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ब्लूमबर्ग से... परमाणु वार्ता को लेकर गंभीर नहीं है ईरान

तेहरान का मानना है कि जब तक वार्ता जारी रहेगी बाइडन प्रशासन और प्रतिबंध नहीं लगाएगा। अटकते रहने व लम्बे समय के लिए बार-बार टलने वाली वार्ता की आड़ में इस्लामिक रिपब्लिक अपने यूरेनियम भंडार बढ़ाता रहेगा और जेसीपीओए का उल्लंघन करता रहेगा। ईरान परमाणु राष्ट्र बनने के कगार पर है, पर यह क्षेत्रीय स्थिरता व विश्व शांति के लिए खतरा है।

नई दिल्ली

Published: December 01, 2021 11:26:55 am

बॉबी घोष
(स्तम्भकार - ब्लूमबर्ग)

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर वियना में सोमवार से वार्ता तो शुरू हुई लेकिन इसमें दो महत्त्वपूर्ण अनुपस्थिति दर्ज की गईं - अमरीका और आशावाद। तेहरान के जोर देने के चलते अमरीकी प्रतिनिधि वार्ता में सीधे शामिल नहीं हो सकेंगे, बल्कि यूरोपीय मध्यस्थों के माध्यम से ही संवाद स्थापित करेंगे। यह भी किसी पहेली से कम नहीं है। पांच महीने पहले हुई वार्ता के बाद से ही ईरान बार-बार संकेत दे रहा है कि वह विश्व ताकतों के साथ 2015 में हुए समझौते की बहाली के प्रति गंभीर नहीं है, जिसे संयुक्त विस्तृत कार्य योजना (जेसीपीओए) के नाम से जाना जाता है। जाहिर है जेसीपीओए को पुनर्जीवित करने का अधिकार रखने वाले एकमात्र देश अमरीका के साथ प्रत्यक्ष बात करने से ईरान का इनकार करना वार्ता के इस दौर पर चर्चा का मुख्य विषय बन गया है।

हो सकता है इस्लामिक रिपब्लिक 2018 में समझौते से बाहर निकलने के लिए अमरीका को आंखें दिखाए। अगर इससे संधि बहाली के अवसर कम होते हैं तो तेहरान के लिए 'यह भी ठीक ही है।' दूसरा है सरकार द्वारा वार्ता से पहले अपनाया जाने वाला रुख। वह इस बात पर जोर दे रही है कि अमरीका उस पर से सारे आर्थिक प्रतिबंध हटा ले। इसमें अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के गैर परमाणु उल्लंघन भी शामिल हैं, जो एक तरह से समझौते के नियम मानने के लिए ईरान की पूर्व शर्त है। साथ ही इसकी मांग है कि बाइडन गारंटी दें कि उनके बाद जो भी अगला राष्ट्रपति हो, वह यह समझौता रद्द न करे। इनमें पहली मांग असंगत है और दूसरी असंभव। ऐसे में ईरान के सामने दो विकल्प हैं - पहला, ईरान अमरीका के साथ ऐसी संधि कर सकता है जो सीनेट के नियमों के अनुरूप हो। दूसरा, ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम रद्द कर दे, जो यह केवल अपने पड़ोसियों को डराने के लिए जारी रखना चाहता है। पर लगता नहीं, ईरान सरकार इनमें से किसी विकल्प को चुनेगी।

ईरान ने वार्ता के लिए जेसीपीओए के आलोचक कट्टरपंथी अली बघेरी कानी को चुना है। जाहिर है राष्ट्रपति इब्राहिम रेसी ने 2015 में वार्ता को सफलतापूर्वक अंजाम देने वाले दल को न चुन कर अपनी मंशा जता दी है। दूसरी ओर अमरीका ने ईरान पर अपना प्रतिनिधि चुना है जेसीपीओए के ही मुख्य सदस्य रॉब मैले को। जाहिर सवाल है क्या वाकई ईरान वार्ता की बहाली चाहता है? दरअसल इसका मानना है कि जब तक वार्ता जारी रहेगी बाइडन प्रशासन इस भरोसे में रहेगा कि परमाणु संधि हो सकती है, और वह और प्रतिबंध नहीं लगाएगा। अटकते रहने व लम्बे समय के लिए बार-बार टलने वाली वार्ता की आड़ में इस्लामिक रिपब्लिक अपने यूरेनियम भंडार बढ़ाता रहेगा और जेसीपीओए का उल्लंघन करता रहेगा। जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान की राह पर चलते हुए ईरान परमाणु राष्ट्र बनने के कगार पर है, पर यह क्षेत्रीय स्थिरता व विश्व शांति के लिए खतरा है। इसके लिए वह संयुक्त राष्ट्र निरीक्षकों के साथ आंख मिचौली से भी बाज नहीं आ रहा।

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