आवश्यक है किसी एक पैथी पर निर्भरता खत्म करना

चिकित्सा: होम्योपैथी और अन्य आयुष पद्धतियों पर भी ध्यान दिया जाए

By: Patrika Desk

Published: 15 Sep 2021, 02:00 PM IST

- डॉ. ए.के. अरुण, जन स्वास्थ्य वैज्ञानिक एवं राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त

कोरोना संक्रमण ने न केवल सामान्य व गम्भीर रोगों के नियमित उपचार को बाधित किया, बल्कि पूरे चिकित्सा तंत्र को ही नाकारा सिद्ध कर दिया। ऐसे में अपने पारंपरिक हुनर के साथ होम्योपैथ एवं अन्य आयुष पद्धति के चिकित्सकों ने लोगों की जान बचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बावजूद इस वर्ग की न तो सरकार ने पीठ थपथपाई और न ही कहीं खास चर्चा ही हुई। गौरतलब है कि कोरोना वायरस संक्रमण के मामले जब देश में गंभीर रूप से फैलने लगे (अप्रेल 2020) तब से ही एलोपैथिक दवा लॉबी ने इस महामारी के उपचार पर अपना एकाधिकार जमाना शुरू कर दिया था। अप्रेल, मई 2020 में जब होम्योपैथिक उपचार के लिए सरकार से अनुमति मांगी जा रही थी, तब विश्व स्वास्थ्य संगठन, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान संस्थान (आइसीएमआर) व अन्य संस्थाओं का होम्योपैथी एवं अन्य आयुष चिकित्सा पद्धतियों के प्रति नकारात्मक एवं अपेक्षापूर्ण रवैया था।

केंद्रीय होम्योपैथिक अनुसंधान परिषद (सीसीआरएच) भी ज्यादा खुलकर मदद नहीं कर पा रही थी। देश में महामारी अधिनियम 1897 तथा आपदा प्रबंधन कानून 2005 लागू था, जिसके तहत बिना अनुमति होम्योपैथी और अन्य आयुष चिकित्सकों द्वारा कोरोना संक्रमित मरीजों को देखना मुश्किल था। किसी तरह जब एलोपैथिक उपचार व संदिग्ध दवाओं के महंगे प्रयोग के बावजूद जब कोरोना से मौतों का सिलसिला थमता नजर नहीं आया, तब केंद्र्र सरकार ने होम्योपैथी तथा आयुष चिकित्सकों को उपचार की अनुमति दी। होम्योपैथी चिकित्सकों ने होम आइसोलेशन के गंभीर रोगियों को देखना शुरू किया और इसके आशा से ज्यादा बेहतर परिणाम पाए। यह वाकई रोमांचकारी अनुभव था।

कोरोनाकाल में यह बात महसूस की गई कि अब आगे आने वाला समय और भी जटिल रोगों, नए वायरसों और गंभीर महामारियों का है। यह भी लोगों ने देखा और महसूस किया कि करोड़ों रुपए खर्च कर निजी अस्पतालों और महंगे चिकित्सकों की सेवाओं के बावजूद केवल एलोपैथी के बलबूते महामारियों पर नियंत्रण सम्भव नहीं है। आम लोगों ने यह भी महसूस किया कि सरकारी अस्पतालों में बेहतर सुविधाओं और मुफ्त इलाज के दावे के बावजूद महामारी एवं रोगों के संक्रमण की स्थिति में जान बचाना संभव नहीं है। कुल मिलाकर यदि हम देखें, तो न तो निजी अस्पताल और न ही सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था लोगों के संक्रमण को कम कर पा रहे थे। एलोपैथी की दवाओं पर भी सवाल उठे। देश ने इस दौरान हजारों बेहतरीन प्रतिभाओं को खोया। इसके बावजूद एलोपैथी को लेकर सवाल नहीं उठाए गए। बेहतर काम के बावजूद कई कारणों से होम्योपैथी एवं अन्य आयुष पद्धतियां सरकार व योजनाकारों की नजर में अपेक्षित प्रतिष्ठा नहीं पा सकीं। यह प्रवृत्ति देश में आम लोगों के स्वास्थ्य की गारंटी को सुनिश्चित नहीं कर सकती।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि विगत 250 वर्षों से भी ज्यादा समय से होम्योपैथी भारत ही नहीं दुनिया भर में महामारी और जटिल बीमारियों के इलाज में केवल अपने ही दम-खम पर टिक कर काम कर रही है। महज दवाओं की सूक्ष्मतम खुराक के इस्तेमाल से गंभीर से गंभीर रोगों का सफल इलाज करने वाली चिकित्सा पद्धति यदि उपेक्षित है, तो यह देश की जनता का उपहास है। यदि वास्तव में सरकार देश के प्रत्येक नागरिक को सेहत की सौगात देना चाहती है, उनको निरोगी रखना चाहती है, तो होम्योपैथी व अन्य आयुष पद्धतियों को सम्मान देना ही होगा। समय की यही मांग है कि सरकार और योजनाकार सच्चाई को स्वीकार करें।

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