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Leadership: पद व अधिकारों पर निर्भर नहीं करता नेतृत्व

श्रीकृष्ण सारथि की भूमिका में भी अर्जुन को सशक्त बनाने और प्रेरित करने में प्रभावी रूप से सक्षम रहे

Published: March 21, 2022 04:57:16 pm

प्रो. हिमांशु राय

(निदेशक, आइआइएम इंदौर)

कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन इस विचार से भय व संदेह से घिर जाते हैं कि वे अपने चचेरे भाई व गुरु की मृत्यु के लिए जिम्मेदार होंगे और उन्हें अपने परदादा (पितामह) पर भी प्रहार करना होगा। श्रीकृष्ण अर्जुन की भावना समझते हैं और उन्हें दिव्य प्रवचन के माध्यम से समझाते हैं, जिसे अब 'भगवद्गीता' के रूप में जाना जाता है। आइए, इसी से समझते हैं सफल नेतृत्व के कुछ गुण।
अर्जुन को दिलासा देने और पुन: दृढ़ बनाने हेतु श्रीकृष्ण विभिन्न प्रकार की प्रेरक शैलियों का उपयोग करते हैं। प्रारंभ में आलोचना की भाषा का प्रयोग कर वे अर्जुन की उपेक्षा करते हैं, कि वे यह कैसे भूल सकते हैं कि वे एक महान धनुर्धर हैं और युद्ध लडऩा उनका धर्म है। वे जानते हैं कि मानव होने के नाते अर्जुन स्वयं का बचाव करने का प्रयास करेंगे, इसलिए ललकार कर वे उन्हें एक स्पष्ट और बौद्धिक संवाद में सम्मिलित करते हैं। श्रीकृष्ण जानते हैं कि ऐसा न करने पर भयभीत हो कर अर्जुन चिंतित हो जाएंगे और स्पष्टता से विचार-विमर्श करने में असफल रहेंगे। इसके पश्चात, जब अर्जुन परिष्कृत दार्शनिक विषयों पर ध्यान केंद्रित कर, उचित संवाद करने की स्थिति में होते हैं, श्रीकृष्ण एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं। वे धैर्यपूर्वक अर्जुन को वेदों से धर्म, योग और अन्य दर्शन के जटिल विवरण के बारे में बताते हैं। वे अर्जुन के सभी प्रश्नों का उत्तर देते हैं, और इसलिए अर्जुन भी बिना डरे उनसे अपने हर संदेह को साझा करने के लिए आश्वस्त हो जाते हैं। इस दौरान, श्रीकृष्ण द्वारा कर्म व योग के विभिन्न सिद्धांतों के भीतर मौजूद संभावित अंतर्विरोधों पर प्रकाश डालने पर अर्जुन तर्कशील हो जाते हैं। जब श्रीकृष्ण अर्जुन के अनुरोध पर अपने सार्वभौमिक ब्रह्मांडीय रूप 'विश्वरूप' को प्रकट करते हैं, तो एकलवाद-द्वैतवाद सह-अस्तित्व की अवधारणा पर उनके संदेह दूर हो जाते हैं (ब्रह्मांड एक सर्वोच्च आत्मा का हिस्सा है)।
श्रीकृष्ण न केवल अर्जुन को विश्वरूप के दर्शन कराने के बाद दृष्टिकोण को व्यापक बनाने में मदद करने में सक्षम होते हैं, बल्कि अपने अवतार रूप में लौटकर, एक सारथि के रूप में फिर से उनका समर्थन कर उनकी चिंताओं व भय को शांत करते हैं। वे अर्जुन को सशक्त बनाते हैं और उन्हें उचित मार्ग दिखाते हैं जिससे वे अपने सही कर्तव्यों का पालन कर सकें। एक सफल लीडर के ये गुण अति आवश्यक हैं। वे एक कुशल प्रबंधक के नाते अर्जुन को अपने निर्णय और कार्यों की जिम्मेदारी लेने के लिए भी स्वतंत्रता देते हैं। श्रीकृष्ण युद्ध के दौरान अर्जुन के मित्र और सारथि रहे, सेनापति नहीं बने। इससे सिद्ध होता है कि नेतृत्व औपचारिक पद व अधिकारों पर निर्भर नहीं करता। श्रीकृष्ण सारथि की भूमिका में भी अर्जुन को सशक्त बनाने और प्रेरित करने में प्रभावी रूप से सक्षम रहे। श्रीकृष्ण अर्जुन की स्थिति और वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप धर्म के लिए युद्ध लड़ने के लिए प्रेरित करते रहे - बदला लेने के लिए नहीं, अपितु व्यवस्था बहाल करने के लिए। श्रीकृष्ण की ये विशेषताएं एक सफल लीडर के लिए प्रेरणास्रोत सिद्ध हो सकती हैं।
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