वक्त के हिसाब से बदले भाषा आंदोलन

Sunil Sharma

Publish: Dec, 08 2017 09:37:07 (IST)

Opinion
वक्त के हिसाब से बदले भाषा आंदोलन

यह कहना गलत होगा कि भारतीय भाषाएं अंग्रेजी के सामने पस्त हो गईं हैं। मीडिया में आज भी भारतीय भाषाओं का बोलबाला है।

- योगेन्द्र यादव, टिप्पणीकार

पिछले 50 साल में बदलाव मातृभाषा में नहीं, भाषायी सत्ता के समीकरण में आया है। संख्या बल में आज भी भारतीय भाषा ही है, लेकिन सत्ता बल अंग्रेजी के पास है। यह कहना गलत होगा कि भारतीय भाषाएं अंग्रेजी के सामने पस्त हो गईं हैं। मीडिया में आज भी भारतीय भाषाओं का बोलबाला है।

भाषा आंदोलन की पचासवीं वर्षगांठ किसी टूटे हुए मील के पत्थर की तरह चुपचाप से निकल गई। किसी ने सुध नहीं ली, किसी को याद भी नहीं रहा। वर्ष 1967 में 29 नवम्बर के दिन बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र संघ ने भाषा से सवाल पर बंद घोषित किया था। नेतृत्व लोहिया के शागिर्द समाजवादी देबब्रत मजूमदार कर रहे थे। उग्र युवाओं पर पुलिस ने गोली चलाई थी, दो विद्यार्थी घायल हुए थे। उसके बाद दिल्ली में संसद का घेराव हुआ था।

भाषा आंदोलन के कई सिपाही महीनों तक जेल में रहे। उनमे से कई आज राष्ट्रीय नेता भी हैं। आंदोलनकारियों को सत्ता मिल गयी, आंदोलन की मांग जस की तस रही। भाषा का सवाल हमारे सार्वजनिक जीवन में कभी कभार ही उठता है, जैसे संयुक्त परिवार में जमीन के बंटवारे का सवाल। कचोटता रोज है लेकिन चुप्पी जल्दी से टूटती नही है, जब टूटती है तो अक्सर झगड़े की शक्ल लेती है। कभी कन्नड़ के आग्रही बैंगलूरू में हिंदी के नामपट्ट पर झगड़ा करते हैं तो कभी तमिलनाडु की पार्टियां केंद्र सरकार के किसी फरमान का विरोध करती है। भारतीय भाषाएं एक-दूसरे से उलझती रहती हैं।

ऊपर के तल्ले पर बैठी अंग्रेजी वाली आंटी मंद-मंद मुस्कुराहट फेंकती रहती है। देहात या कस्बे से आने वाले युवक-युवतियां अंग्रेजी से जूझते रहते हैं। ठीक से अंग्रेजी न बोल पाने के हीन बोध में दबे रहते हैं। टूटी फूटी अंग्रेजी सीखाने वाले नीम हकीमों का बाजार गर्म है। सत्ता की अघोषित राजभाषा अंग्रेजी पांव पसारती जा रही है, बाकी सब भाषाएं सिकुड़ती जा रही है। ऐसे में भाषा आंदोलन को याद करें, तो क्यों? क्या आज भाषा के सवाल की कोई प्रासंगिकता बची है? अगर हां, तो हमारे समय का भाषा आंदोलन कैसा होगा?

पिछले पचास साल में देश की जनसंख्या के भाषाई संतुलन में कोई खास बदलाव नही हुआ है। हिंदी न तब बहुमत की भाषा थी, न आज है। हिंदी को मातृभाषा कहने वाले तब कोई 35 फीसदी थे, अब तक 43 प्रतिशत के करीब हो गए होंगें। हां, अगर मातृभाषा के अलावा इसे समझ बोल सकने वालों की संख्या जोड़ दी तो अब तक 57 प्रतिशत के करीब हो गया होगा। यह अनुमान इसलिए लगाना पड़ रहा है कि अब भी 2001 की जनगणना के भाषाई आंकड़े सार्वजनिक नही किए गए। उसके बाद बंगाली, तमिल, तेलुगू और मराठी हैं जो 6 से आठ प्रतिशत भारतीयों की भाषा है।

मातृभाषा की संख्या में अंग्रेजी कहीं नहीं टिकती है। अगर अंग्रेजी समझने बोलने का दावा करने वाले सब लोगों की संख्या जोड़ दी जाए तो भी आंकड़ा अब कोई 16 प्रतिशत हो गया होगा। पिछले 50 साल में बदलाव मातृभाषा में नहीं, भाषायी सत्ता के समीकरण में आया है। संख्या बल में आज भी भारतीय भाषा ही है, लेकिन सत्ता बल अंग्रेजी के पास है। यह कहना गलत होगा कि भारतीय भाषाएं अंग्रेजी के सामने पस्त हो गईं हैं। मीडिया में आज भी भारतीय भाषाओं का बोलबाला है। अंग्रेजी की न्यूज चैनल का सबसे लोकप्रिय प्रोग्राम 25-30 लाख लोग देखते है जबकि हिन्दी के लोकप्रिय समाचार प्रोग्राम को 4-5 करोड़ लोग देखते हैं।

आज भी देश की सबसे सुंदर साहित्यिक रचनाएं भारतीय भाषाओं में हो रही है। लेकिन अंग्रेजी चैनल के विज्ञापन ज्यादा महंगे होते है, अंग्रेजी न्यूज चैनल एजेंडा तय करते हैं। लेकिन इंटरव्यू अंग्रेजी के लेखकों के छपते हैं, लिटफेस्ट में अंग्रेजी की भरमार है। दो कौड़ी का साहित्य लिखने वाले अंग्रेजी के लेखक दुनिया भर के सवालों पर अपना ज्ञान बखारते रहते हैं। फिल्में आज भी हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में बन रही है। लेकिन समाजशास्त्र, नीति निर्धारण और विज्ञान की भाषा अंग्रेजी है। यानी कि 21वीं सदी में भारतीय भाषाएं खत्म नही होंगी, लेकिन देश समाज की दिशा निर्धारण में उनकी भूमिका घटती जाएगी।

राजनीतिक सत्ता में कौन रहता है इससे इसका कोई वास्ता नही है। कंग्रेस के राज ने भारतीय भाषाओं को धता बताया तो राष्ट्रीयता, संस्कृति और परंपरा की दुहाई देने वाली भाजपा ने भी भारतीय भाषाओं के लिए कुछ भी नहीं किया। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे हिंदी प्रेमी और कवि के प्रधानमंत्री होते हुए भी हिंदी की स्थिति में एक सूत भी सुधार नहीं हुआ। ऐसे में भाषा आंदोलन की बरसी मनाने से सिर्फ मातम पुरसी के अलावा और क्या हासिल कर सकते हैं?

अगर 21वीं सदी में भाषा के आंदोलन को सार्थक बने रहना है तो उसे वक्त के हिसाब से बदलना होगा। सबसे पहले तो इसे किसी एक भाषा के बजाए तमाम भारतीय भाषाओं का आंदोलन बनाना होगा। हिंदी भाषा भाषी अक्सर एक झूठे अहंकार का शिकार होते हैं। संविधान कहीं हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित नहीं करता, लेकिन हिंदी वाले अपने सर पर यह हवाई मुकुट लगाकर घूमते हैं। इससे हिंदी को कुछ हासिल नही होता, बस दूसरी भारतीय भाषाओं को चिढ़ जरूर हो जाती है। हिंदी राजभाषा के धौंस पट्टी से भी नही चल सकती।

देश के भविष्य में हिंदी की विशिष्ट भूमिका यही है कि वह भिन्न-भिन्न भाषा बोलने वालों के बीच सेतु का काम कर सकती है। हिंदी झुकेगी तो फैलेगी, ऐंठ दिखाएगी तो सिकुड़ेगी, दरअसल राष्ट्रभाषा और राजभाषा के विवाद से पिंड छुड़ाने की जरूरत है। हमारी ऊर्जा अंग्रेजी हटाने के बजाए भारतीय भाषाओं को बनाने में खर्च होने चाहिये।

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