बेलगाम नक्सलियों की कमर तोड़ना जरूरी

बीजापुर जिले में नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में 22 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए। दस दिन में यह दूसरा बड़ा नक्सली हमला है।

By: विकास गुप्ता

Updated: 05 Apr 2021, 07:16 AM IST

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में 22 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए। दस दिन में यह दूसरा बड़ा नक्सली हमला है। इससे पहले छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में 23 मार्च को सुरक्षाकर्मियों की बस को बारूदी सुरंग धमाके से उड़ा दिया गया था। इस हमले में पांच सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे। दोनों हमलों का स्पष्ट संकेत है कि नक्सली फिर सिर उठा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में उनका दुस्साहस कायम है। कानून-व्यवस्था को सीधे चुनौती देकर वे इन इलाकों में अपनी ताकत का हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ तीन दशक से नक्सली समस्या से जूझ रहा है। सुकमा जिले में 2010 के नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों के शहीद होने के बाद केंद्र सरकार ने नक्सलियों से निपटने की व्यापक कार्ययोजना तैयार की थी। छत्तीसगढ़ में सुरक्षाकर्मियों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ विकास से अलग-थलग पड़े इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने पर फोकस किया गया। दुर्गम इलाकों को सड़कों से जोडऩे का काम कई साल से चल रहा है। कुछ जगह नक्सलियों ने सड़क निर्माण में बाधा डालने की कोशिश की, तो सुरक्षाकर्मियों पर सड़क निर्माण की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी डाल दी गई। कार्ययोजना का शुरुआती जोश समय के साथ काफूर हो गया। सुकमा जब दंतेवाड़ा जिले का हिस्सा था, तब भी विकास से दूर था। अलग जिला बनने के बाद भी वहां विकास के निशान नजर नहीं आते। कमोबेश यही हालात प्रदेश के बाकी नक्सल प्रभावित इलाकों के हैं। ताजा मुठभेड़ बीजापुर और सुकमा जिले की सीमा पर तरसेम के घने जंगल में हुई। यह भी दुर्गम इलाका है। पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी इलाके में 1967 में जब नक्सली आंदोलन की शुरुआत हुई थी, तब इसे सामाजिक-आर्थिक विषमताओं के खिलाफ आंदोलन कहा गया। समय के साथ आंदोलन की चिंगारियां कई और राज्यों में फैलकर लावा बन गईं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, ओडिशा, मध्य प्रदेश, केरल, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के करीब 90 जिले नक्सल प्रभावित हैं।

विडम्बना है कि नक्सलवाद को लेकर समाज और सियासत में अलग-अलग मत हैं। एक वर्ग इसे आतंकवाद का दूसरा रूप मानकर देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती मानता है, तो दूसरा वर्ग दमन-शोषण के खिलाफ स्वत: स्फूर्त बगावत बताता है। बेशक दमन-शोषण के खिलाफ बगावत एक हथियार हो सकता है, लेकिन जब यह हथियार बेकसूरों पर चलने लगता है, तो तथाकथित बागियों के मंतव्य पर शक होने लगता है। सभ्य समाज में किसी भी तरह की हिंसा मान्य नहीं है। नक्सली हिंसा के जुनून को सख्ती से कुचला जाना चाहिए। सुरक्षाकर्मियों पर हमले करने वालों की कमर तोडऩा जरूरी है। जिन पर देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, उनकी जिंदगी इस तरह के जुनून पर कुर्बान करने के लिए नहीं है।

विकास गुप्ता
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