उपेक्षित राजधानी

राज्य सरकार ने मानो जयपुर की ओर से आंखें मूंद ली हैं। पूरे चिकित्सा विभाग का ध्यान जोधपुर पर केन्द्रित है। अफसोस की बात यह है कि दस विधायक और एक सांसद होते हुए भी शहर की जनता अनाथों की तरह उपेक्षित पड़ी है।

By: भुवनेश जैन

Published: 17 Sep 2020, 08:44 AM IST

- भुवनेश जैन

कोरोना ने राजस्थान की राजधानी जयपुर में हाहाकार मचा रखा है। घरों में दस्तक देती हुई मौत के खौफ से शहरवासी सहमे हुए हैं। चिंता की लकीरें गहराती जा रही हैं। शहर का कोई ऐसा कोना, कोई गली नहीं बची, जहां कोरोना के दैत्य का साया नजर नहीं आ रहा हो। लेकिन राज्य सरकार ने मानो जयपुर की ओर से आंखें मूंद ली हैं। पूरे चिकित्सा विभाग का ध्यान जोधपुर पर केन्द्रित है। अफसोस की बात यह है कि दस विधायक और एक सांसद होते हुए भी शहर की जनता अनाथों की तरह उपेक्षित पड़ी है। सांसद और विधायक पता नहीं कौन सी राजनीति में इतने "व्यस्त" हैं कि अपने वोटरों को भगवान और निकम्मे चिकित्सा विभाग के भरोसे छोड़ कर सत्तासुख भोगने में तल्लीन हैं। जयपुर में मौतों की संख्या तीन सौ से ऊपर पहुंच चुकी है। यह तो वह आंकडा है जो चिकित्सा विभाग रेकार्ड में दर्ज कर रहा है। श्मशानों के चक्कर लगाओ तो पता चल जाएगा कि मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय कैसे आंकडों की बाजीगरी करने में जुटा हुआ है। सारे प्रोटोकोल खिलवाड़ बन गए हैं।

जयपुर के साथ कैसा व्यवहार हो रहा है इसका अनुमान इस से लगाया जा सकता है कि 30 लाख की आबादी वाले इस शहर में अभी तक मात्र 3 लाख 20 हजार कोरोना टेस्ट हुए हैं (आबादी के 10.3 प्रतिशत)। इन टेस्टों के नतीजे भी भरोसेमंद नहीं बताए जा रहे। स्वयं मुख्य न्यायाधीश तक इस बारे में संकेत कर चुके हैं। दूसरी ओर करीब दस लाख की आबादी वाले जोधपुर में 3 लाख 50 हजार टेस्ट (35 प्रतिशत) हो चुके हैं। रिकवरी की दर जयपुर में मात्र 62 प्रतिशत है, जो जयपुर सहित देश के शीर्ष दस शहरों में सबसे कम है। राजस्थान की औसत रिकवरी दर 83 है और जोधपुर में यह दर 85 प्रतिशत है। जयपुर में न निजी अस्पतालों की मनमानी पर नियत्रंण है और न अन्य विभागों के साथ तालमेल है। पुलिस, जिला प्रशासन, नगर निगम- सभी विभाग सुस्ती में आ गए हैं। पहले बिना मास्क वाले लोगों के चालान करते पुलिसकर्मी नजर आ जाते थे, अब वे पुन: चौराहों पर "पुराने काम" में व्यस्त हो गए हैं। जोधपुर में अच्छे कार्य के लिए सरकार को बधाई। पर ऐसा ही काम पूरे राजस्थान में क्यों नहीं हो रहा। नगर-निगम के सेनेटाइज करने वाले वाहन पहले कई मौहल्लों में दिख जाते थे। अब केवल वी.आई.पी. कॉलोनियों में ही दिखते हैं। अलबत्ता कचरे के ढेर जरूर पूरे शहर में बढ़ते जा रहे हैं। जिला प्रशासन को कोई चिंता ही नहीं है कि इस जिले में कोरोना दिनों-दिन बेकाबू क्यों हो रहा हैं। विभागों के बीच कोई तालमेल नजर नहीं आता। खाली होने के बावजूद वेन्टीलेटरों की ब्लैक हो रही है। आलीशान आइसोलेशन वार्ड बना कर ताले लगा दिए गए हैं। चिकित्सा विभाग की सारी ऊर्जा मास्क, सेनेटाइजर, बेड व अन्य उपकरणों की खरीद-फरोख्त और "हिसाब-किताब" में लगी हुई है।

जयपुर की जनता अपने जनप्रतिनिधियों के व्यवहार को देखकर हतप्रभ है। कांगे्रस के विधायकों में से दो मंत्री और एक मुख्य सचेतक हैं। वे बेचारे न जाने किस काम के बोझ में इतने दबे हैं कि अपनी जनता का दुख जानने की फुर्सत ही नहीं है। भाजपा के प्रतिनिधि भी घरों में दुबके हुए हैं। एक पर पूरे राज्य की जिम्मेदारी हैं। दो पूर्व मंत्री बड़ी-बड़ी जिम्मेदारी निभा चुके हैं, अब क्या शहर की गलियों में घूमेंगे!

जो चिकित्सा विभाग मुख्यमंत्री आवास तक को कोरोना के कहर से नहीं बचा पाया, जहां 40 से ज्यादा कोरोना संक्रमण के मामले निकले, उस विभाग में ऊपर से नीचे तक जरूर सब लोग आंखों पर पट्टी बांध कर काम कर रहे होंगे- जयपुर के नागरिकों को यह पक्का भरोसा हो चला है।

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भुवनेश जैन
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