चोंचले क्यों?

चोंचले क्यों?

Dilip Chaturvedi | Publish: Mar, 12 2019 12:59:18 PM (IST) विचार

बात जब बदलते भारत की होती है तो जनता को बदलता भारत नजर भी तो आना चाहिए। सब जानते हैं कि कानून और नियम कौन बनाता है?

इसे कहते हैं, 'नेताओं की नेतागिरी।' मध्यप्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता गोपाल भार्गव ने अपनी सुरक्षा घटाए जाने से नाराज होकर सुरक्षा सरकार को लौटा दी है। उन्हें आशंका है कि राजनीतिक साजिश के तहत उनकी सुरक्षा घटाई गई होगी। मध्यप्रदेश का उदाहरण राजनेताओं की मानसिकता को उजागर करने का जीता-जागता उदाहरण है। जनता की सेवा के नाम पर राजनीति करने का दम भरने वाले नेताओं का अपनी सुविधाओं को कम करते ही बिफर पडऩा आज की सच्चाई बन चुका है। आम जनता के मन में सवाल उठता है कि हर नेता को सुरक्षा देने का औचित्य क्या है? राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल अथवा मुख्यमंत्रियों जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं के अलावा हर जनप्रतिनिधि को सुरक्षा क्यों दी जाए? आम जनता के खून-पसीने की कमाई को सुरक्षा के नाम पर पानी की तरह क्यों बहाया जाए? देश की अदालतें भी अनेक बार सुरक्षा के नाम पर नेताओं को मुहैया कराई जाने वाली सुविधाओं पर सवाल खड़े कर चुकी हैं। अब समय आ गया है जब राजनीतिक दलों को ऐसे मुद्दों पर सहमति बनानी होगी।

बात सिर्फ सुरक्षा के नाम पर 'स्टेटस सिंबल' तक ही सीमित नहीं है। मंत्रियों-अधिकारियों और दूसरे नेताओं को मिलने वाली दूसरी सुविधाओं पर भी चर्चा होनी चाहिए। सरकारी बंगलों के रखरखाव पर होने वाला खर्च हो या फिर विदेशों में होने वाले सरकारी दौरे। पांच सितारा होटलों में होने वाले सेमिनार हों अथवा सरकारी खर्च पर होने वाले भ्रमण। करोड़ों-अरबों रुपए हर साल पानी की तरह व्यर्थ बह जाते हैं। देश में करोड़ों लोग जब भूखे सोते हों, झुग्गियों में रहने को विवश हों तो 'जनता के सेवकों' को मिलने वाली सुविधाओं की समीक्षा करने में आखिर हर्ज क्या है? सरकार की तरफ से सुरक्षा सिर्फ उसे मुहैया कराई जानी चाहिए जिसे वास्तव में खतरा हो। आतंककारियों-नक्सलियों के निशाने पर रहने वाले लोगों को सुरक्षा दी जानी चाहिए। सिर्फ पद के हिसाब से सुरक्षा देने के पुराने नियमों को बदलने के बारे में आम सहमति बनाने की पहल करनी ही चाहिए।

हर नए काम की पहल कभी न कभी होती है। बात जब बदलते भारत की होती है तो जनता को बदलता भारत नजर भी तो आना चाहिए। सब जानते हैं कि कानून और नियम कौन बनाता है? जनता की बात करने वाले नेताओं को अपनी कथनी और करनी एक-सी रखनी चाहिए। भार्गव मध्यप्रदेश के वरिष्ठ नेताओं में शुमार हैं। उन्हें भी देश को बताना चाहिए कि आखिर उन्हें किनसे खतरा है और क्यों? सुरक्षा घटाए जाने को न तो राजनीति से जोडऩा चाहिए और न ही इसे प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाना चाहिए। नेताओं को अपनी सुरक्षा से अधिक जनता की सुरक्षा की चिंता करनी चाहिए। नेताओं की सुरक्षा घटने पर सुरक्षाकर्मी अपराधों की रोकथाम और बेहतर ढंग से कर पाएंगे। आज सुरक्षाकर्मियों की संख्या हर जगह आवश्यकता से कम होने की शिकायतें आती हैं। नेता-अधिकारियों की सुरक्षा घटाकर आम जनता की तकलीफें कम हो सकती हैं तो इससे अच्छा कुछ हो नहीं सकता।

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