव को स्पष्ट किया है। इससे हृदय, फेफड़े, यकृत, गुर्दे तो सीधे-सीधे प्रभावित होते ही हैं, प्लास्टिक कणों द्वारा कैंसर की संभावना को भी प्रबल माना गया है।
विश्व के अनेकानेक हिस्सों में प्लास्टिक के मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव को लेकर किए जा रहे अनुसंधानों में इसके विभिन्न शारीरिक अंगों में जमाव, निष्क्रियता कारक तत्व, इसके कैंसर कारक चरित्र को लेकर एकमतता है। संभवतया यही कारण है कि भारत सरकार, इस दिशा में अति सक्रियता के साथ पेरिस घोषणा के अनुगमन रूप में आगामी 1 जुलाई से सिंगल यूज प्लास्टिक के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लागू कर रही है।
ऐतिहासिक रूप से वर्ष 1869 में हाथीदांत व कछुए के कवच के रूप में सृजित प्लास्टिक लगभग डेढ़ सौ वर्ष बाद उन्हीं और उन जैसे जीवों की मृत्यु का कारक बन गई है। यदि विश्लेषण करें तो पांच प्रमुख सिंगल यूज प्लास्टिक तत्व, जैसे कि 1. पीने के उपयोग में आने वाले स्ट्रॉ, 2. पीने के पानी/पेय में उपयोग में ली जाने वाली बोतल, 3. कॉफी के कैप्सूल, 4. पेय पदार्थों के उपभोग में प्रयुक्त कप व ढक्कन, तथा 5. प्लास्टिक के बैग, मानवीय/जैविक सभ्यता के लिए विकटता उत्पन्न करते हैं। ये प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण, स्वास्थ्य, नैसर्गिक सौंदर्य पर प्रतिकूल प्रभाव छोड़ते हैं। उक्त पांचों तत्व जहां अधिकांशतया प्रतिकूलता रखते हैं, वहीं इनके विकल्प भी सुगमता से उपयोग में लाए जा सकते हैं। जैसे 1. कांच, स्टील या सिलिकॉन से निर्मित पुन: उपयोग में ली जा सकने वाली स्ट्रॉ, 2. धातु, कांच, या बीपीए फ्री प्लास्टिक निर्मित, पुन: उपयोग में ली जाने वाली बोतल, 3. बायोडिग्रेडेबल कॉफी कैप्सूल, 4. पुन: उपयोग में आने वाले कप, 5. कपड़े एवं अन्य वैकल्पिक सामग्री से निर्मित थैले, वातावरण से प्लास्टिक के दुष्प्रभाव को बहुत हद तक कम करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
जहां एक ओर इसकी भयावहता है, वहीं दूसरी ओर बड़ी चुनौती इस संभावित त्रासदी से निपटने की है। आत्मावलोकन पर कुछ ऐसे तथ्य उभर कर आते हैं, जिनसे संशय उत्पन्न होता है कि क्या हम सिंगल यूज प्लास्टिक प्रतिबंध को पूरी तरह से लागू कर पाएंगे। इसमें जहां सबसे बड़ी बाधा मानव स्वयं है, जिसने प्लास्टिक को अपने सुगम जीवन का एक महत्त्वपूर्ण यंत्र समझ लिया है वहीं इसके विकल्प के रूप में आवश्यक वस्तुओं की आर्थिक व्यवहार्यता एवं उपयोग क्षमता, निस्तारण हेतु आधारभूत ढांचा प्रमुख अवरोध हैं। यह मानना कि कानून या शासकीय व्यवस्था मात्र से प्लास्टिक का उपयोग रुक जाएगा, मिथ्या सोच है। इसके व्यक्तिगत दुष्प्रभाव का प्रचार, विकल्पों की सुलभता एवं सामथ्र्यपरकता, पुन: चक्रण संवर्धन हेतु आवश्यक नीति और संग्रहण व्यवस्था को मजबूत बनाया जाना कुछ ऐसे कदम हैं जो सफलता में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं।
हमें यह बात समझनी होगी कि इस प्रतिबंध से भविष्य की भयावहता को भले ही कुछ हद तक रोका जा सकता है, लेकिन मानव स्वास्थ्य पर प्लास्टिक के प्रतिकूल असर को तब तक कम नहीं किया जा सकेगा जब तक कि जलाशयों (समुद्र, नदी आदि), पहाड़ों, भूमि पर जमे करोड़ों टन प्लास्टिक को समूल नष्ट नहीं कर लिया जाता।

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