आतंकवाद से दूरी बनाने लगे कश्मीरी युवा

आतंकवाद से दूरी बनाने लगे कश्मीरी युवा

Bhuwanesh Jain | Updated: 31 Jul 2019, 09:08:09 AM (IST) विचार

कश्मीर घाटी - रूख बदलती बयार
आतंककारियों की छोटी जिंदगी देखकर युवकों का इन गतिविधियों से मोहभंग हो रहा है। बहुत से युवक खुलकर बोलते हैं कि वे शांति और समृद्धि चाहते हैं। इसी के चलते मुख्यधारा में शामिल होने वाले युवाओं की सफलता के किस्से जुबां पर छा रहे हैं।

पुलवामा की आत्मघाती हमले की घटना को अपवाद मान लें तो जम्मू-कश्मीर के हालात में पिछले डेढ़ वर्षों में उल्लेखनीय बदलाव आया है। पाकिस्तान की तरफ से घुसपैठ लगभग बंद हो गई है। आतंकवाद की राह पर जाने वाले कश्मीरी युवकों की संख्या में कमी आ गई। अल-कायदा जैसा आतंककारी ग्रुप तो 2005 के बाद कश्मीर से कोई नई भर्ती नहीं कर पाया है। अब आतंककारियों को राज्य में जनता का पहले जैसा समर्थन नहीं मिल रहा।

कश्मीर यात्रा के दौरान हमें अनेक सैन्य व नागरिक अधिकारियों से बातचीत करके उनके नजरिये से राज्य के हालात को परखने का मौका भी मिला। इन अधिकारियों ने बताया कि आज आप दक्षिण कश्मीर के पुलवामा और शोपियां जैसे इलाकों में जा सकते हैं। आज से दो वर्ष पहले यह संभव नहीं था। पहली बार ऐसा हुआ कि गृहमंत्री अमित शाह आए और कहीं विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ। अमरनाथ यात्रा में तीन लाख से ज्यादा यात्री आए, पर कहीं कोई बड़ी घटना नहीं हुई। पहले हर सप्ताह सुरक्षा बलों को पत्थरबाजों से निपटने की चुनौती रहती थी, पिछले काफी समय से पत्थरबाजी बंद हो चुकी है।

जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक उच्चाधिकारी दावा करते हैं कि सुरक्षा बलों पर जनता का भरोसा बढऩे लगा है। खासतौर से पंचायतों के चुनाव के बाद हालात तेजी से बदले हैं। गत वर्ष नवम्बर-दिसम्बर में हुए इन चुनावों में 70 प्रतिशत से ज्यादा मतदाताओं ने वोट डाले। उनके अनुसार गांव वालों ने अब आतंककारियों को खाना देना बंद कर दिया है। एक मोटे अनुमान के अनुसार अब घाटी में ज्यादा से ज्यादा दो-ढाई सौ आतंककारी हैं। आतंककारियों की छोटी जिंदगी देखकर युवकों का इन गतिविधियों से मोहभंग हो रहा है। बहुत से युवक खुलकर बोलते हैं कि हम शांति से रहना चाहते हैं और समृद्धि की ओर बढऩा चाहते हैं। इसी के चलते मुख्यधारा में शामिल होने वाले युवाओं की सफलता के किस्से भी तेजी से प्रसारित हो रहे हैं। चाहे वे प्रशासनिक परीक्षाओं में सफलता के झंडे गाडऩे वाले युवा हों या खेलों में नाम कमाने वाले खिलाड़ी, उनको सोशल मीडिया पर फॉलो करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है।

बेरोजगारी और मनोरंजन के साधनों की कमी भी घाटी के युवकों को आतंकवाद की ओर धकेलने के कारण बने हैं। सुबह से लेकर रात तक बिना काम घूमने वाले युवा, आतंकवादी समूहों के हत्थे आसानी से चढ़ जाते थे। पत्थर फेंकने जैसे काम के लिए उन्हें 200-400 रुपए मिल जाते थे। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए राज्यपाल शासन के दौरान यहां यूथ एंगेजमेंट कार्यक्रम शुरू किए गए। अब राज्य के करीब 4 लाख छात्र व युवा इस कार्यक्रम के अन्तर्गत खेल, सांस्कृतिक आदि गतिविधियों में हिस्सा ले रहे हैं।

सेना की ओर से काफी समय से गुडविल स्कूल चल रहे हैं। अपना काम करने के इच्छुक युवाओं को प्रोत्साहन देने की ओर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसके लिए प्रक्रियाओं का समयबद्ध निष्पादन करने के नियम लागू किए गए। इसका सीधा और तुरंत असर यह हुआ है कि पत्थरबाजी तो कम हुई ही, साथ ही युवाओं में नशीली दवाओं की लत के मामले भी कम होने लगे हैं। कश्मीरी छात्र शिक्षा और रोजगार के लिए अब देश के दूसरे भागों में जाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाने लगे हैं।

जम्मू-कश्मीर में पिछले 70 सालों में पनपा भ्रष्टाचार भी आम कश्मीरी की तंगहाली का प्रमुख कारण रहा। राजनीति में प्रभावशाली चंद परिवारों ने अलगाववाद के एजेंडे को खुल कर हवा दी है, ताकि जनता और केन्द्र सरकार उसमें उलझी रहे और उनको खुलकर धन बटोरने का मौका मिलता रहे। जब भी राज्य में शांति की हवा चलती है, ये परिवार और अलगाववादी जनता की संवेदनाओं को भड़का देते हैं। संभवत: इसीलिए केन्द्र सरकार अब ऐसे नेताओं की असलियत उजागर कर जनता तक सीधे पहुंचने के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है।

सेना और पुलिस में अनोखा तालमेल
पिछले डेढ़ साल में सेना, पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के बीच जिस तारतम्य के साथ काम हो रहा है, वैसा जम्मू और कश्मीर में पहली बार अनुभव किया जा रहा है। इससे सूचनाओं के आदान-प्रदान और संयुक्त अभियानों में बढ़ोतरी हुई है। एक बड़ा परिवर्तन यह देखने को मिला है कि मुठभेड़ में मारे जाने वाले आतंककारियों के जनाजों में शामिल होने वाले लोगों की संख्या हजारों से घट कर दो-तीन सौ तक सिमट गई है।

घटने लगी है 'उग्रवादियों की उम्र!
आतंकी गुटों में कुछ वर्ष पहले पढ़े-लिखे युवक बड़ी संख्या में भर्ती होते थे। सोशल मीडिया से उन्हें बरगलाया जाता था, और अब इसी के कारण आतंकवाद से उनका मोहभंग हो रहा है। अब खबर फैलने में देर नहीं लगती कि हथियार उठाने के बाद जीवन कितना छोटा (कुछ दिन से कुछ माह) रह जाता है। कुछ समय पूर्व तक उग्रवाद की राह पर बढ़े युवकों की उम्र 7 से 12 साल में पूरी होती थी, अब यह कुछ सप्ताह में सिमट गई है।

1. एक मोटे अनुमान के अनुसार अब घाटी में ज्यादा से ज्यादा दो-ढाई सौ आतंककारी हैं।
2. अपना काम करने के इच्छुक युवाओं को प्रोत्साहन देने पर ध्यान दिया जा रहा है।
3. पत्थरबाजी कम हुई है, नशीली दवाओं की लत के मामले भी कम होने लगे हैं।
4. शिक्षा व रोजगार के लिए देश के दूसरे हिस्सों का रुख करने में दिलचस्पी ले रहे हैं युवा।

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