जनता ताने दे तो भी मुस्कुराना सीखें नेता

जनता ताने दे तो भी मुस्कुराना सीखें नेता

Manoj Sharma | Publish: Jan, 06 2019 06:42:50 PM (IST) | Updated: Jan, 06 2019 06:42:51 PM (IST) विचार

'आखिर क्यों नहीं? हम अपने नेताओं का मज़ाक क्यों नहीं बना सकते? उन पर पैरोडी क्यों नहीं कर सकते? उनके प्रति तल्ख़ क्यों नहीं हो सकते? अंग्रेज़ तो अपनी महारानी का ही मजाक बनाते हैं।'

करन थापर

वरिष्ठ पत्रकार और टीवी शख्सियत

अब जबकि 2019 आ चुका है, हम फिलहाल इतनी उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि आने वाला वर्ष बीते हुए वर्ष से बेहतर हो। आगामी एकाध हफ्ते में हालांकि ऐसी उम्मीदें छीज जाएंगी, यथास्थिति वापस भीतर घर कर जाएगी और आकांक्षाएं एक बार फिर छटपटाने लगेंगी। इसके बावजूद मैं एक सवाल का जवाब ज़रूर देना चाहूंगा जो मुझसे नए साल की पूर्व संध्या पर किसी ने पूछा था- भारत के राजनेताओं से आपको क्या उम्मीदें हैं?

मेरा जवाब आसान है। मैं चाहूंगा कि वे अपनी आलोचना सहना सीख जाएं। हो सकता है यह मांग पूर्वाग्रहग्रस्त हो और गलत भी हो, लेकिन हम भारत के नागरिकों को उनकी आलोचना करने का अधिकार है जिन्हें हमने चुन कर सदनों में भेजा है। दो चुनावों के बीच उन्हें ज़मीन लाने का यही एक तरीका है वरना उनका कद इतना बढ़ जाएगा कि वे हमें सदा गुलाम बनाए रखेंगे। पिछले साल हुई दो अलग-अलग घटनाएं मुझे आश्वस्त करती हैं कि ऐसा नहीं होने वाला। वे अपनी आलोचना कभी स्वीकार नहीं करेंगे।

दिसंबर में मणिपुर की सरकार ने मुख्यमंत्री की आलोचना करने पर 39 साल के किशोरचंद्र वांगखेम को रासुका के तहत निरुद्ध कर लिया था (उससे पहले उन्हें राजद्रोह कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था)। उन्होंने ऐसा क्या कह दिया जो राज्य के लिए अपच हो गया? उन्होंने मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री की कठपुतली कह दिया था। क्यों? क्योंकि वे झांसी की रानी के नाम पर जश्न मनाने के राज्य सरकार के फैसले के विरोध में थे चूंकि उनका मानना है कि अंग्रेजों के खिलाफ मणिपुरियों के संघर्ष से उनका कोई लेना-देना नहीं। इस बात पर उन्हें बिना सुनवाई बारह महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है।

इससे पहले अक्टूबर में अभिजित अय्यर मित्रा को कोणार्क मंदिर की भव्यता की आलोचना करने, रसगुल्ला के ओडिया जन्म पर सवाल उठाने और राज्य के विधायकों पर अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था। इस मामले में मित्रा ने जब सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर कहा कि जेल में उनकी जान को खतरा है, तो अदालत की प्रतिक्रिया आई कि इस मामले में जेल से ज्यादा महफूज़ जगह और कोई नहीं है।

कांग्रेस की सरकार में केवल 25 साल के असीम त्रिवेदी को संसद पर कार्टून बनाने के आरोप में मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया था। तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने तब कहा था कि कार्टूनिस्टों को ‘’संवैधानिक दायरे के भीतर रहना चाहिए’’ और ’वे राष्ट्रीय प्रतीकों को अपने कार्टूनों का विषय नहीं बना सकते’।

आखिर क्यों नहीं? हम अपने नेताओं का मज़ाक क्यों नहीं बना सकते? उन पर पैरोडी क्यों नहीं कर सकते? उनके प्रति तल्ख़ क्यों नहीं हो सकते? अंग्रेज़ तो अपनी महारानी का ही मजाक बनाते हैं, यूनियन जैक की छाप पहनते हैं। इसको स्वस्थ हास्य की श्रेणी में लिया जाता है? अमरीकी तो डॉनाल्ड ट्रंप के साथ बहुत भद्दा बर्ताव करते हैं, उन्हें यह सब पसंद भी नहीं आता लेकिन वे उन्हें जेल भेजने की धमकी नहीं दे डालते। उनकी इतनी हिम्मत नहीं है। अपने यहां बड़े नेताओं पर कोई लतीफ़ा कह कर देखिए या उनका मजाक बनाइए, अगले ही पल आप सलाखों के पीछे होंगे।

मार्कण्डेय काटजू जब प्रेस परिषद के अध्यक्ष थे तब उन्होंने कहा था, ‘’नेताओं को सहिष्णु होना चाहिए।‘’ उन्होंने कहा था, ‘’यह कोई तानाशाही नहीं है।‘’ किसी ने उनकी बात नहीं सुनी। आज भी कोई नहीं सुन रहा। फिर भी हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करते हैं, लेकिन हम लगातार लोकतंत्र की आत्मा का उल्लंघन किए जा रहे हैं और हमें इसका अहसास तक नहीं है।

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इसीलिए चाहे कांग्रेस के हों या बीजेपी के, राष्ट्रीय हों या स्थानीय, बड़े हों या छोटे, मैं हर तरह के नेताओं से कहता हूं कि आइए, अपने लोकतंत्र को महान बनाएं। अगली बार जब आपके देशवासी आपका मजाक बनाएं या आप पर ताने कसें तो प्यार से मुस्कुराना सीखिए, भले आपके दांत गुस्से में भिंचे हुए हों। आलोचना के प्रति आपकी असहिष्णुता से ज्यादा और कुछ भी इस लोकतंत्र को इतना खोखला नहीं बनाता। अगर आप थोड़ा सा हास्यबोध पैदा करेंगे तो आपके चाहने वाले बढ़ेंगे।

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