वरदान के रूप में मिली सूचना क्रांति को अभिशाप न बनाएं

- बढ़ते यौन अपराधों का एक मुख्य कारण है इंटरनेट
- विभिन्न रिपोर्ट यह दर्शाती हैं कि युवाओं में सूचना-प्रौद्योगिकी का प्रयोग अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है, लेकिन उचित देखरेख के अभाव में यह अंधाधुंध एवं अविवेकपूर्ण भी है। निश्चित ही इसके दुष्परिणाम युवाओं के व्यवहार एवं व्यक्तित्व में परिलक्षित हो रहे हैं।

By: Patrika Desk

Published: 04 Oct 2021, 08:52 AM IST

गौरव श्रीवास्तव, (उप-महानिरीक्षक पुलिस, अपराध शाखा, राजस्थान)

अक्सर महिलाओं व बच्चियों के साथ यौन अपराध की खबरें सुर्खियों में रहती हैं। ऐसे मामलों में पुलिस तत्परता से काम करते हुए आरोपी को गिरफ्तार भी करती है। इसके बावजूद वह जनता और मीडिया के निशाने पर रहती है। मुश्किल यह है कि मीडिया में ऐसी खबरों में घटना से जुड़े तथ्यों व सामाजिक परिस्थितियों को कम ही स्थान मिलता है। राजस्थान पुलिस की अपराध शाखा ने वर्ष 2019 एवं 2020 में प्रदेश में दर्ज बलात्कार के प्रकरणों की विभिन्न बिंदुओं के आधार सूचना एकत्रित की और उसका विश्लेषण किया। इसमें कुछ चौंकाने वाली जानकारियं सामने आईं। कुछ ऐसी बातें भी थीं, जिनका आभास तो पहले से ही था, परंतु अब प्रमाण भी मिल गया। यह पाया गया कि 90 प्रतिशत प्रकरणों में पीडि़ता एवं आरोपी पूर्व से परिचित थे। केवल वर्ष 2020 का आंकड़ा लें, तो 95 प्रतिशत पीडि़ता और आरोपी पूर्व से परिचित हैं।

परिचित आरोपियों में भी 47 प्रतिशत पड़ोसी या एक ही गांव या मोहल्ले के रहने वाले हैं। 20 प्रतिशत आरोपी तो पीडि़ता के रिश्तेदार ही हैं। कहीं न कहीं यह समाज में बढ़ते विश्वासघात का परिचायक है। जहां लगभग 30 प्रतिशत पीडि़ताएं नाबालिग हैं, वहीं यह भी पाया गया कि 70 प्रतिशत आरोपी 18 से 30 वर्ष की आयु के हैं। 45 प्रतिशत आरोपी या तो अशिक्षित हैं या केवल प्राइमरी स्कूल तक पढ़े हैं। पीडि़ताओं में अशिक्षित या प्राइमरी स्कूल तक पढ़ी बालिकाओं और महिलाओं का अनुपात 58 प्रतिशत है। क्या यह मानना गलत होगा कि कम उम्र के लड़के-लड़कियों में शिक्षा और जागरूकता के अभाव के कारण ऐसे अपराध बढ़े हैं?

इस बीच डेटा रिपोर्टर ने शोध एवं विश्लेषण के आधार पर डिजिटल 2021 रिपोर्ट जारी की है। वर्ष 2021 के आरंभ में प्रकाशित 'डिजिटल 2021: इंडिया' रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में 110 करोड़ से अधिक मोबाइल फोन कनेक्शन हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश में 62.4 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता एवं 44.8 करोड़ सक्रिय सोशल मीडिया प्रयोगकर्ता हैं। केवल एक वर्ष (2020) में हमारे देश में 4.7 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता एवं 7.8 करोड़ सक्रिय सोशल मीडिया प्रयोगकर्ता बढ़ गए हैं। ट्राई की 2020 की रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल मोबाइल उपयोगकर्ताओं में 45 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।

सवाल यह है कि क्या यह संचार क्रांति अभिशाप बन गई है? रिपोर्ट के अनुसार 16 वर्ष से 64 वर्ष की आयु के व्यक्ति, जिनके पास विभिन्न उपकरण हैं, उनमें से 96.3 प्रतिशत स्मार्टफोन के उपयोग करते हैं। इसी आयु वर्ग के व्यक्ति प्रतिदिन 6 घंटे 36 मिनट औसत इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। मोबाइल के माध्यम से इंटरनेट प्रयोग में लेने वाले 92 प्रतिशत उपभोक्ता हैं, जिसकी पुष्टि ट्राई की रिपोर्ट से भी होती है। चिंता की बात यह है कि इंटरनेट ट्रैफिक के अनुसार टॉप 20 वेबसाइट में से क्रमश: 6, 15,16 और 17 पर पोर्न साइट हैं। इसी रिपोर्ट के अनुसार 96.7 प्रतिशत उपभोक्ता इंटरनेट पर वीडियो ही देखते हैं। इस प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए शायद सोशल मीडिया सेवा प्रदाता उनका कंटेंट और विज्ञापन इस प्रकार रचते हैं कि उनकी पहुंच एवं प्रभाव सर्वाधिक 25-34 वर्ष (37.2 प्रतिशत) एवं 18-24 वर्ष (31.9 प्रतिशत) के व्यक्तियों में है।

विभिन्न रिपोर्ट यह दर्शाती हैं कि युवाओं में सूचना-प्रौद्योगिकी का प्रयोग अप्रत्याशित रूप से तो बढ़ा ही है, उचित देखरेख के अभाव में यह अंधाधुंध एवं अविवेकपूर्ण भी है। निश्चित ही इसके दुष्परिणाम युवाओं के व्यवहार एवं व्यक्तित्व में परिलक्षित हो रहे हैं। ज्ञान एवं सूचनाओं के आदान-प्रदान में सूचना-प्रौद्योगिकी का योगदान अपूर्व है। कोरोना काल में इसी तकनीकी मदद से चिकित्सा और शिक्षा व्यवस्था को सुचारु रखने का प्रयास हुआ। मनोरंजन के लिए भी इसका उपयोग हुआ। लोगों को जागरूक करने में इस तकनीक का इस्तेमाल हुआ। यदि हम इस तकनीक के गैर-जिम्मेदार उपयोग के प्रति शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन छिपाते रहेंगे और युवा पीढ़ी के व्यक्तित्व निर्माण में परिवार, समाज, शैक्षणिक संस्थाओं व स्वस्थ परंपराओं की उपेक्षा करते रहेंगे, तो आशंका यह है कि अपूरणीय क्षति के हालात पैदा हो सकते हैं।

आखिर क्यों यौन अपराधों पर केवल खाकी ही शर्मसार होती है? घर, परिवार और समुदाय लड़कों-पुरुषों में सद्गुण के बीज क्यों नहीं बो पा रहे हैं? धर्म और आस्था के नाम पर हिंसा करने वाले क्या मानव-धर्म की पालना करना ही भूल गए हैं? पुलिस एक पंचिंग बैग जैसी है। आप आलोचनाओं से भरपूर लात-घूंसे मारकर शारीरिक एवं मानसिक तनाव दूर कर सकते हैं, परंतु इससे समस्या का समाधान नहीं पा सकते।

अंग्रेजी में कहावत है 'नॉलेज इज पॉवर'। तकनीकी एवं संचार क्रांति ने आज हर उम्र, जाति, वर्ग, आर्थिक स्तर के व्यक्ति को यह ताकत दे दी है। याद रहे परमाणु बम और परमाणु ऊर्जा केंद्र एक ही तकनीक पर आधारित हैं। अंग्रेजी की ही एक और कहावत है 'विद ग्रेट पॉवर,कम ग्रेट रेस्पांसिबिलिटी।' एक प्रश्न जो आज हर व्यक्ति को स्वयं से पूछना जरूरी है - क्या हमें इस जिम्मेदारी का अहसास है? क्या हम वास्तव में इस तकनीकी का प्रयोग जिम्मेदारी से कर सकते हैं? क्या हम कंप्यूटर की तरह युवा पीढ़ी की भी प्रोग्रामिंग इस प्रकार कर सकते हैं कि वे स्मार्ट के साथ-साथ सेंसिटिव भी बन सकें? ध्यान रहे, पूरे विश्व की 180 करोड़ युवा जनसंख्या में सबसे अधिक 35.6 करोड़ युवा, सबसे आशाजनक मानव संसाधन एवं सबसे अनुकूल जनसांख्यिकीय विभाजन भारत देश में ही है। वे क्या देख रहे हैं, यह देखना जरूरी है। हमारा भविष्य कैसा दिखेगा, इस पर मनन जरूरी है।

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