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आसान नहीं है महाशक्तियों  को कठघरे में खड़ा करना

कुछ दशकों पूर्व कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि किसी राष्ट्र प्रमुख अथवा पूर्व राष्ट्र प्रमुख को अत्याचार करने जैसे अपराधों के लिए अभियोग का सामना करना पड़ सकता है। सर्बिया और लाइबेरिया के पूर्व राष्ट्रपति व यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति को जब पहली वैश्विक व स्थायी अदालत आइसीसी के गठन के साथ ही अंतरराष्ट्रीय अपराधों के आरोपों का सामना करना पड़ा तो यह मिथक टूट गया। इसके बावजूद अब भी यह असंभव-सा ही लगता है कि महाशक्तियों में से कोई भी संदिग्ध युद्ध अपराधी आइसीसी के समक्ष पेश हो

Published: April 20, 2022 08:39:58 pm

जैकलीन मैकएलिस्टर
केन्योन कॉलेज में राजनीति विज्ञान की एसोसिएट प्रोफेसर

एक साथ कई कब्रें, बंधे हुए शव, यहां-वहां बिखरे गोलियों से छलनी शव। ये वायरल फोटो और वीडियो के दृश्य हैं यूक्रेन के बूचा इलाके के। एक तरह से ये तस्वीरें आक्रमण के बाद हथियाए गए इलाकों में रूसी अत्याचार की झलक पेश करती हैं। इस बीच, जो क्षेत्र रूसी नियंत्रण से बाहर हैं, वहां रूसी सेनाओं का आम नागरिकों पर अंधाधुंध गोले बरसाना जारी है। गत शुक्रवार को ही एक भयानक हादसा हुआ, जब एक ट्रेन स्टेशन पर हुए रॉकेट हमले में कई बच्चों सहित 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई। प्रतिक्रिया स्वरूप रूसी अधिकारी और लड़ाकों को आपराधिक तौर पर जवाबदेह ठहराने की मुहिम तेज हो गई है। अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन और उनकी सरकार तो रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को युद्ध अपराधों का दोषी ठहराने व उनके अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत (आइसीसी) के समक्ष पेश होकर सुनवाई का सामना करने की मांग कर रहे हैं। कुछ दशकों पूर्व कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि किसी राष्ट्र प्रमुख अथवा पूर्व राष्ट्र प्रमुख को अत्याचार करने जैसे अपराधों के लिए अभियोग का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन, सर्बिया और लाइबेरिया के पूर्व राष्ट्रपति व यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति को जब पहली वैश्विक व स्थायी अदालत आइसीसी के गठन के साथ ही अंतरराष्ट्रीय अपराधों के आरोपों का सामना करना पड़ा तो यह मिथक टूट गया।
इसके बावजूद अब भी यह असंभव-सा ही लगता है कि महाशक्तियों में से कोई भी संदिग्ध युद्ध अपराधी निकट भविष्य में आइसीसी के समक्ष पेश होगा। पूर्व में राष्ट्र प्रमुखों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अदालत में सुनवाई में मिली सफलता का कारण रहा महाशक्तियों का सहयोग। या यों कहें कि उनका हस्तक्षेप न करना। जहां तक रूस व अमरीका जैसी महाशक्तियों का सवाल है, ये अपने अधिकारियों और लड़ाकों को बचाने की हर संभव कोशिश करते आए हैं और करते रहेंगे। पुतिन के खिलाफ लगे आरोपों से जाहिर है कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने एक लम्बा सफर तय किया है, लेकिन साथ ही यह भी कि अभी काफी आगे जाना बाकी है। न्याय तंत्र महाशक्तियों के हित में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाता आया है। आइसीसी मामलों की सुनवाई तभी करता है, जबकि सदस्य राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय मामलों की सुनवाई अपनी अदालतों में न करना चाहते हों या इसमें अक्षम हों। या फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् जिस मामले को अंतरराष्ट्रीय अदालत को रेफर करे। एक और संदर्भ हो सकता है कि गैर सदस्य देश औपचारिक तौर पर आइसीसी का फैसला स्वीकार करने के लिए तैयार हों।
दूसरा, आइसीसी के पास अपने कोई प्रवर्तन अधिकार नहीं हैं। यानी यह अपनी ओर से कोई व्यवस्था लागू नहीं कर सकती। मामले की जांच के लिए आइसीसी अधिकारियों को राष्ट्रीय अधिकारियों से आमंत्रण की जरूरत होती है। सालों पूर्व यूक्रेन ने नवम्बर 2013 के बाद से अपने क्षेत्र में घटी मानवता विरोधी गतिविधियों और युद्ध अपराधों की जांच के लिए आइसीसी को आमंत्रित किया था। करीब पांच साल लग गए यह तय करने में कि यूक्रेन की घटनाओं की जांच होनी चाहिए। रूस के यूक्रेन पर ताजा हमले के एक सप्ताह बाद ही मौजूदा अभियोजक करीम ए.ए. खान ने जांच करने की घोषणा कर दी थी। हालांकि उन्होंने इसकी प्रक्रिया तब ही शुरू की जब आइसीसी के 39 सदस्य देशों ने अदालत को यूक्रेन के हालात के बारे में बताया। खान ने यूक्रेन में जांच के लिए बार-बार संसाधनों और कार्मिकों की आवश्यकता पर बल दिया है। अमरीका सहित कई राष्ट्रों ने धन, तकनीक, विशेषज्ञता व कार्मिक सहायता देने का आश्वासन दिया है। अब तक यूक्रेन सहित कई देश रूसी अधिकारियों और लड़ाकों के युद्ध अपराधों की जांच की मांग करते आए हैं। जांच के दौरान यह भी हो सकता है कि आइसीसी यूक्रेनी अधिकारियों द्वारा अत्याचार का सप्रमाण खुलासा करे। मानवाधिकार निगरानी समूह रूसी युद्धबंदियों पर अत्याचार के साक्ष्य जुटा चुका है, जिन्हें अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है। खान के शब्दों में 'अगर हम सब मिल कर कानून की पालना कर सकें, तो यह न केवल आइसीसी के हित में होगा, बल्कि समूची अंतरराष्ट्रीय कानून व्यवस्था के हित में होगा। '
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