नेतृत्व का 'उत्तर' नहीं प्रदेश में

अगले साल होने वाले सात राज्यों के चुनावों में सबसे अहम हैं उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव। सदैव इस प्रदेश की राजनीति की गूंज दिल्ली तक रही है

By: शंकर शर्मा

Published: 13 Jun 2016, 10:34 PM IST

अगले साल होने वाले सात राज्यों के चुनावों में सबसे अहम हैं उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव। सदैव इस प्रदेश की राजनीति की गूंज दिल्ली तक रही है। यूपी में सत्तासीन होने को आतुर भाजपा ने चुनावी रणनीति के तहत ही पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक इलाहाबाद में आहूत की। फिर भी पार्टी में यह सवाल अनुत्तरित ही रहा कि क्या वह बिना किसी स्थानीय चेहरे के ही बिहार चुनाव जैसा जोखिम लेगी? यदि ऐसा नहीं है तो विकल्प के बावजूद उसने बैठक में इस मामले में फैसला क्यों नहीं किया? वहां पहले से मजबूत बसपा और सत्तारूढ़ सपा के पास तो नेतृत्व का चेहरा है। ऐसे में भाजपा कैसे करेगी मुकाबला? और, कांग्रेस तो फिलहाल शिथिल ही लग रही है। इसी पर स्पॉटलाइट...

चेहरे से ज्यादा जरूरी है नीतियां
संजय कुमार  निदेशक, सीएसडीएस
किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह महत्वपूर्ण होता है कि वह किस चेहरे को लेकर चुनाव मैदान में उतरती है? असम विधानसभा चुनाव में भाजपा की जबर्दस्त जीत के बाद भी यह बात जोर-शोर से कही जा रही है कि उसे यह विजय मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार पहले ही घोषित करने से मिल पाई है। मेरा यह मानना है कि राज्यों में मुख्यमंत्री पद के लिए चुनाव पूर्व राजनीतिक दलों के लिए किसी चेहरे का होना इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना उस दल की नीतियां।

भाजपा को ही लें इससे पहले उसने हरियाणा, झारखण्ड, महाराष्ट्र व जम्मू-कश्मीर में भी किसी चेहरे को आगे किए बिना चुनाव लड़ा और न केवल जीत हासिल की बल्कि हरियाणाा व झारखण्ड में अपने बूते और महाराष्ट्र व जम्मू-कश्मीर में सहयोगी दलों के साथ सरकार बनाई। हां, इतना जरूर है कि दिल्ली में उसने ऐन पहले अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया और जीत नहीं पाई। मेरा तो यह भी मानना है कि असम में यदि भाजपा मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं भी करती तो भी जिस तरह का माहौल वहां बना, उससे भाजपा सरकार बनाने की स्थिति में रहती। इसीलिए यह कहना ठीक नहीं है कि राजनीतिक दल, चेहरों के सहारे ही चुनावी वैतरणी पार कर पाएंगे।

भाजपा की मजबूरी
जहां तक  उत्तरप्रदेश का सवाल है। यहां परिस्थितियां विपरीत हैं। वहां बसपा व सपा का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार पहले से ही तय है। ऐसे में न केवल भाजपा बल्कि कांग्रेस के लिए भी यह जरूरी हो गया है कि वह अपने मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तय करे। ऐसा नहीं हुआ तो चुनाव मैदान में उतरने वाली दूसरी पार्टियां मुद्दा बनाने की कोशिश कर सकती है कि राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दल कहलाने वाले इन दलों के पास मुख्यमंत्री पद का कोई उम्मीदवार तक नहीं है।

भाजपा ने उत्तरप्रदेश के आसन्न चुनावों को देखते हुए ही अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के लिए इलाहाबाद को चुना है। बात भाजपा की करें तो मुझे लगता नहीं कि जल्दी ही वह उत्तरप्रदेश के लिए किसी को मुख्यमंत्री के रूप में सामने ला पाएगी। अभी सवाल इस बात का नहीं कि जनता किसे मुख्यमंत्री के रूप में पसंद करती है। बड़ा सवाल यह है कि भाजपा किसे मुख्यमंत्री के रूप में सामने ला पाएगी? मुझे लगता है कि भाजपा में भी अभी कोई ऐसा नेता नहीं जो अन्य के मुकाबले लोकप्रिय हो तथा पार्टी में स्वीकार्य हो। इसीलिए कभी राजनाथ सिंह, कभी स्मृति इरानी, कभी वरुण गांधी और कभी केशव प्रसाद मौर्य का नाम सामने आता है। पार्टी में अंदरूनी भय इस बात का है कि किसी एक नेता को प्रोजेक्ट किया गया तो कहीं दूसरे नेता खींचतान में नहीं लग जाए। इसलिए यदि किसी को भाजपा सामने भी ला पाएगी तो ऐन मौके पर ही।

कांग्रेस भी दुविधा में
कांग्रेस के लिए तो इससे भी बड़ी दुविधा है। लगातार पराजय का सामना करती आ रही कांग्रेस के पास तो फिलहाल उत्तरप्रदेश में ऐसा कोई नेता ही नहीं जो बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को विश्वास में लेकर आगे बढ़ सके। उसके लिए किसी चेहरे का लाना इसलिए भी ज्यादा जरूरी नहीं है क्योंकि अभी तो यह लगता ही नहीं कि यह पार्टी बेहतर प्रदर्शन कर पाएगी। ऐसे में बिना किसी को आगे किए चुनाव मैदान में उतरने से कांग्रेस की सेहत पर इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ेगा। चाहे वह चुनाव जीते या न जीते। एक बात और है, किसी को प्रोजेक्ट कर भी दिया तो नेताओं की लड़ाई में संभवतया कांग्रेस को इसका नुकसान ही उठाना पड़ सकता है। लेकिन, जैसा मैंने पहले ही कहा, उत्तरप्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए कांग्रेस को भी किसी ने किसी चेहरे को तो आगे करना ही होगा।

बसपा व सपा के लिए इस मामले में हालात थोड़े मुफीद हैं क्योंकि सबको पता है कि ये दल सत्ता में आए तो मुख्यमंत्री का दावेदार कौन होगा? भाजपा कार्यकारिणी की बैठक को चुनावी तैयारियों का आगाज समझा जाना चाहिए। बसपा, सपा व कांग्रेस यहां पहले से ही चुनावी तैयारियों में जुटे हुए हैं। यह बात सच है कि भाजपा के लिए उत्तरप्रदेश की सत्ता पर काबिज होना बड़ी चुनौती है। इतनी ही बड़ी चुनौती अखिलेश यादव के लिए दुबारा सत्ता में आने की है।

अभी चुनाव में थोड़ा समय है इसलिए यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता कि कौनसे मुद्दे इन चुनावों में हावी रहने वाले हैं। लेकिन इतना साफ है कि प्रदेश के तमाम विपक्षी दल अखिलेश सरकार की विफलताओं को मुद्दा बनाने का प्रयास करेंगे।


उत्तर प्रदेश में कौन होगा चेहरा?

सपा- अखिलेश यादव मौजूदा मुख्यमंत्री और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भी सपा की ओर से इस पद के स्वाभाविक उम्मीदवार।

बसपा- मायावती बसपा सुप्रीमो हैं तथा पहले चार बार उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। बसपा में इस पद के लिए अन्य दावेदार नहीं है।

भाजपा कई दावेदार लेकिन.
असम की जबर्दस्त जीत के बाद  उप्र की सत्ता पर काबिज होने को आतुर। पार्टी में मुख्यमंत्री के कई दावेदार किंतु तय नहीं।

कांग्रेस चेहरे की तलाश
एक के बाद एक लगातार पराजय का सामना कर रही कांग्रेस के पास मुख्यमंत्री के लिए फिलहाल कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं।

भाजपा :  सीएम के प्रमुख दावेदार

राजनाथ सिंह केन्द्रीय गृहमंत्री
भाजपा के दिग्गज नेता उप्र सीएम रह चुके। प्रदेश में पहचान व पार्टी में सर्वमान्य नेता की छवि।

स्मृति ईरानी मानव संसाधन मंत्री

अमेठी से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ लोकसभा चुनाव लडऩे से उप्र में पहचान।

वरुण गांधी सांसद
उप्र के सुल्तानपुर से सांसद और युवा चेहरा। गांधी परिवार का फायदा मिलने की उम्मीद।

केशव प्रसाद मोर्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष
पार्टी का पिछड़े वर्ग का चेहरा। । बड़े नेताओं के नाम पर विवाद हुआ तो मिल सकता है मौका।


बड़े दलों के लिए सत्ता बनी ख्वाब

भाजपा इस बार सत्ता में आती है तो उसके लिए यह चौदह बरस का राजनीतिक वनवास पूरा कने के समान होगा। कभी एकछत्र शासन करने वाली कांग्रेस में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में नारायण दत्त तिवारी के बाद कोई सीएम नहीं बन पाया। वे  1988 - 1989 में  मुख्यमंत्री रहे। अक्टूबर 2000 से मार्च 2002 तक मौजूदा केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह यहां भाजपा के मुख्यमंत्री रहे। उत्तरप्रदेश में क्षेत्रीय दलों का प्रभुत्व 1993 के बाद ही शुरू हो गया जब मुलायम सिंह यादव ने सपा की सरकार बनाई। हालांकि मुलायम इससे पूर्व 1989 से 1991 तक गठबंधन सरकार के मुखिया रह चुके थे। 1996 से 2002 के दौर को छोड़ दें तो इस बीच उत्तरप्रदेश की सत्ता पर लम्बे समय से कभी सपा तो कभी बसपा  काबिज रही है। वैसे आपतकाल की समाप्ति के बाद ढाई साल तक जनता पाटी यहां सत्ता में रही। एक बार 1967 में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में भारतीय क्रांति दल को भी सरकार बनाने का मौका मिला था।


विकल्पों के असमंजस में भाजपा

डॉ. मनीष तिवारी इंस्टीट्यूट फॉर गवर्नेंस, पॉलिसीज एंड पॉलिटिक्स

दे श में जिस तरह से चुनाव होते रहे हैं, उनमें चेहरे के मुकाबले संगठन को अधिक महत्व दिया जाता रहा। कांग्रेस में जब इंदिरा गांधी पार्टी की प्रमुख बनीं तब जरूर उसके पास यह प्रमुख चेहरा रहा लेकिन उनके बाद भी संगठन ही मुख्य भूमिका रहा। जहां तक भारतीय जनता पार्टी का सवाल है तो वहां भी अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे बड़े चेहरे जरूर रहे लेकिन 1989 के बाद से पार्टी को मिली  सफलता का मूल कारण संगठनात्मक विस्तार ही कहा जा सकता है। अलबत्ता 2014 का लोकसभा चुनाव कुछ अलग किस्म का चुनाव रहा।

यह जिस तरह अध्यक्षीय चुनाव होते हैं, उस प्रकार से लड़ा गया। नरेंद्र मोदी भाजपा का चेहरा थे और बाकी सभी उनके विरोध में थे। यदि इसी बात को आधार मानकर चलें तो कहा ज सकता है कि केंद्र में चेहरे को सामने लाकर चुनाव लडऩे का तरीका नया लेकिन राज्यों में यह तरीका काफी पहले से मौजूद रहा है। बिहार के चुनाव में भी भाजपा को इसीलिए शिकस्त का सामना करना पड़ा क्योंकि उसके पास नीतीश कुमार के सामने कोई बड़ा चेहरा नहीं था। वहां के लोगों को समझ में आता था कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद छोड़कर तो राज्य के मुख्यमंत्री बनेंगे नहीं, ऐसे में उनके पास नीतीश से बेहतर विकल्प नहीं था।

फैसले का इंतजार
उत्तर प्रदेश में 2012 में जब चुनाव हुए तो उस समय मायावती का चेहरा पुराना हो चुका था और उनकी संगठनात्मक समस्याएं हावी होने लगी थीं। उधर समाजवादी पार्टी के सामने भी मुलायम सिंह के रूप में पुराना चेहरा था। ऐसे में उसने अखिलेश यादव पर दांव खेला। यह नया और युवा चेहरा था। यह दांव काम कर गया। अब उत्तर प्रदेश में 2017 में एक बार फिर विधानसभा चुनाव होने हैं। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के पास तो चेहरे हैं, जिन्हें आगे रखकर वे चुनाव लड़ेंगी।  राज्य के इन हालात में पुराने अनुभव को देखते हुए भाजपा को भी नये चेहरों की जरूरत है। उत्तर प्रदेश के चुनावों का देश व्यापी असर होता है और उसकी अपनी महत्ता है।

इलाहाबाद में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई और इस बैठक को जानबूझकर इलाहाबाद में इसीलिए रखा गया क्योंकि अगले साल यहां होने वाले चुनाव को लेकर शुरुआती रणनीति बनाई जा सके।  इसी आधार पर उम्मीद की जा रही थी कि अन्य राष्ट्रीय मुद्दों के साथ उत्तर प्रदेश में किस चेहरे को आगे रखकर वह चुनाव लड़ेगी, इस पर कुछ फैसला हो सकता होगा। लेकिन, भाजपा की कार्यपद्धति पर गौर करें तो कार्यकारिणी इस तरह की बैठकों में इस तरह के विषयों पर चर्चा तो होती है लेकिन फैसले बाद में लिये जाए हैं।

फिलहाल ऊहापोह
भारतीय जनता पाटी के पास चेहरों की कमी नहीं है। उसके पास चेहरे हैं लेकिन पार्टी शायद उन पर अभी फैसला नहीं कर पाई हो। पहला बड़ा नाम तो राजनाथ सिंह का ही है जिनका उत्तर प्रदेश में बड़ा कद है। अखिलेश यादव उनके कद के तो नेता नहीं है लेकिन वे राज्य के मुख्यमंत्री हैं और वे सपा की ओर से एक बार फिर दावेदार हो सकते हैं। ऐसे में उनके मुकाबले में खड़ा होकर यदि भाजपा की हार होती है तो राजनाथ की निजी प्रतिष्ठा को जरूर नुकसान हो सकता है। उत्तर प्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य अन्य पिछड़ा वर्ग से जरूर हैं लेकिन कद अखिलेश और मायावती जितना बड़ा नहीं है।

एक युवा विकल्प वरुण गांधी हैं लेकिन उनकी भाषा और कार्यशैली उनके आड़े आ रही है। उत्तर प्रदेश में सपा के साथ बसपा भी बड़ी चुनौती है और उसकी प्रमुख मायावती के मुकाबले के लिए भाजपा के पास उनकी धुर विरोधी स्मृति ईरानी एक विकल्प हैं लेकिन स्थानीय कार्यकर्ता उन्हें कितना स्वीकार करेंगे, इस पर अब भी संशय है। भाजपा के पास विकल्प हैं लेकिन अभी वह असमंजस में है, किसे आगे रखकर चुनाव लड़े। कांग्रेस की परेशानी अब भी वही है, उसे भी उत्तर प्रदेश में एक बड़े चेहरे की तलाश है और उसके पास तो विकल्प भी दिखाई नहीं दे रहे हैं। उसका बहुत बड़ा वोट बैंक अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित वर्ग से रहा है। जब से सपा और बसपा ने उसे छीना, तब से वह सत्ता से बाहर ही है।

क्षेत्रीय दलों से बढ़ी चेहरों की महत्ता

क्षे त्रीय दलों की महत्ता को हिंदुस्तान में नकार नहीं सकते और इन्हीं के कारण राज्यों के चुनाव में चेहरों की महत्ता बढ़ी है। हालांकि भाजपा मे ंअब भी स्थानीय चेहरे हैं और मजबूत हैं। इसका अभी विस्तार भी हो रहा है लेकिन जैसा विस्तार कांग्रेस का है, उस लिहाज से उसके पास स्थानीय चेहरों का विकल्प नहीं है। राज्यों में उसके लिए यह बड़ी समस्या बनता जा रहा है। दूसरी पंक्ति के नेताओं को तैयार करने का तो जैसे रिवाज ही समाप्त हो गया है। बड़े राजनेता अपने ही परिवारों को आगे बढ़ाने में लगे हैं तो कहां से आएंगे नेता?
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शंकर शर्मा
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