जीएसटी परीक्षा-कक्ष

जीएसटी की उलटबांसी से राजनेताओं को सीखना चाहिए कि कमजोर होने के बावजूद लोकतंत्र में विपक्ष की अहमियत कम नहीं हो जाती।

 

By: dilip chaturvedi

Published: 21 Dec 2018, 01:11 PM IST

हमारा लोकतंत्र समय-समय पर अपनी खूबियों का अहसास कराता रहा है। इस बार 22 दिसंबर को जीएसटी परिषद की बैठक में भी इसका दीदार हो सकता है। जीएसटी के वर्तमान ढांचे का विरोध करने वाली कांग्रेस की राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में सरकार बनने के कारण इस बैठक में परिषद का स्वरूप बदला हुआ होगा। इसका असर परिषद के निर्णयों में हो सकता है। यहां किसी प्रस्ताव को पारित कराने के लिए 75 फीसदी मतों की जरूरत होती है। परिषद में केंद्र के अतिरिक्त 29 राज्यों, दिल्ली और पुडुचेरी के प्रतिनिधि शामिल हैं। केंद्र के वोट का वजन 33.3 फीसदी माना जाता है। प्रस्ताव पर निर्णय के लिए केंद्र के अतिरिक्त 20 राज्यों का समर्थन जरूरी है क्योंकि, एक राज्य के वोट का वजन करीब 2. 15 फीसदी है। विस चुनावों से पहले तक परिषद की बैठकों में प्रस्तावों को पारित कराने के लिए केंद्र को भाजपा शासित 16 राज्यों के अतिरिक्त सहयोगी दलों के शासन वाले चार राज्यों की जरूरत होती थी। इसका मतलब हुआ कि परिषद की अगली बैठक में किसी प्रस्ताव को पारित कराने के लिए जादुई अंक 20 के मुकाबले एनडीए सरकार के पास सिर्फ 17 ही होंगे। ऐसे में परिषद को कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों द्वारा शासित तीन राज्यों का समर्थन हासिल करना होगा। अब छह राज्यों में कांग्रेस की सरकार है और सातवां राज्य तमिलनाडु पहले ही जीएसटी ढांचे पर विरोध जता चुका है। आठवें राज्य जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन है। इसका अर्थ हुआ कि गैर भाजपा शासित 12 राज्य एकजुट हो जाएं तो प्रस्ताव गिरा सकते हैं।
आमतौर पर जीएसटी परिषद की बैठकों में सर्वसम्मति से फैसले होते हैं। विरोधियों के अल्पमत में होने के कारण भी ऐसा होता रहा है। लेकिन, आगामी बैठक में स्थिति बदल सकती है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ तो पहले ही वर्तमान जीएसटी ढांचे के खिलाफ अभियान की बात कह चुके हैं। राहुल गांधी ने भी कई बार कहा है कि सरकार में आने पर जीएसटी के वर्तमान ढांचे में बदलाव करेंगे। ऐसे में मोदी सरकार के लिए जीएसटी से जुड़े मनमाने फैसले करना अब आसान नहीं। संविधान के संघीय स्वरूप को खत्म करने के आरोप झेल रही मोदी सरकार जीएसटी को सहकारी संघवाद के नमूने के तौर पर पेश करती रही है। अब देखना होगा कि यह 'सहकारी संघवाद' के अपने विचार पर वह कितना खरा उतरती है। परिषद की आगामी बैठक पक्ष व विपक्ष दोनों के लिए परीक्षा की घड़ी होगी। दोनों पक्ष चाहें तो इसे अवसर में बदल सकते हैं। विपक्ष राजनीतिक लाभ लेने की मंशा से इतर गुण-दोष के आधार पर प्रस्तावों पर विचार कर सकता है तो सत्ता पक्ष भी राज्यों की इच्छाओं का मान रखते हुए मनमानी करने की अपनी छवि सुधार सकता है।
पीएम मोदी का यह कहना कि 99 फीसदी वस्तुओं को 18 फीसदी जीएसटी या उससे नीचे के स्लैब में लाया जाएगा, इस बात का संकेत है कि उन्हें हकीकत का अहसास हो चुका है। परिषद के बदले स्वरूप का ही नहीं, जीएसटी के विपरीत प्रभावों का भी। नोटबंदी व जीएसटी मोदी सरकार के ऐसे फैसले रहे हैं, जिनसे आम लोगों व छोटे कारोबारियों को काफी परेशानी हुई है। नोटबंदी के कथित अच्छे प्रभाव की हवा निकल जाने के बाद, जीएसटी से होने वाली परेशानियों से छुटकारा दिलाने में नाकामी, भाजपा सरकार के लिए चुनावी गणित बिगाडऩे वाला हो सकता है। जीएसटी लागू होने के बाद से ही लगातार इसमें संशोधन हो रहे हैं। इससे यह साफ है कि मोदी सरकार ने दुष्प्रभावों को नजरअंदाज करते हुए जीएसटी लागू करने में न सिर्फ हड़बड़ी दिखाई है बल्कि, विपक्ष की आपत्तियों को हवा में उड़ाने की नादानी भी की है। इसी का नतीजा है कि राहुल गांधी को अब ऐसा कहने का मौका मिल रहा है कि मोदी कांग्रेस के 'ग्रांड स्टुपिड थॉट' ( कभी कांग्रेस का मजाक उड़ाते हुए मोदी ने कहा था) को ही लागू कर रहे हैं। जीएसटी की उलटबांसी से राजनेताओं को सीखना चाहिए कि कमजोर होने के बावजूद लोकतंत्र में विपक्ष की अहमियत कम नहीं हो जाती।

GST
Show More
dilip chaturvedi Desk
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned