टीकाकरण को रखें सियासत से दूर

राजनीतिक दलों व उनके नेताओं के इन जुबानी तीरों की भाषा भी जब सत्ता में होते हैं तब अलग होती है, और विपक्ष में रहते हुए अलग। आपदा के वक्त राजनीतिक दलों से यह उम्मीद की जाती है वे आपसी मतभेद छोड़कर देश हित के लिए काम करेंगे।

By: विकास गुप्ता

Published: 21 Apr 2021, 07:21 AM IST

देश पर किसी भी किस्म की आपदा के वक्त राजनीतिक दलों से यह उम्मीद की जाती है वे आपसी मतभेद छोड़कर देश हित के लिए काम करेंगे। कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर जनआपदा के रूप में जिस तरह से उभर रही है उसमें तो यह उम्मीद और भी ज्यादा जरूरी हो जाती है। इससे इतर सियासतदानों के जुबानी हमले सब जगह हो रहे हैं। केन्द्र सरकार पर भी और राज्य सरकारों पर भी। ये हमले एक जैसे मसलों पर हैं। कहीं कोरोना संक्रमितों के उपचार को लेकर, कहीं संक्रमण रोकने के लिए सरकारी स्तर पर किए जा रहे प्रयासों को लेकर, तो कहीं टीकाकरण को लेकर।

राजनीतिक दलों व उनके नेताओं के इन जुबानी तीरों की भाषा भी जब सत्ता में होते हैं तब अलग होती है, और विपक्ष में रहते हुए अलग। इस भयावह दौर में राजनीतिक दल एक सुर में कहीं दिखे, तो सिर्फ चुनाव कराने को लेकर व रैलियों के आयोजनों को लेकर। इन सबके बीच पिसती रही सिर्फ जनता, जो चुनावों से लेकर कुंभ तक के आयोजनों की सियासी मंजूरी के नतीजों को अब भुगत रही है। कोरोना संक्रमण के भयावह दौर के बीच यह राहत की खबर जरूर है कि सरकार ने वैक्सीन अब 18 वर्ष से अधिक उम्र के सभी लोगों को लगाना तय किया है। साथ ही कंपनियों को राज्यों और खुले बाजार को वैक्सीन आपूर्ति की छूट भी दी गई है। टीकाकरण का यह तीसरा चरण होगा। लेकिन पहले दो चरणों पर नजर डालें तो 45 से अधिक आयु वर्ग के लोगों को टीका लगाने का कार्यक्रम भी आधा-अधूरा रहा है। वैक्सीन कम होना इसकी एक वजह हो सकती है, लेकिन बड़ी वजह यह है कि टीकाकरण को लेकर लोगों में भ्रांंति व डर को खत्म करने का प्रयास मजबूती से नहीं हुआ। इस बीच केन्द्र-राज्यों में खींचतान भी कम नहीं रही। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के सरकार को दिए सुझावों तक पर सियासत।

होना तो यह चाहिए कि सरकारें, चाहे केन्द्र की हो या राज्यों की, संकट की घड़ी में प्रतिपक्ष को विश्वास में लेकर काम करें। अनुभव तो यही कहता है कि दिखावे के लिए भले ही विपक्ष से संवाद की बात की जाती हो लेकिन सरकारें करती वही हैं जो उन्हें करना होता है। टीकाकरण को विकेन्द्रीकृत करने की व्यवस्था पहले भी की जा सकती थी। ऐसा होता तो शायद राज्यों को शिकायत का मौका नहीं मिलता। सिर्फ केन्द्र व राज्य सरकार के बीच ही समन्वय की बात नहीं, बल्कि दोनों जगह पक्ष-विपक्ष के नेताओं को संकट की इस घड़ी में एकजुट दिखानी चाहिए। जनता से भी भयमुक्त होकर टीका लगवाने की अपील करें। सियासत करने के लिए तो और भी मौके आएंगे।

विकास गुप्ता
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned