आशंका और उम्मीद

आशंका और उम्मीद
jammu kashmir

Dilip Chaturvedi | Updated: 25 Feb 2019, 07:26:12 PM (IST) विचार

कश्मीर को लेकर पूरा देश चिंतित है। आशंका चारों ओर व्याप्त है। अब कार्रवाई हो तो ठोस हो। इसके सकारात्मक परिणाम दिखें।

जम्मू-कश्मीर में हालात जिस तरह बिगड़ रहे हैं, उसके बाद सरकार का सख्त फैसले लेना लाजिमी ही था। केंद्र ने घाटी में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की 45, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की 35 और एसएसबी व आइटीबीपी की 10-10 अतिरिक्त कंपनियों को भेजा है। 1990 के बाद यह पहला मौका है जबकि घाटी की सुरक्षा व्यवस्था में बीएसएफ को तैनात किया जा रहा है। हालांकि सीमावर्ती क्षेत्रों में सीमा सुरक्षा बल पहले की तरह पूरी चौकसी बरत रहा है। १४ फरवरी को पुलवामा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के काफिले पर हुए आत्मघाती हमले के बाद कश्मीर में हालात तनावपूर्ण हुए हैं। घाटी में ही नहीं, पड़ोसी पाकिस्तान के साथ भी तनाव बढ़ा है। यह बात जगजाहिर है कि घाटी में आतंकवाद को बढ़ावा देने और यहां के युवाओं को उकसाने का काम सीमापार से ही हो रहा है। पुलवामा घटना की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली थी। इसका केंद्र और सरगना अजहर मसूद भी पाकिस्तान में ही है। हमले के बाद पूरे भारत में आक्रोश है। सरकार पर भी सुरक्षा बलों का मनोबल बनाए रखने के लिए ठोस कार्रवाई का दबाव बना हुआ है। कुछ कदम उठाए भी गए हैं।

अमरीका, फ्रांस, इजरायल समेत तमाम देश चाहते हैं कि आतंक का खात्मा होना चाहिए। इसके लिए उन्होंने पाकिस्तान को न सिर्फ चेताया है बल्कि उसकी सहायता में भी कटौती की है। लेकिन चीन की सहानुभूति पाकिस्तान और मसूद के प्रति बनी हुई है। यही कारण है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान पुलवामा पर भारत से सबूत मांगने की जुर्रत कर रहे हैं। हालांकि फौरी कार्रवाई के तहत उन्होंने मसूद से जुड़े दो संगठनों पर प्रतिबंध के अलावा बहावलपुर में जैश मुख्यालय पर कब्जा कर लिया है। लेकिन क्या इन कार्रवाइयों से मसूद जैसों पर असर पड़ेगा? वह लगातार अपने भाषणों पर अभी तक भारत के खिलाफ जहर उगल रहा है। लेकिन सबसे ज्यादा आश्चर्य तो तब होता है जबकि घाटी के राजनीतिक दल ही आतंकवादियों या उग्रवादियों की ढाल बन जाते हैं। आतंकवादियों के खिलाफ सुरक्षा बलों की मदद के बजाय पत्थरबाजों को उकसाते हैं। यही वजह है कि घाटी में सुरक्षा बलों को उतनी सफलता नहीं मिल पा रही। हमारे जवान लगातार शहीद भी हो रहे हैं। रविवार को ही कुलगाम में एक डीएसपी समेत दो जवान शहीद हो गए तथा एक मेजर घायल हो गए, जबकि तीन आतंकी मारे गए। मोदी सरकार ने वहां सुरक्षा बलों को ज्यादा संख्या में भेजने का फैसला तो किया है लेकिन सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय सीमा को अभेद्य बनाना जरूरी है। क्योंकि स्थानीय आतंकियों को प्रशिक्षण देने वाले वहीं से घुसपैठ करते हैं। सीमा सील हो जाएगी तो घाटी में बचे आतंकियों का सफाया करने में मुश्किल नहीं आएगी। प्रधानमंत्री ने हाल ही कहा, हमारी लड़ाई कश्मीर के लिए है, कश्मीरियों के खिलाफ नहीं। तो यह दिखना भी चाहिए। कश्मीरी भी महफूज रहें और कश्मीर भी हमारा रहे। कश्मीर को लेकर पूरा देश चिंतित है। आशंका चारों ओर व्याप्त है। अब कार्रवाई हो तो ठोस हो। इसके सकारात्मक परिणाम दिखें। आम चुनाव सिर पर हैं। कथनी और करनी में सत्ता मोह नहीं, देश हित दिखे। भारत का हर नागरिक यही चाहता है।

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